<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981</id><updated>2011-04-21T13:38:54.841-07:00</updated><category term='नार्को'/><category term='देश'/><category term='आतंक'/><category term='गिरफ्तारी'/><category term='अप्राकृतिक मैथुन'/><category term='परिवर्तन'/><category term='न्यायपूर्ण'/><category term='सम्मेलन'/><category term='दंगे'/><category term='हिंसा'/><category term='सुनवाई'/><category term='प्रोफेसर'/><category term='गांधी'/><category term='नि:शुल्क'/><category term='साम्प्रदायिकता'/><category term='दरअसल'/><category term='समय'/><category term='कॉलिन गोन्साल्विस'/><category term='तथ्यों'/><category term='विश्व'/><category 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rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>17</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-3609676984423075107</id><published>2007-10-08T08:22:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:24:25.231-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पीपुल्स वॉच'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अधिकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानवाधिकार'/><title type='text'>मानवाधिकार आयोग नींद में?</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पीपुल्स वॉच द्वारा हाल में प्रकाशित सैबिन नायरहॉफ की पुस्तक 'फ्रॉम होप टू डिस्पेयर' यानी आशा से निराशा में निष्कर्ष निकाला गया है कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भारत में मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों पर कार्रवाई करने में बुरी तरह असफल रहा है। निष्कर्ष के मुख्य अंश :&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीपुल्स वॉच के अध्ययन के निष्कर्ष राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के लिए काफी हद तक घातक हैं। विश्लेषण के किसी भी श्रेणी के परिणाम अनुकूल नहीं हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;कुल प्राप्त शिकायतों में से एक तिहाई से अधिक में आयोग ने शिकायतकर्ता को कोई जवाब नहीं दिया, इतना ही नहीं आयोग ने शिकायतकर्ता को यह बताने का कष्ट भी नहीं किया कि उसकी शिकायत मिल गई है या उस पर विचार किया जा रहा है।&lt;br /&gt;जिन मामलों में कोई प्रारम्भिक जवाब नहीं मिला उनमें शिकायतकर्ता औसतन दो से अधिक वर्ष से जवाब की प्रतीक्षा में हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;उन मामलों में जिनमें जवाब भेजा गया है उनमें से लगभग आधों में शिकायतकर्ता या पीड़ित का विवरण शामिल नहीं किया गया हालांकि पीपुल वॉच ऐसा करने का बार-बार अनुरोध करता रहा है। उसका मानना है कि ऐसा करने से उन एनजीओ का काम आसान हो जाएगा जो आयोग में एक साथ कई शिकायतें प्रस्तुत करते हैं।&lt;br /&gt;लगभग 50 प्रतिशत शिकायतों में आयोग के पास चार या पांच स्मरण पत्र भेजने पड़ते हैं क्योंकि आयोग न तो कोई सूचना भेजता है और न पत्र। स्मरण पत्र भेजने में अनावश्यक समय और धन लगता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;शिकायतों की औसत लम्बित अवधि लगभग 18 से 23 माह है। इस अवधि के दौरान अंतिम आदेश दिया जाता है। जिन मामलों में कोई आदेश नहीं दिया गया उनकी औसत लम्बित अवधि 25 माह है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;प्रमुख रूप से देरी न केवल राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा देरी से जवाब देने से होती है बल्कि आयोग में अधिक समय लगना भी देरी का कारण है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;कुल प्राप्त शिकायतों में से केवल 18 प्रतिशत में दूसरी पार्टी से कोई जवाब मिल सका। इसका अर्थ है कि अधिकतर मामलों में शिकायतकर्ता को संबंधित अधिकारियों से प्राप्त रिपोर्ट पर टिप्पणी देने का कोई अवसर नहीं दिया जाता भले ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को रिपोर्ट मिल गई हो। अधिकारियों द्वारा बड़ी संख्या में अपर्याप्त स्वतंत्र रिपोर्ट मिलने को देखते हुए ये बड़ी चिंता का विषय है। ऐसे मामलों में अक्सर ऐसा होता है जिनमें पुलिस अपनी कथित क्रूरता की शिकायतों पर रिपोर्ट तैयार करती है। ऐसे मामलों में पक्षपातपूर्ण और अपर्याप्त रिपोर्ट दिए जाने की सम्भावना अधिक हो जाती है।&lt;br /&gt;केवल 32.5 प्रतिशत मामलों में आयोग ने अंतिम आदेश जारी किया। तीन मामलों में शिकायतकर्ता को सूचित किए बगैर मामला बंद कर दिया गया। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की वेबसाइट से इस तथ्य का पता चला। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;हिरासत में मृत्यु के बारे में दायर 11 शिकायतों में से किसी में भी आयोग ने अंतिम आदेश नहीं दिया हालांकि आयोग ने ऐसे मामलों में तेजी से छानबीन करने के दिशा-निर्देश और प्रतिबध्दता जारी की थी। इस अध्ययन के निर्देशों से आयोग की 2002-2003 की वार्षिक रिपोर्ट में दी गई उस जानकारी के विपरीत स्थिति सामने आती है जिसमें बताया गया था कि आयोग ने हिरासत में मृत्यु के सभी मामलों में आदेश जारी कर दिया है। अनुसूचित जातियों से मिली शिकायतों के मामले में सबसे अधिक बड़ी लम्बित अवधि और सबसे कम अंतिम आदेश जारी करने की स्थिति सामने आई है। इससे आयोग की वर्ष 2002-2003 की वार्षिक रिपोर्ट में दी गई उस जानकारी की पोल खुल जाती है कि आयोग दलितों को अधिकार दिलाने पर जोर देता है और उनसे प्राप्त शिकायतों पर ध्यानपूर्वक कार्रवाई की जाती है। इसके विपरीत उच्च वर्ग और सम्पन्न वर्ग के लोगों से मिली शिकायतों पर शायद अधिक ध्यान दिया गया। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आयोग ने संबंधित अधिकारियों से समय पर रिपोर्ट न मिलने या संतोषजनक रिपोर्ट न मिलने की स्थिति में जांच और पूछताछ के लिए मौके पर जाकर निरीक्षण करने के अपने अधिकार का शायद ही इस्तेमाल किया हो। अधिकतर मामलों में मौके पर जाकर जांच करने को अनावश्यक माना गया।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;कुल शिकायतों में से केवल 20 प्रतिशत आयोग की वेबसाइट पर दिखाई गई हैं हालांकि पीपुल वॉच ऐसा करने का बार-बार अनुरोध कर रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ऑनलाइन उपलब्ध सूचना में काफी त्रुटियां और खामियां हैं। यह भी जानकारी उपलब्ध नहीं है कि कब सूचना मिली और कब उस पर कुछ कार्रवाई की गई। वेबसाइट पर उपलब्ध मामलों में से 64 प्रतिशत में जानकारी शिकायतकर्ता को आयोग से प्राप्त सूचना से मेल नहीं खाती। उपरोक्त निष्कर्ष एक ऐसे संगठन के लिए अत्यंत खेदजनक स्थिति है जिससे देश के अधिकतर नागरिकों खास तौर पर समाज के उपेक्षित और कमजोर वर्ग के लोगों ने न्याय के लिए उम्मीद लगा रखी है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-3609676984423075107?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/3609676984423075107/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=3609676984423075107' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/3609676984423075107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/3609676984423075107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_3791.html' title='मानवाधिकार आयोग नींद में?'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-2743078249389296758</id><published>2007-10-08T08:19:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:21:54.434-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉलिन गोन्साल्विस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुनवाई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सीमा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जमानत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉमन कॉज'/><title type='text'>सुनवाई की हो समय-सीमा - कॉलिन गोन्साल्विस</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ffcc66;"&gt;गरीब, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक खासकर मुसलमानों को वर्षों जेलों में सड़ने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उनकी जमानत कराने वाला तक कोई नहीं। कॉलिन गोन्साल्विस का कहना है कि छोटे अपराधों के आरोपों में बंद लोगों को निजी मुचलके पर रिहाई की पुख्ता व्यवस्था हो&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन अधिनियम, 2005 का राष्ट्रीय जन संचार माध्यमों में स्वागत हुआ है क्योंकि इसने ऐसे पचास हजार लोगों की रिहाई के लिए रास्ते खोल दिये हैं जिन पर मुकदमे चल रहे थे। इनमें अनेक ऐसे हैं जो वर्षों से जेलों में सड़ रहे हैं और उनकी सुनवाई शुरू भी नहीं हुई। यह संशोधन अधिनियम दरअसल 1996 और उसके बाद कॉमन कॉज नामक संस्था और राजदेव शर्मा के मामलों में उच्चतम न्यायालय के फैसलों के उलट है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;1996 में कॉमन कॉज के मामलों में उच्चतम न्यायालय को पता चला कि कई मामलों में छोटे-छोटे अपराधों के आरोपियों की सुनवाई वर्षों तक टाल दी गई थी। गरीब लोग लंबी अवधि तक जेलों में सड़ते रहे क्योंकि उन्हें जमानत पर छुड़वाने वाला कोई नहीं था। फौजदारी न्याय प्रणाली कुछ इस तरह काम कर रही थी जैसे वह प्रताड़ित करने वाला इंजन हो। तब उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि कथित अपराध की गंभीरता पर निर्भर करते हुए जो लोग छ: महीने से एक साल तक जेल में रहे हैं उन्हें जमानत या व्यक्तिगत बांड पर रिहा कर दिया जाये, बशर्ते उनका मुकदमा एक से दो साल तक टाल दिया गया हो।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय ने तब आदेश जारी किये कि ऐसे मामलों को समाप्त कर दिया जाए और अभियुक्तों को छोड़ दिया जाए। जहां विशेष अवधि तक मामलों की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी, उन्हें समाप्त कर दिया जाए। भ्रष्टाचार, तस्करी और आतंकवाद के मामले इसमें शामिल नहीं किये गये। यह भी स्पष्ट किया गया कि अभियुक्त को यह इजाजत नहीं दी जायेगी कि वह फौजदारी प्रक्रिया में जानबूझकर विलंब डाले ताकि सुनवाई के लिये जो अवधि निश्चित की गई है वह उसका लाभ उठाकर छूटना चाहे। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;राजदेव शर्मा के मामलों में 1998 में उच्चतम न्यायालय ने 1980 में हुसैनारा खातून मामले में अपने निर्णय का संदर्भ दिया। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि ''वित्तीय रुकावटें और व्यय की प्राथमिकताएं सरकार को आरोपी की तेजी से सुनवाई करने के उसके कर्तव्य से च्युत नहीं कर सकतीं।'' इसके बाद न्यायालय ने मुकदमे के साक्ष्य समाप्त करने और आरोपी को एक निश्चित अवधि के बाद जमानत पर छोड़ देने संबंधी निर्देशन-सिद्धांत जारी किये। यह स्पष्ट किया गया कि ''अभियोग चलाने वाली एजेंसी की शिथिलता के कारण कोई भी सुनवाई अनिश्चित काल तक नहीं बढ़ाई जा सकती।''&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दस वर्ष पूर्व उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी किये गये इन निर्देशों के बावजूद निचली अदालतें आरोपियों को जमानत पर छोड़ने और सुनवाई समाप्त करने में असफल रहीं।&lt;br /&gt;वर्ष 2004 में पी रामचन्द्र राव के मामले में उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इस कानून की समीक्षा की और मामलों को समाप्त करने और सुनवाई के लिए समयावधि निश्चित करने की बात को यह कहते हुए नामंजूर कर दिया कि ऐसा करना न तो परामर्श देने योग्य है और न ही व्यावहारिक।  परिणामस्वरूप फौजदारी न्याय प्रणाली में गहराई तक गंद जमती चली गई और समय-समय पर राष्ट्रीय जन संचार माध्यमों ने मुकदमों के दौरान दशकों तक जेलों में पड़े आरोपियों के बारे में चौंकाने वाली खबरें छापनी शुरू कीं, लेकिन किया कुछ नहीं गया।  मौजूदा आपराधिक प्रक्रिया (संशोधन) अधिनियम कॉमन कॉज संस्था और राजदेव शर्मा के मामलों में दिये गये निर्देशित सिद्धांतों का उलट है। सबसे पहले इसलिये कि न्यायालय ने किसी आपराधिक मामले की सुनवाई समाप्त करने के लिये कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की। दूसरे जबकि पहले के फैसले में किसी आरोपी को जमानत या व्यक्तिगत बंधपत्र (बांड) पर छोड़ा जा सकता था बशर्ते कथित आरोप की गंभीरता को देखते हुए वह छ: महीने से एक साल तक जेल में रह चुका हो। अब यह अवधि जेल में रहने की संभावित अवधि की आधी तक बढ़ा दी गई है।  अर्थात् अब यह अवधि डेढ़ से साढ़े तीन साल तक की हो सकती है। अगर उच्चतम न्यायालय के पहले फैसलों के अंतर्गत आरोपियों, जिनकी सुनवाई चल रही थी, को रिहा नहीं किया गया, तब कैसे विश्वास करें कि और कड़ा शासन आयेगा तो लोगों को न्याय मिल सकेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज ढाई लाख से अधिक ऐसे लोग हैं जिन पर मुकदमें चल रहे हैं और वे जेलों में हैं, जबकि कानून की नजर में वे तब तक निर्दोष हैं जब तक उन्हें दोषी करार नहीं दिया जाता। अनेक मामलों में वर्षों से अभी सुनवाई शुरू ही नहीं हुई।  हर दस में सात ऐसे लोग हैं जो इस स्थिति में हैं। जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ती जा रही है। कुछ जेलों में तो उनकी क्षमता से 300 प्रतिशत अधिक कैदी पहुंच रहे हैं। कैदियों को पारियों में यानी बारी-बारी से सोना पड़ता है क्योंकि सोने के लिए जगह ही नहीं है। संभवत: लोकतांत्रिक विश्व का कोई भी देश इस ढंग से अपने नागरिकों को जेलों में नहीं ठूंसता जैसा कि भारत ठूंसता है। जिन्हें जेल होती है उनमें सबसे बड़ी संख्या गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की है। यह कहना कि व्यवस्था समाज के इन वर्गों के प्रति क्रूर व्यवहार करती है, अतिशयोक्ति नहीं होगी। व्यवस्था सिर्फ इन्हीं लोगों को अपना निशाना बनाती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि यह ऐसे ही हो जाता है या दुर्घटनावश होता है। बल्कि राज्य अपनी जिद पर उतारू है कि जेलों में गरीबों की संख्या कम न की जाए। राज्य और आतंक के बल पर व्यवस्था कायम करने वाली उसकी पुलिस के लिये यह जरूरी है कि कानून द्वारा अपराधी ठहराये जाने से पहले किसी भी आरोपी को मनमानी ताकत के बल पर जेल में ठूंस दिया जाए। फौजदारी न्याय प्रणाली की दरअसल इस तथ्य में रुचि नहीं है कि सच्चाई क्या है इसका निर्णय तो अंतिम फैसले में निहित है। यह तो अपराधों की रोकथाम के उद्देश्य से असंख्य लोगों को हिरासत में रखने की मनमानी व्यवस्था है जिसमें अंतिम फैसले की तब तक कोई चिंता नहीं जब तक पुलिस द्वारा पकड़े गये आरोपी दोषमुक्त किये जाने से पहले वर्षों तक जेल में न सड़ते रहें। जो राज्य की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि उसमें आरोपियों की संख्या कम है, वे इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं कि पुलिस का मकसद पहले तो आरोप सिद्ध करना होता ही नहीं है। यह बताता है कि विधान सम्मत आपराधिक जांच की स्थिति इतनी ढुलमुल क्यों है और यह भी कि कानून पर कम और लाठी पर ज्यादा विश्वास क्यों है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आपराधिक क्रिया संहिता संशोधन अधिनियम द्वारा सामने लाये गये अन्य आरोप भी इतने ही अस्पष्ट और खतरनाक हैं। आपराधिक दंड विधान के अनुच्छेद 50-ए का संशोधन डीके बसु के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशित सिद्धांतों को पेश करता है लेकिन एक महत्वपूर्ण पक्ष को नजरअंदाज कर देता है कि उस व्यक्ति के परिवार को बिना लिखित सूचना के गिरफ्तार किया गया। ऐसा करना महत्वपूर्ण था क्योंकि पुलिस अक्सर यह झूठ कहते पाई गई है कि उसने अमुक को गिरफ्तार करने से पहले जुबानी सूचना दे दी थी।  अनुच्छेद 53 का संशोधन तो निश्चित रूप से खतरनाक है क्योंकि यह अपरोक्ष रूप से झूठ पकड़ने वाली मशीन और बेहोशी में किये गये विश्लेषण परीक्षणों को साक्ष्य का दर्जा देता है। ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में इस तरह के परीक्षणों को संशयात्मक माना जाता है और उन पर गौर नहीं किया जाता। अनुच्छेद 122 में किया गया संशोधन पुलिस की ताकत को बढ़ाता दिखता है क्योंकि इसमें किसी भी व्यक्ति पर केवल संदेह हो जाने से ही उसे जेल में डाल देने का समर्थन निहित है। आज के कानून के मुताबिक अगर ऐसे व्यक्ति अच्छे व्यवहार के लिए बंधपत्र पर हस्ताक्षर कर दें तो उन्हें रिहा किया जा सकता है।  अब मजिस्ट्रेट को यह अधिकार दिया जायेगा कि वह कथित आरोपी से जमानती मांगे जिसे पेश करना उसके लिये कठिन और जटिल काम होगा।  इस अनुच्छेद के अंतर्गत हजारों-लाखों गरीब जेलों में पड़े सड़ रहे हैं। अनुच्छेद 291-ए का संशोधन उस मजिस्ट्रेट को कोर्ट में गवाही देने के लिए बुलाये जाने पर पाबंदी लगाता है जिसके सामने पहचान-परेड हुई जिसे आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम में ऐसे कुछ अरचनात्मक परिवर्तन किये जाने के प्रयास हैं। राज्य के लिये बेहतर उपाय यह होगा कि वह स्वाधीनता दिवस पर एक लाख गरीब कैदियों को जेल से मुक्ति दिलाए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-2743078249389296758?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/2743078249389296758/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=2743078249389296758' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/2743078249389296758'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/2743078249389296758'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_7506.html' title='सुनवाई की हो समय-सीमा - कॉलिन गोन्साल्विस'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-390788887410678445</id><published>2007-10-08T08:16:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:18:42.786-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिओ पॉल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानून'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='केरल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानस मंथन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पश्चिम बंगाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जोश गैमन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाब'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृति राय'/><title type='text'>मानस मंथन - जोश गैमन</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;फौजदारी न्याय पर राष्ट्रीय परामर्श के अंतर्गत नई दिल्ली में देश भर के कानूनविदों ने आरोपियों को कानून से प्राप्त संरक्षण सीमित करने की कोशिशों पर चर्चा की। इस पर जोश गैमन की रिपोर्ट&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;नयी दिल्ली में 2 और 3 जून 2007 को फौजदारी न्याय सुधार विषय पर आयोजित पहले राष्ट्रीय परामर्श में देश भर के कानून विशेषज्ञों और अधिकारियों ने भाग लिया। बहुप्रतीक्षित आयोजन इंडिया इंटरनैशनल सेंटर में हुआ जिसमें बारी-बारी से प्रतिष्ठित कानूनविदों ने अपने प्रभावपूर्ण विचार व्यक्त किए। दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक न्यायालय के न्यायमूर्ति मोहम्मद जकरिया याकूब भी इस आयोजन में उपस्थित थे और उन्होंने विभिन्न विषयों पर सारगर्भित विचार रखे। शनिवार 2 जून 2007 को न्यायालय के निर्णयों और सुधार समितियों पर आयोजित सत्र में परामर्श की शुरुआत हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता धैर्यशील पाटील (महाराष्ट्र) ने उच्चतम न्यायालय के हाल ही के कुछ उन निर्णयों पर चर्चा की जिनसे हाल के वर्षों में आरोपियों के फौजदारी कानून संरक्षण पर कुठाराघात किया गया है। इसके बाद प्रोफेसर बीबी पांडे (नई दिल्ली) ने मलिमथ समिति की रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए इसकी कडे से कडे शब्दों में आलोचना की।&lt;br /&gt;दूसरे सत्र में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम 2005 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम 2006 पर विशेष रूप से चर्चा की गई। एडवोकेट राजीविंदा सिंह बैंस (पंजाब), कृति राय (पश्चिम बंगाल), जिओ पॉल (केरल), पीके इब्राहिम (केरल), डॉ पी चन्द्रशेखरन (बंगलौर), वरिष्ठ एडवोकेट और पीयूसीएल के अध्यक्ष केजी कन्नाबीरन (आंध्रप्रदेश) सहित अन्य एडवोकेट ने भी अपने विचार व्यक्त किए।&lt;br /&gt;शनिवार के अंतिम सत्र में विभिन्न मानव अधिकार आयोगों और मानव अधिकार न्यायालयों के विषय पर चर्चा की गई। एडवोकेट नवकिरण सिंह (पंजाब), अब्दुल सलाम (केरल), गीता डी (तमिलनाडु), अनिल ऐकारा (केरल) तथा इरफान नूर (श्रीनगर, कश्मीर) ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और राज्य मानव अधिकार आयोगों के साथ के अनुभवों पर चर्चा की और ये सभी एडवोकेट इस तथ्य पर सहमत थे कि आयोगों के कामकाज में खामियां हैं। परामर्श के प्रथम दिवस का समापन भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएम अहमदी द्वारा दी गई प्रस्तुति और दक्षिण अफ्रीका के फौजदारी न्याय सुधार पर न्यायमूर्ति याकूब के भाषण के साथ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;रविवार 3 जून 2007 को राष्ट्रीय परामर्श के दूसरे दिन सशस्त्र बलों सहित सरकारी कर्मचारियों और एजेन्सियों को आपराधिक अपराधों से मिले संरक्षण विशय पर चर्चा शुरू हुई। केजी कन्नाबीरन (आंध्रप्रदेश) ने चर्चा की अध्यक्षता की। के बालगोपाल (आंध्रप्रदेश) ने पुलिस प्रताड़ना, आचरण और संरक्षण में आ रही कमी के बारे में सारगर्भित जानकारी दी और प्रकाश डाला। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt; 3 जून के दूसरे और राष्ट्रीय परामर्श के पांचवें सत्र में पुलिस सुधारों पर चर्चा की गई। इसमें एडवोकेट वृंदा ग्रोवर (नई दिल्ली), प्रोफेसर एसएम अफजल कादरी (श्रीनगर, कश्मीर), एडवोकेट अशोक अग्रवाल (नई दिल्ली), महेन्द्र पटनायक (उड़ीसा), खाइदेम मणि (मणिपुर) और राष्ट्रीय मानव अधिकार के पूर्व महानिदेशक अन्वेषण शंकर सेन ने विचारों का आदान-प्रदान किया। प्रकाश सिंह के मामले, पुलिस सुधार पर सोली सोराबजी की रिपोर्ट, पुलिस दर्ुव्यवहार और प्रशासनिक नियंत्रण, सुधार की सिफारिशों तथा अन्य संबंधित विषयों पर चर्चा की गई। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt; छठे सत्र में कानूनी सहायता सेवा प्राधिकरणों पर चर्चा की गई। राष्ट्रीय और राज्य स्तर के कानूनी सहायता सेवा प्राधिकरणों के कामकाज की समीक्षा की गईं और सुधार के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की गई। इस सत्र में एडवोकेट गीता रामशेषन (तमिलनाडु), एआर हनजूरा (श्रीनगर, कश्मीर) और नारायण सामल (उड़ीसा) ने इस सत्र में विचारों का आदान-प्रदान किया। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt; सातवें सत्र में लोक अदालतों और त्वरित न्याय के न्यायालयों पर चर्चा की गई। इस सत्र में भी इन अदालतों के कामकाज की समीक्षा की गई और सुधार के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की गई। एडवोकेट मीना गोडा (मुम्बई), पीके अवस्थी (उत्तरप्रदेश), डीबी बीनू (केरल), डॉ अर्चना अग्रवाल (दिल्ली) और विजय हिरेमठ विचारों का आदान-प्रदान करने वालों में सम्मिलित थे।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt; आठवें और अंतिम सत्र में साम्प्रदायिक हिंसा रोक, नियंत्रण और पीड़ित पुनर्वास विधेयक-2005 पर चर्चा की गई। विधेयक का विश्लेषण और मूल्यांकन किया गया तथा कई परिवर्तनों की सिफारिश की गई। हर्ष मंदर (नई दिल्ली) और एडवोकेट शीला रामनाथन (कर्नाटक) ने भी चर्चा में भाग लिया।  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-390788887410678445?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/390788887410678445/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=390788887410678445' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/390788887410678445'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/390788887410678445'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_1382.html' title='मानस मंथन - जोश गैमन'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-8983381591592200595</id><published>2007-10-08T08:13:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:15:40.359-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दृष्टिकोण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यातना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परिवर्तन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुलिस पूछताछ'/><title type='text'>आगे आयें मानवाधिकार संगठन - न्यायमूर्ति एएम अहमदी</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;मानवाधिकार संगठनों को पुलिस हिरासत में लंबी और कड़ी पूछताछ के दौरान यातना के विरुद्ध सक्रिय रवैया अपनाना चाहिए, कह रहे हैं न्यायमूर्ति एएम अहमदी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में 1973 में दंड प्रक्रिया संहिता का संशोधन किया गया। मामला यहीं पर समाप्त नहीं होता। हम पिछले कई वर्षों से इस पर प्रयोग कर रहे थे। पहले हमारे यहां एक प्रक्रिया थी जिसे सुपुर्दगी प्रक्रिया  कहा जाता था। यह व्यवस्था हमने अंग्रेजों से ली थी।&lt;br /&gt;सुपुर्दगी की प्रक्रिया  भारतीय परिस्थितियों में विकसित हुई थी। इसमें कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। उदाहरण के लिए, जैसे ही कोई अपराध होता है और आरोपपत्र तैयार किया जाता है, महत्त्वपूर्ण गवाहों जैसे कि प्रत्यक्षदर्शियों से तत्काल मजिस्टे्रट  की अदालत में शपथ पर बयान  लिए जाते हैं। प्रत्यक्षदर्शी का बयान इसलिए लिया जाता है ताकि अगर वह अपने बयान से पलट जाए तो उसकी इस गवाही पर विचार किया जा सके। दो बयानों के आधार पर तुलना की जाती है अगर वे परस्पर विरोधी हैं, तो यह आसानी से प्रमाणित किया जा सकता है कि गवाह प्रभावित हो गया है या दूसरे पक्ष से मिल गया है। पर, अब इस व्यवस्था को बदल दिया गया है। सुपुर्दगी प्रक्रिया समाप्त कर दी गई है और गवाहों के बयान फौरन दर्ज करने का काम नहीं होता। उस अधिकारी के विरुध्द कोई कार्रवाई नहीं की जाती जो अभियोगपत्र समय पर दाखिल नहीं करता। उससे कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मांगा जाता। जब मैं सेशन जज था, मेरे सामने शुरू में आने वाले मुकदमों में एक सनसनीखेज मुकदमा था। मेरे कुछ साथियों ने यहां तक कहा कि मुझे इस मुकदमें से अलग रहना चाहिए। इस मामले में एक अत्यंत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल था। मुकदमे के अंत में मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि 22 गवाहों में से आठ या नौ को कोई जानकारी ही नहीं थी।  इस आशय के लिखित प्रमाण थे जो सिध्द करते थे कि उनको आठ बजे कस्टडी में लिया गया था, जबकि अपराध दो घंटे बाद 10 बजे हुआ था।  एक युवा न्यायाधीश के रूप में इस घटना से मुझे जबरदस्त आघात लगा। मैंने संबंधित अधिकारी के विरुध्द एक पैरा लिखा और उच्च न्यायालय में महाअधिवक्ता ने इस विषय को उठाया। सौभाग्यवश उच्च न्यायालय ने मेरी राय को अधिक मजबूत करके प्रकट किया। मैं इस घटना का उल्लेख केवल इसलिए कर रहा हूं क्योंकि उन दिनों जांच उपयुक्त ढंग से की जाती थी। संबंधित अफसर से तत्काल जवाब मांगा गया, विभागीय जांच का आदेश दिया गया और अंत में उसे हटा दिया गया। आज, इस तरह की कार्रवाई नहीं होती क्योंकि वरिष्ठ अफसरों में से अधिकतर को चोटी के राजनीतिज्ञों अथवा अन्य का संरक्षण प्राप्त है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;जब मैं वेतन आयोग में काम कर रहा था और पुलिस बल के सदस्यों का वेतन निश्चित कर रहा था उनमें से कुछ मेरे पास आए और अपनी समस्याओं के बारे में मुझसे बातचीत की। उन्होंने साफ कहा, ''श्रीमन, हम क्या कर सकते हैं, हम लोग लाचार हैं। हमारे ऊपर इतना अधिक दबाव है। अगर हम उनकी बात न मानें तो हमारी बदली कर दी जाएगी। बदली के बाद हमें नई जगह में दूसरे लोगों के दबाव का सामना करना होगा। ऐसा लगता है हमें कभी इससे मुक्ति नहीं मिलेगी''। समय बीतने के साथ समूचे विभाग में ऐसा हो रहा है। और, यह स्थिति दिनों-दिन बदतर होती गई है।&lt;br /&gt;पर हम इस पर दूसरे नजरिये से भी विचार करें। पुलिस बल भी दिनों-दिन निर्दयी होता जा रहा है। यह निर्दयता इतनी खतरनाक है कि किसी ने एक बार मुझसे कहा कि आज अगर आप पुलिस स्टेशन में शिकायत लिखाने जाएं तो आप अभियुक्त बन कर लौटेंगे। अत: सवाल यह है कि हमारे पुलिस अधिकारियों को कितने विवेकाधीन अधिकार दिए जा सकते हैं? पिछले कुछ समय से हम पाते हैं कि विवेकाधीन अधिकार बढ़ रहे हैं और चुप रहने के अधिकार को कम किया जा रहा है। वास्तव में, साक्ष्य या गवाही अधिनियम की धारा 113 के अन्तर्गत खास तरह की धारणा का मामला उठाकर इसका प्रभाव कम कर सकते हैं। इस सबका अर्थ  यह है कि एक समाज के रूप में हम विकट स्थिति में फंस गए हैं। अब बताएं कि सिविल सोसाइटी अथवा इस देश की जनता को इस तरह की यातनाओं से कैसे बचाएं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;जब न्यायमूर्ति वेंकटचलैया ने  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का पदभार संभाला तो उन्होंने अपनी पहली बैठक का उद्धाटन करने के लिए मुझे निमंत्रित किया। अपने उद्धाटन भाषण में मैंने अध्यक्ष से कहा कि वह इस देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में मानव अधिकारों की संस्कृति फैलाने पर अधिक ध्यान दें। जब तक वह ऐसा नहीं करेंगे वह एक मजिस्टे्रट की अदालत का, या अधिक से अधिक एक सेशन जज की अदालत का काम करेंगे, क्योंकि वह केवल उन मामलों को लेंगे जिन्हें वह मानव अधिकारों का उल्लंघन कहेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हम मानव अधिकारों की संस्कृति को बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं जिससे मानव अधिकाराें का उल्लंघन न हो? यह आशा की जाती है कि हम मामलों की संख्या न बढ़ाएं लेकिन ऐसा हो रहा है। और, हम इस समय, जिस समस्या का सामना कर रहे हैं वह यह है कि मानव अधिकार आयोगों ने अपना कर्तव्य निभाना बंद कर दिया है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;मैं जो बात कहना चाहता हूं वह यह है कि कानून ठीक बनाया गया है, विधान ठीक बनाया गया है, प्रक्रिया संहिता ठीक है, लेकिन हम जिस तरीके से इनको लागू करते हैं वह ठीक नहीं है। और हम कानूनों को कमजोर करने में दक्ष हैं। इस प्रकार जैसे ही एक मजबूत कानून बनाया जाता है उसे कमजोर करने की प्रक्रिया फौरन शुरू हो जाती है। अंत में हम, उस स्थिति में पहुंचते हैं, जहां हम निराश होकर कहते हैं, ''आप इस बारे में कुछ नहीं कर सकते अत: परेशान मत होइए।''&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अगर हम मानव अधिकारों की परिभाषा और संविधान के अनुच्छेद 21 को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि मानव अधिकार संगठनों को केवल सिफारिश करने के अधिकार हैं। लेकिन, इस क्षेत्र के संगठन जो उद्यमी हैं वे पहल कर सकते हैं और काम कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश भारत में अधिकतर मानव अधिकार संगठन अपना कार्य विचार गोष्ठियों और बौध्दिक चर्चा तक सीमित रखते हैं। मुंबई को देख्एि। क्या उन्होंने एक भी व्यक्ति पर मुकदमा चलाया? गुजरात में क्या हुआ? क्या उन्होंने बहुसंख्यक समुदाय के किसी एक भी व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जो इन दंगों के लिए जिम्मेदार था। इस प्रकार निश्चय ही मानव अधिकार अधिनियम को मजबूत बनाने का ईमानदार  प्रयत्न किया जाना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;न्यायमूर्ति ए एस आनंद ने धारा 30 का इस्तेमाल करके उच्चतम न्यायालय में आवेदन किया जिसके परिणामस्वरूप बेस्ट बेकरी निर्णय हुआ। इसका अर्थ है कि मानव अधिकारों की रक्षा के संबंध में कुछ गंभीर कार्य किए जाने की निश्चित संभावना है। इसलिए विचार गोष्ठियों में चर्चा करने की अपेक्षा हमें यह देखना चाहिए कि वे लोग जो हिंसा करते हैं या लोगों की हत्या करते हैं, उन पर मुकदमा चलाया जाए। हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस पूछताछ के दौरान यातना देकर मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो। और, राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो कोई भी इस दिशा में पहल करता है उसे पुलिस का पूरा सहयोग मिले।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार हम हर स्तर पर दृष्टिकोण में परिवर्तन की चर्चा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए पुलिस को अपराधों पर नियंत्रण करने के अपने तरीकों को बदलना है। यहां तक कि मानव अधिकार संगठनों को भी यह सुनिश्चित करना है कि वे पहल करना शुरू करें। तभी स्थिति में सुधार होगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#339999;"&gt;-लेखक भारत के प्रधान न्यायाधीश रह चुके हैं&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-8983381591592200595?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/8983381591592200595/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=8983381591592200595' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8983381591592200595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8983381591592200595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_9092.html' title='आगे आयें मानवाधिकार संगठन - न्यायमूर्ति एएम अहमदी'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-9176277462505411554</id><published>2007-10-08T08:09:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:12:25.831-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुलिस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='के बालागोपाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आतंक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यातनाओं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुकदमों'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानून-व्यवस्था'/><title type='text'>पुलिस राज का आतंक - के बालागोपाल</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो सरकार और न ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं पुलिसिया जुल्म के मुद्दे को तवज्जो देती दिखाई दे रही हैं। प्राय: देखा गया है कि पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये और कानूनी अतिवाद के जरिये आम आदमी के मानवाधिकारों को कुचला जा रहा है। जब तक हम इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक सरकारी मशीनरी बेकसूर लोगों को कानून-व्यवस्था के बहाने मुकदमों, यातनाओं और मृत्युदंडों का कोपभाजन बनाती रहेगी बता रहे हैं के बालागोपाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह बेहद दुखदायी है कि हमारे मुल्क में कानूनी अतिवाद के चलते होने वाली मौतों, गुमशुदगियों और हिरासत में दी जाने वाली यातनाओं से जुड़ी घटनाओं में हर साल इजाफा होता जा रहा है। अकेले आंध्र प्रदेश में ही पुलिस उत्पीड़न, हिरासत में मौत और फर्जी मुठभेड़ों के वाकिये इतने बढ़ गए हैं कि वहां का आम आदमी खासा आतंकित हो चला है। राज्य के सीमावर्ती इलाकों में जाकर कोई भी देख सकता है कि किस प्रकार कथित नक्सलवादी होने के आरोपों के बीच वहां के लोग यातनाओं और गिरफ्तारियों के खौफ में जी रहे है। पुलिस उत्पीड़न की कथाएं लोगों की जुबान पर स्थायी जगह बना चुकी हैं। नक्सलियों के बारे में पुलिस को सूचनाएं देने के लिए ग्रामीणों को यह कहकर निरंतर डराया और सताया जाता है कि यदि वे अपनी खैर चाहते हैं तो पुलिस को नक्सलियों और उनकी कारगुजारियों की जानकारी दें। पुलिस की छवि यह हो चली है कि लोग झूठी-सच्ची कुछ भी सूचनाएं देंगे, तभी उसकी खौफनाक यातनाओं से बच सकेंगे। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर और पंजाब दो ऐसे राज्य हैं, जहां लापता लोगों की संख्या हजारों में है। वहां पुलिस द्वारा ढाये जाने वाले जुल्म और ज्यादतियां सामान्य सी बात हो चली हैं। आंध्र प्रदेश में आमतौर यातना का जो तरीका अपनाया जाता है, वह है शरीर के संवेदनशील हिस्सों को बिजली के करंट से दागना। शारीरिक पिटाई की बजाय विद्युत करंट का यह तरीका पीड़ित को आजीवन विकलांग बना देता है, इस कारण लोग इस तरीके से बेहद खौफ खाते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार देखा जाए तो पुलिस, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को अपराध की खुली छूट हासिल है। बेशक अपराध कोई भी व्यक्ति कर सकता है, परंतु बच निकलना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। यह सुविधा कुछ चुनिंदा लोगों को ही हासिल है। बच निकलने की यह आजादी ही किसी अपराध को गैरअपराध के बराबर ला खड़ा करती है। देश के सुरक्षा बलों के साथ-साथ विशेष कृपापात्र गिरोह, जैसे छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम इत्यादि इसी कतार में हैं। वे कानून की परिधि से बाहर हैं यानी जुर्म तो कर सकते हैं, पर सजाएं नहीं पा सकते। यह सिलसिला साल दर साल और दशक दर दशक बदस्तूर जारी है, पर न जाने क्यों न तो हमारे राजनेता और न ही न्यायपालिका इसे रोकने की दिशा में कार्रवाई करते दिखाई देते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अनुच्छेद 226 के मातहत देश का सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों के उच्च न्यायालय ब्रिटिश रिट याचिका कानून के मुकाबले जनता को अधिक व्यापक न्यायाधिकार मुहैया कराते हैं। भारत जैसे न्यायप्रिय मुल्क में न्यायाधिकार का यह व्यापक स्वरूप जरूरी भी है। लेकिन आखिर क्या वजह है कि हमारे न्यायालय धरातल पर इस व्यवस्था का अक्षरश: पालन करते नजर नहीं आते? वे चाहें तो अलहदा स्थापनाओं के लिए अनुच्छेद 226, जो कि उन्हें व्यापक क्षेत्राधिकार देता है, की व्याख्या को आधार बना सकते हैं। लेकिन उन्हें यह रास्ता रास नहीं आता। इसकी बजाय आश्चर्यजनक ढंग से वे पुलिसिया-जुल्म से पीड़ित पक्ष को संबधित मामले में अलग से निजी शिकायत दर्ज करने का निर्देश देते हैं। फौजदारी अदालतों में इस तरह की शिकायतों की सुनवाई का कोई अलग तरीका नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के तरीके भी अलग-अलग हैं। इनमें एक है, व्यक्ति द्वारा दर्ज शिकायत पर संज्ञान लेना। जबकि मजिस्ट्रेट द्वारा मात्र फोन कॉल प्राप्त करना ही संज्ञान के लिए पर्याप्त है। मुकदमे की सुनवाई प्रारंभ करने के मद्देनजर दोनों तरीकों में अंतर करने का कोई कारण नहीं है। मुकदमा महज जांच चाहता है। जाहिर सी बात है कि साधारण नागरिक को किसी और के घर की तलाशी लेने, वहां किसी वस्तु को जब्त करने और किसी व्यक्ति को हिरासत में लेकर पूछताछ करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी फोरेंसिक विशेषज्ञ को किसी मामले में रिपोर्ट पेश करने को कहने का अधिकार नागरिकों को नहीं है। ऐसे में कोई नागरिक निजी तौर पर अभियोग कैसे चला सकता है? ऐसा नहीं है कि अदालतें इस बारे में अनभिज्ञ हैं। वे सब कुछ जानती हैं और कर सकती हैं, पर वे इस मामले में आगे न जाने का निश्चय कर चुकी हैं। उनके लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण किसी गैरकानूनी हिरासत को कानूनी जामा पहनाने का अस्त्र होता है और वे इसके पार नहीं जाना चाहतीं। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी अन्य संस्थाओं के समक्ष भी यही हिचक है। जहां तक उत्पीड़न का मामला है, भारतीय दण्ड संहिता यानी आईपीसी स्वयं इसे दंडनीय करार देती है। इसके लिए किसी ऐसे नये कानून की आवश्यकता नहीं है जिसके अंतर्गत, किसी खास सूचना को उगलवाने के लिए दी जाने वाली यातना को अपराध की श्रेणी में लाया जा सके। आईपीसी के तहत यह पहले से ही संगीन जुर्म की श्रेणी में है। यदि यातना के दौरान गंभीर चोट आती है तो दोषी को 10 साल तक की सजा का प्रावधान है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज से करीब 30 साल पहले विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में मौत का शिकार होता है तो कानूनी रूप से इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार माना जाएगा। लेकिन इस सिफारिश को हम आज भी अपने कानूनी संशोधनों में शामिल नहीं कर सके हैं। वैसे भी मानवाधिकारों को शक्ति प्रदान करने वाले संशोधनों को कानून में शामिल करने की इजाजत यदा-कदा ही मिल पाती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आपराधिक दण्ड संहिता में 2006 के प्रस्तावित संशोधनों के अंतर्गत डी बसु के दिशा-निर्देश शामिल किए गए जिनमें पुलिस के लिए कार्रवाई की सीमाएं तय की गई हैं। लेकिन इन दिशा-निर्देशों के उल्लंघन की सूरत में संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सजा अथवा अभियोग का प्रावधान इनमें शामिल नहीं है। इस प्रकार देखा जाए तो यह आपराधिक दण्ड संहिता में दर्ज प्रक्रिया या अन्य नियमों जैसा ही है।&lt;br /&gt;दरअसल हमारे पास अभी तक इस दिशा में अपनाने अथवा लागू करने के लिए कोई निश्चित पद्धति नहीं है। गिरफ्तारी की कोई प्रारंभिक अवस्था नहीं होती। डी बसु के दिशा-निर्देशों में से अरेस्ट मेमो वाले निर्देश को जरूर अपनाया जाता है। इस निर्देश के तहत मेमो उस दिन जारी करना आवश्यक है जिस दिन अभियुक्त को कोर्ट में पेश किया जाना है। बेशक पीड़ित व्यक्ति 10-15 दिन से पुलिस हिरासत में रहता आया हो, परंतु उसकी गिरफ्तारी प्राय: उसी रोज दिखाई जाती है, जिस रोज उसे अदालत में पेश किया जाना हो। मामले की कानूनी औपचारिकताएं पूरा करने की दिशा में पूरी चालाकी बरतते हुए पीड़ित के परिजनों से गिरफ्तारी की तिथि दर्शाने वाले मेमो पर दस्तखत लिए जाते हैं। परिजन सब कुछ जानते हुए भी दस्तखत करने को विवश होते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का भय रहता है कि यदि उन्होंने पुलिस की बात नहीं मानी तो पीड़ित व्यक्ति अवैध ढंग से हिरासत में ही नर्क भोगता रहेगा और अदालत का दरवाजा कभी नहीं देख सकेगा।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से डी बसु के दिशा-निर्देश अवैध गिरफ्तारी को वैध ठहराने का उपकरण बनकर रह गए हैं। यदि कल को कोई व्यकित इस अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो अदालत यही कहेगी कि पीड़ित की पत्नी या अन्य परिजन ने दस्तखत कर यह प्रमाणित किया है कि गिरफ्तारी फलां तारीख को हुई है, न कि उससे दस दिन पहले। ऐसी सूरत में सवाल यही है कि असल अपराधी कौन है और अभियोग किस पर चलना चाहिए? हम सभी इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि इस मुल्क में किसी पुलिस अधिकारी पर मुकदमा चलाना और इसे जारी रखना लगभग नामुमकिन है क्योंकि वह कानून की परिधि से बाहर समझी जाने वाली उस जमात का हिस्सा है जिसे निर्द्वंद्व अत्याचार की इजाजत हासिल है और सरकार चुपचाप खड़ी तमाशा देखने को अभिशप्त है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;हमारे कानून के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को अपनी अलग जांच मशीनरी स्थापित करने की इजाजत हासिल है। मानवाधिकार हनन से जुड़े मामलों की शिकायत मिलने की सूरत में आयोग इस मशीनरी का इस्तेमाल कर सकता है। यह व्यवस्था राज्य मानवाधिकार आयोगों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग दोनों के लिए है। लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच मशीनरी काफी भारी-भरकम है जिसमें अवकाश प्राप्त पुलिस महानिदेशक व अन्य भूतपूर्व आला पुलिस अफसरों की नियुक्ति की जाती है। ये अधिकारी संबंधित मामले की निष्ठावान जांच के आदेश तो दे सकते हैं, परंतु खुद जांच कार्य नहीं कर सकते। ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए जो कि पूरी सक्रियता के साथ जांच कार्य में असल भूमिका निभा सकते हैं। मानवाधिकार हनन के तमाम गंभीर मामलों की ठोस जांच यदि करनी है तो इसके लिए बड़ी संख्या में इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारियों को भर्ती करना होगा। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये भर्तियां अलग से हों, न कि केंद्र अथवा राज्य पुलिस बलों से अधिकारियों का स्थानांतरण करके। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सेमिनार और इसी प्रकार के अन्य मंचीय बहस-मुबाहिसों को आयोजित करने वाली संस्था बनकर रह गया है। बेशक इसके पास जांच कार्य और उस आधार पर सिफारिशें करने का अधिकार है, लेकिन इनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और ये दूर के ढोल जैसे साबित हुए हैं। आयोग को चाहिए कि वह मानवाधिकार हनन के तमाम मामलों को समीक्षा के लिए अपने अधीन ले और संजीदगी से इनकी पड़ताल करे। आयोग खुद को सिर्फ पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों द्वारा अंजाम दिए जाने वाले मानवाधिकार हनन के मामलों तक सीमित न रखे। पर अभी तक तो वह इस दिशा में आगे बढ़ता नजर नहीं आता क्योंकि यातनाओं का सिलसिला बेखौफ जारी है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;हिरासत में मौत के मामले दहेज हत्या के अपराध जैसे ही हैं। मानवाधिकार हनन से जुड़े ये मामले किसी नरसंहार व हत्या के अपराधों की श्रेणी से अलग नहीं माने जा सकते। लेकिन अदालतें इन मामलों में पहल से कतराती रही हैं क्योंकि उन्हें और राजनेताओं को नहीं लगता कि ये अपराध की श्रेणी में आते हैं। यही वजह है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के तमाम प्रयासों और शहादतों के बावजूद पंजाब और कश्मीर में ऐसे तमाम मामले अनसुलझे पड़े हैं और लोगों के लापता होने की घटनाएं निरंतर जारी हैं। प्रशासन के पास इसका रटा-रटाया जवाब है कि ये लोग भारत में आतंकवादी गतिविधियाें के संचालन के लिए हथियार लाने के इरादे से नियंत्रण रेखा को पार कर गायब हो जाते हैं। लेकिन पुलिस से कोई यह नहीं पूछता और न उसके पास इसका कोई उत्तर है कि जो व्यक्ति उसकी हिरासत में था, वह चंगुल से बचकर भला कैसे नियंत्रण रेखा को पार कर सकता है?&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पुलिस की यह दलील होती है कि वह जो भी कदम उठाती है, जनता को भरोसे में लेकर उठाती है। प्रचारित किया जाता है कि चंबल घाटी में लोगों के बीच पुलिस की छवि नायकों जैसी है। लेकिन यदि 1968 में चंबल घाटी में पुलिस के हाथों लगभग 1000 कथित डाकू मारे जाते हैं और 2007 में भी यह सिलसिला थमता नहीं दीखता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि कहीं न कहीं कुछ खोट जरूर है और जनता के भरोसे और सहमति की आड़ लेकर इस सारे उत्पीड़न और फर्जी मुठभेड़ों को वैध ठहराने की कोशिश की जाती रही है। जाहिर है कोई भी स्पष्टवादी व्यक्ति सशक्त पुलिस बल की मौजूदगी से क्यों इनकार करेगा। उसे ऐसा इसलिए भी जरूरी लगता है कि आमतौर पर समाज में असुरक्षा की भावना व्याप्त है। चाहे कारण जो भी हो, खासकर मध्यमवर्गीय लोगों में यह भावना घर किए हुए है कि हमारी फौजदारी न्याय प्रणाली शिथिल है। वे मानते हैं कि मानवाधिकारों की बात करने से अपराधों और अव्यवस्था में इजाफा होता है, सुरक्षा पर खतरा बढ़ने लगता है और नतीजतन पुलिस को सख्ती बरतनी पड़ती है। लोगों का यह भी विश्वास है कि कॉलेज जाने वाली छात्राओं के साथ मनचलों व अन्य गुंडा तत्वों द्वारा की जाने वाली छेड़छाड़ व अन्य हरकतों को रोकने के लिए सख्त पुलिस तंत्र का होना जरूरी है क्योंकि इन तत्वों से पुलिस ही निपट सकती है। लोग तो यह भी चाह सकते हैं कि पूरे देश में ऐसी पुलिस हो जो अपराधियों को पकड़कर उन्हें नंगा कर सड़कों पर घुमा सके। जब तक हमारे समाज का एक भी तबका इस मनोवृत्ति से ग्रसित है और हम उसे कोई संतोषजनक उत्तर देने की स्थिति में नहीं हैं, तब तक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते हमारे आपसी संवाद निरर्थक ही जान पडेंग़े।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#336666;"&gt;&lt;em&gt;लेखक जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-9176277462505411554?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/9176277462505411554/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=9176277462505411554' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/9176277462505411554'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/9176277462505411554'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_7655.html' title='पुलिस राज का आतंक - के बालागोपाल'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-8369633615131771488</id><published>2007-10-08T08:06:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:08:48.868-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्यायपूर्ण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉलिन गोन्साल्विस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुलिस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुधारना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निष्पक्ष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुनिया'/><title type='text'>जरूरी है पुलिस को सुधारना - कॉलिन गोन्साल्विस</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;भारत में पुलिस की लंबे समय से मांग है कि उसे राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाए। लेकिन यदि ऐसा करने से पहले स्वतंत्र नागरिक नियंत्रण व्यवस्था कायम नहीं की गयी तो वर्दी वाला यह बल पूरे समाज का प्रताड़क बन जाएगा, यह कह रहे हैं कॉलिन गोन्साल्विस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया भर में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण पुलिस बल सुनिश्चित करने की दिशा में पुलिस का दुराचरण दूर करने की खातिर एक स्वतंत्र नागरिक नियंत्रण तंत्र स्वीकार किया जा रहा है। फिर भी हमारे देश में पुलिस में सुधार की कोशिशें सरकार द्वारा नियुक्त समितियों द्वारा दी गई रिपोर्टों के सामने उलझनों में फंस गई हैं। इन रिपोर्टों का जोर इस बात पर है कि पुलिस बल को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाए। उच्चतम न्यायालय भी इन रिपोर्टों के प्रभाव में आ गया है।  वह पुलिस दुराचरण दूर करने के लिए ऐसे सार्वजनिक परिवाद प्राधिकरण का पक्षधर है जो प्रदेश मानव अधिकार आयोगों और अन्य कानूनी अधिकार प्राप्त संगठनों की मदद से काम करे।  &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;पर, सच में कोई दिन ऐसा नहीं आता जब प्रेस में पुलिस ज्यादतियों के बारे में कोई खबर न छपी हो।  पुलिस यंत्रणा व्यापक रूप से हो रही है। भ्रष्टाचार दैनिक क्रिया-कलाप का रूप ले चुका है। महिला-विरोधी प्रवृत्तियां हावी हैं।  यह सब हम जानते हैं। निठारी कांड में हुई हत्याओं से एक बार फिर पुलिस व्यवस्था में तेजी से सुधार लाने की जरूरत पर ध्यान केन्द्रित हुआ है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;देश में पुलिस को सुधारने का प्रयास तो हुआ है पर यह काम पुलिस को ही सौंपा गया है। इससे जनता क्षुब्ध है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्टों के अलावा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, विधि आयोग, रिबेरो कमेटी, पक्षनामा कमेटी और मलिमथ कमेटी ने भी इस संबंध में अपनी-अपनी सिफारिशें की हैं। अंतिम तीन कमेटियों में अधिसंख्य सदस्य गृह मंत्रालय के अधिकारियों में से थे।  इनमें जितनी भी बहस हुई वह पुलिस में सुधार के बारे में इस ओर ज्यादा झुकी थी कि पुलिस बल से राजनीतिक नियंत्रण को हटाने के सीमित प्रयास किए जाने चाहिए।  उच्चतम न्यायालय ने इन रिपोर्टों पर ही निर्भर रहते हुए अपने 22 सितमबर 2006 के निर्णय में गलती से यह कह डाला कि ''पुलिस के काम में ज्यादातर कमियां अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण रही हैं और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखना जरूरी है। पुलिस के दुराचरण के बारे में उच्चतम न्यायालय की राय यह है कि प्रदेश मानव अधिकार आयोग, लोक आयुक्त और प्रदेश लोक सेवा आयोगों की सिफारिशों के आधार पर चयन करके लोक परिवाद प्राधिकरण की स्थापना की जानी चाहिए।''&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;पुलिस बल को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करना एक बात है और उस पर स्वतंत्र रूप से नागरिकों का नियंत्रण एकदम अलग बात। ऐसे देश में जहां गरीब लोगों को रोजमर्रा पुलिस-यंत्रणा झेलनी पड़ती हो, यह अत्यंत जरूरी हो जाता है कि नागरिक-नियंत्रण का आशय अच्छी तरह समझ में आए और हर जगह पुलिस दुराचरण के विरुद्ध उसकी सुरक्षा का कवच विश्वसनीय रूप से स्वतंत्र रहे। प्रदेश मानव अधिकार आयोगों, जो कि दंतहीन बाघ जैसे हैं और प्राय: सरकार की सेवा में रत हैं और जिनकी हाल में मुख्य न्यायाधीश ने भी आलोचना की है, ऐसी संस्थाओं में आस्था रखने का सीधा अर्थ होगा सरकार द्वारा बिछाई गई नौकरशाही के शिकंजे में फंसना और पुलिस-सुधार की बात से पूरी तरह हट जाना।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;भारत में पुलिस बल की संरचना ब्रिटिश अर्द्धसैनिक बलों की तर्ज पर की गई है जो आज भी ज्यों की त्यों है और जो उपनिवेशों को आतंकित करने की दृष्टि से काम करते हैं।  ब्रिटिश साम्राज्य के टूट जाने के बाद ब्रिटेन की पुलिस में तो सुधार किए गए लेकिन उपनिवेश का पुलिस बल कल्पनातीत होकर भ्रष्टाचार और यंत्रणा को दिनोंदिन बढ़ाता रहा। भारत का पुलिस बल दुनिया के सर्वाधिक भ्रष्ट बलों में से एक है। बिना नागरिक-नियंत्रण के ढांचों और प्रक्रियाओं का परीक्षण किए उन्हें स्थापित कर देना और ऐसे आपराधिक ढांचे को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त कर देने का मतलब होगा किसी भी नागरिक को अंग्रेजी मुहावरे के अनुसार 'फ्राइंग पैन' से निकालकर सीधे आग में फेंक देना।  राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करके केवल नाममात्र के बेअसर ढांचों की देखरेख में यह आपराधिक बल समाज पर शासन करने आएगा।  उच्चतम न्यायालय के आदेश के साथ यह वास्तविक ताकत एक कानूनी ताकत भी बन जाएगी।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटेन में पुलिस सुधार अधिनियम, 2002 के चलते स्वतंत्र पुलिस परिवाद आयोग की स्थापना हुई है। मुख्य रूप से नागरिक जांचकर्ताओं की उसकी अपनी टीम पुलिस के खिलाफ मामलों की जांच करने जाती है। जांच के समय इन जांचकर्ताओं के पास पुलिस के पूरे अधिकार होते हैं। वे किसी भी दस्तावेज की छानबीन कर सकते हैं और पुलिस के सीमा क्षेत्र में कहीं भी प्रवेश कर सकते हैं। पुलिस अनुशासनात्मक सुनवाइयों के समय शिकायतें दर्ज करने वालों की ओर से आयोग भी मामले पेश कर सकता है। गंभीर मामलों की सुनवाई करने वाली समितियों (पैनल्स) की अध्यक्षता गैर-पुलिस स्वतंत्र नागरिक करते हैं। उत्तरी द्वीप में तो पुलिस बल के लिए एक लोकपाल की नियुक्ति भी की गई है। आस्ट्रेलिया में पुलिस के खिलाफ कम गंभीर शिकायतों पर नजर रखने के लिए न्यू साउथ वेल्स लोकपाल और गंभीर मामलों के लिए पुलिस विश्वसनीयता आयुक्त की नियुक्ति की गई है।  इस आयुक्त की नियुक्ति रॉयल कमीशन की रिपोर्ट के बाद की गई जिसमें कहा गया था कि भ्रष्टाचार का स्तर इतना ऊंचा हो गया है कि शिकायतें सुनने वाले वर्तमान ढांचे इस पर काबू पाने योग्य नहीं रह गए हैं।  पुलिस भ्रष्टाचार पर बाहर से निगरानी करने और पूरी तरह स्वतंत्र जांच करने की नितांत आवश्यकता है।  क्यूबेक में पुलिस एथिक्स कमिश्नर एक नागरिक एजेंसी है जो पुलिस अधिकारियों के आचरण पर नजर रखती है। पुलिस एथिक्स कमेटी एक विशेष प्रकार का प्रशासनिक ट्राइब्यूनल है जो नागरिकों की, पुलिस के साथ उनके ताल्लुकातों और संबंधों में, रक्षा करता है।  ब्रिटिश कोलंबिया में पुलिस परिवाद आयुक्त का कार्यालय स्वतंत्र एजेंसी है जो पुलिस के खिलाफ शिकायतों पर नजर रखने के लिए बनाया गया है। रॉयल कनेडियन माउंटेड पुलिस के खिलाफ सार्वजनिक शिकायतों के लिये बना आयोग घुड़सवार पुलिस की नागरिक समीक्षा पेश करता है और इसे एक स्वतंत्र संगठन की तरह वहां की संसद ने स्थापित किया है।  दक्षिण अफ्रीका ने 1990 में लोकतांत्रिक देश बनने के बाद अपने जातीय और हिंसक पुलिस बल में सुधार करने का काम हाथ में लिया।  पुलिस को जिम्मेदार बनाने में जुटे सभी संस्थानों में स्वतंत्र परिवाद निदेशालय की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है यद्यपि उसके स्वतंत्र होने के बारे में अब भी प्रश्न उठते रहते हैं। न्यूजीलैंड में स्वतंत्र पुलिस परिवाद प्राधिकरण को स्वतंत्र पुलिस निरीक्षालय में मिला देने की मांग जोरों पर है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इसलिए उच्चतम न्यायालय को पुलिस रिपोर्टों पर निर्भर रहने की बजाय अपनी दृष्टि को व्यापक बनाना होगा और पुलिस के दुराचरण की जांच के लिए एक स्वतंत्र तंत्र के साथ पुलिस पर नागरिकों के कारगर नियंत्रण की स्थापना में सहयोग देना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-8369633615131771488?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/8369633615131771488/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=8369633615131771488' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8369633615131771488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8369633615131771488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_5574.html' title='जरूरी है पुलिस को सुधारना - कॉलिन गोन्साल्विस'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-3023024717854009165</id><published>2007-10-08T07:57:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T08:05:23.352-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रान्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तथ्यों'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एनलिसिस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='काल्पनिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नार्को'/><title type='text'>ड्रग्स से सच उगलवाने का सफेद झूठ - पी चन्द्रशेखरन</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#003333;"&gt;फोरेंसिक साइंस के विशेषज्ञों का कहना है कि सच उगलवाने के लिए किसी अभियुक्त के शरीर में ड्रग्स का इस्तेमाल गैर-जरूरी है। जब पुलिसकर्मी पूछताछ के दौरान नार्कोअनलिसिस जैसे बाध्यकारी तरीकों का इस्तेमाल करते हैं तो वे कानून से ऊपर नहीं हो जाते। पूछताछ की किसी भी कार्रवाई में मानवाधिकारों की हिफाजत के सवाल को ताक पर नहीं रखा जा सकता, पी चन्द्रशेखरन का विश्लेषण&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी अपराध की तहकीकात के क्रम में अभियुक्त से पूछताछ संबंधित केस का एक अहम पहलू होता है। पूछताछ यह एक तरह की कला होती है, जिसमें पारंगत होने के लिए काफी अध्ययन और तजुर्बा जरूरी है। पूछताछ उस सूरत में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है,जब किसी मामले में जांच एजेंसी के पास साक्ष्य नहीं होते या होते भी हैं तो उन्हें पर्याप्त नहीं माना जाता। पुलिस और अन्य जांचकर्ता किसी भी मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए पूछताछ को सबसे श्रेयष्कर साधन मानते हैं। सभ्य मुल्कों में यह सर्वस्वीकार्य मानदंड है कि नैतिक और व्यावहारिक दोनों तरह के कारणों से किसी भी जांचकर्ता को चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, पूछताछ के बाध्यकारी तरीकों को अपनाने का इकतरफा अधिकार नहीं है। बाध्यकारी तरीकों को प्रश्रय देने के इरादे से अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इससे अनभिज्ञ रखना या उनसे इजाजत न लेकर यदि उसे लगता है कि वह बच निकलने का तरीका ढूंढ़ लेगा तो ऐसा संभव नहीं है। यह स्थिति उसे और गहरे संकट में धकेल सकती है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;एक साधन के रूप में पूछताछ को बहुत भरोसेमंद विकल्प नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें कई तरह की कठिनाइयां पेश आती हैं। मसलन संदिग्ध अथवा साक्षी के बयान को सच्चाई की कसौटी पर परख पाना उसकी यादाश्त का मूल्यांकन, शारीरिक और मानसिक अवस्थाएं और व्यक्ति के नजरिये की वजह से उत्पन्न समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाना, इत्यादि। इन चुनौतियों से निपटने के लिए ही पूछताछ के बाध्यकारी तरीकों और उपकरणों का सहारा लिया जाता है। यह बात सच है कि मनोविज्ञान व भौतिक विज्ञान ने पूछताछ के पुलिसिया तौर-तरीकों की तकनीक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन दुर्भाग्य से इसने सच उगलवाने वाली तकनीकों के एक छद्मविज्ञानी स्वरूप को भी जन्म दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#336666;"&gt;बाध्यकारी तौर-तरीके&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पूछताछ के दौरान जिन उपलब्ध तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, हमें उनके बुनियादी पहलुओं की जानकारी होना जरूरी है। बाध्यकारी तरीकों का उपयोग सिर्फ प्रतिरोधी के आंतरिक मतभेदों को उजागर करने और उसे खुद से जूझने की अवस्था में पहुंचाने के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि उसकी इस क्षमता में इजाफे के लिए बाहरी बल की मदद लेने में भी किया जाता है। गिरफ्तारी, नजरबंदी, अलग कोठरी में रखना, इंद्रिय उद्दीपन अथवा इससे मिलते-जुलते तरीके, डराना-धमकाना, क्षीणता, दर्द, हाइपोनिसिस, नार्कोसिस और कुंठा पैदा करना इत्यादि तरीके बाध्यकारी उपायों की श्रेणी में ही आते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;यदि हम पुलिस जांच के इतिहास में झांकें तो पूछताछ में शारीरिक यातना यानी थर्ड डिग्री प्रैक्टिस को ज्यादा आजमाया जाता रहा है और यह विश्वास किया जाता रहा है कि पेचीदा और लंबे मामलों में सीधे तरीके अपनाकर जल्द नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। सर जेम्स स्टीफन ने 1883 में भारतीय पुलिस की थर्ड डिग्री प्रैक्टिस का डरावना उदाहरण देकर कहा था ''साक्ष्यों की तलाश में धूप में निकलने से कहीं बेहतर है, छाया में आराम से बैठकर अभियुक्त की आंखों में लाल मिर्ची डालना''।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#00cccc;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नार्को-एनालिसिस&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;हाल के वर्षों में हमारे देश के पुलिस अधिकारी कुछेक छद्मविज्ञानियों के प्रलोभनों में फंसकर अपराध कबूल करबाने के लिए नार्कोअनलिसिस का इस्तेमाल करने लगे हैं। पुलिस इस भ्रम की शिकार है कि नार्कोअनलिसिस उसके लिए वरदान है जिसे पाकर वह करिश्मे कर सकती है। जबकि पुलिस के दावे के विपरीत यह तकनीक न तो आधुनिक है और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य। इसकी शुरुआत 1920 के आरंभिक दौर में हुई। दरअसल ड्रग्स को उस सूरत में ही जायज ठहराया जा सकता है जब अपराधी रहस्य को जानबूझ कर छिपा रहा हो। वैसे यह तकनीक मानवीय हरगिज नहीं कही जा सकती और शारीरिक यातना का ही एक विकल्प है। यह मनोवैज्ञानिक थर्ड डिग्री का ही एक रूप है जिसका उपयोग व्यक्ति के अधिकार व स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लगाता है। सभ्य मुल्क सच उगलवाले के लिए इस तरह के रासायनिक कारकों के इस्तेमाल से घृणा करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;ट्रुथ सीरम&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ट्रुथ सीरम क्या है? प्रथम शताब्दी के रोमन विद्वान, वैज्ञानिक, दार्शनिक व इतिहासकार गुइस प्लिनस जो कि 'प्लिनी द एल्डर' के रूप में अधिक ख्यात हैं, ने इसे शराब की संज्ञा दी है। वास्तव में ट्रुथ सीरम का प्रारंभिक तरीका यही था कि अल्कोहल को इन्ट्राविनस इथनौल के रूप में दिया जाए। लेकिन सच उगलवाने के लिए ड्रग्स की शुरुआत 1916 में हुई जब रोबर्ट अर्नेस्ट हाउस नामक डॉक्टर जो कि डलास के निकटवर्ती नगर फेरिस में प्रैक्टिस करता था, उसे एक घर में महिला का प्रसव कराते वक्त एक आश्चर्यजनक अनुभव हुआ। प्रसूता बेसुध अवस्था में थी। उसे एनेस्थीसिया के रूप में हनबेन नामक पौधे से तैयार दवाई स्कोपोलेमाइन दी गई थी। डॉक्टर ने महिला के पति से नवजात शिशु की लंबाई नापने के लिए स्केल लाने को कहा। पति ने घर छान मारा, पर उसे स्केल नहीं मिला और वापस कमरे में लौटकर उसने डॉक्टर के समक्ष अपनी मजबूरी जाहिर की। लेकिन तभी उसकी पत्नी जो अभी भी एनेस्थीसिया के प्रभाव में थी, बोल पड़ी कि स्केल फलां जगह रखा हुआ है। डॉक्टर हाउस को उस वक्त भारी अचंभा हुआ जब अचेत महिला के बताये गए निश्चित स्थान पर स्केल रखा हुआ था। हाउस ने निष्कर्ष निकाला कि यह कमाल स्कोपोलेमाइन का है और इसके प्रभाव से किसी भी सवाल का सही जवाब पाया जा सकता है। उसने इसके बाद इस दवा पर आगे शोध करना शुरू किया ताकि इसका इस्तेमाल फोरेंसिक जांच के लिए किया जा सके। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ट्रुथ सीरम वाक्यांश का इस्तेमाल पहली बार 1922 में 'लॉस एंजलीस रिकॉर्ड' नामक एक अखबार में प्रकाशित न्यूज रिपोर्ट में किया गया जो कि रॉबर्ट हाउस द्वारा कैदियों पर किए गए प्रयोग के बारे में थी। खुद रॉबर्ट हाउस शुरू में इस शब्दावली का प्रयोग करने से बचते रहे, परंतु अंतत: उन्होंने इसे नियमित रूप से अपना लिया। पुलिस विभाग भी तभी से यही शब्दावली प्रयुक्त करने लगा। 1920 और 1930 के दशकों में कुछ मामलों में जजों ने इस तरीके  को आजमाने की इजाजत भी दी। वैसे इस बीच अन्य दवाओं का भी इस्तेमाल किया गया जिनमें बार्बीटयुरेट्स और पेन्टोथॉल सोडियम पूछताछ के लिए प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख पसंद बन गई। लेकिन 1950 तक आते-आते ज्यादातर वैज्ञानिकों ने ट्रुथ सीरम को अनुचित करार दे दिया और अदालतों ने इस आधार पर जुटाये गए साक्ष्यों का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ट्रुथ सीरम वाक्यांश के दोनों शब्द खुद में गलत हैं। न तो इस तकनीक में इस्तेमाल दवा इस नाम से है और न ही यह सुनिश्चत किया जा सका है कि इसके इस्तेमाल से सच सामने आ सकता है। यह मीडिया ही है जो इसके बावजूद इस शब्दावली को निरंतर प्रयुक्त करता रहा है क्योंकि यह प्रेस और सस्ते साहित्य के लिए मसालेदार सामग्री को पेश करने का दीर्घजीवी साधन समझा जाता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#999900;"&gt;नार्को-एनालिसिस: मनोचिकित्सीय तरीका&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पूछताछ में जिस कथित दवा ट्रुथ सीरम का प्रयोग किया जाता है, नार्कोअनलिसिस के मनोचिकित्सीय तरीके में भी उसी का इस्तेमाल होता है। यह अधिक कुछ नहीं सिर्फ साइकोथेरेपी है जिसमें रोगी को सुप्त अवस्था में बार्बीटयूरेट्स व अन्य ऐसी दवाओं के इंजेक्शन दिए जाते हैं ताकि उसकी दबी हुई भावनाएं, विचार और स्मृतियां बाहर निकल सकें। मनोचिकित्सा का यह तरीका हालांकि उसी परिस्थिति में अपनाया जाता है, जब रोगी की जवाबी प्रतिक्रिया जानना तत्काल जरूरी हो। पर जांचकर्ता इसे हर परिस्थिति में अपनाने को तत्पर दिखाई देते हैं और अन्य बातों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखते। पुलिस का मकसद ऐसे सच को उगलवाना होता है, जिसका इस्तेमाल वह संदिग्ध के खिलाफ कर सकें। संदिग्ध के मुंह से निकलने वाली बातों की उपयोगिता का पैमाना यही होता है कि क्या साक्ष्य के तौर पर ये बयान अदालत में ठहर सकेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर दवा के इस्तेमाल के पीछे मनोचिकित्सकों का मकसद मनोरोग का पता लगाना और इलाज करना होता है। उनकी बुनियादी चिंता कुछ खास तथ्यों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे मनोरोग संबंधी सच्चाई और वास्तविकता का पता लगाने को आतुर होते हैं। इस दौरान रोगी के मुंह से निकली हर बात मनोचिकित्सक के लिए सच होती है और इसका सटीक विश्लेषण मरीज के स्वास्थ्य में त्वरित सुधार की दृष्टि से कारगर माना जाता है। मनोरोग चिकित्सकों का हालांकि कहना है कि प्राप्त सूचनाओं को रोगी के अतीत से जुड़े वाकियों की कोई भरोसेमंद सामग्री नहीं माना जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;चिकित्सीय और प्रयोग संबंधी अध्ययन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;अनेक शोधकर्ताओं द्वारा किए गए चिकित्सीय और प्रयोग संबंधी अध्ययनों से निष्कर्ष निकलता है कि ट्रुथ सीरम की लोकप्रिय विधि कोई जादुई ईजाद नहीं है। यह पूछताछ की कड़ी में कभी-कभार मददगार जरूर साबित हो सकती है, लेकिन अत्यधिक माकूल परिस्थिति में भी फरेबी, काल्पनिक और तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों पर आधारित वक्तव्य इत्यादि के रूप में सामने आ सकती है। बेशक जांचकर्ता यह जताने में सफल हो सकते हैं कि वे संदिग्ध से उम्मीद से कहीं अधिक सूचनाएं उगलवाने में कामयाब हुए हैं। लेकिन उगलवाई गई जानकारियों की सत्यता संबंधी रिपोर्टों और अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ऐसी कोई दवा नहीं है जिससे वे तमाम जानकारियां उगलवाई जा सकें जो संदिग्ध के दिमाग में दर्ज हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अनेक मरीज काल्पनिक तथ्यों, भय और भ्रान्ति से भरी उटपटांग जानकारियों का खुलासा करते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। लेकिन कई बार परीक्षणकर्ता के पास इन काल्पनिक बातों में ही सच्चाई खोजने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता, बशर्ते इनके संदर्भ अन्य स्रोतों से जुटाई गई जानकारियों से मिलते-जुलते हों। कई बार कोई मरीज यह दावा करता है कि उसका एक बच्चा है जो कि वास्तव में होता ही नहीं है। इसी तरह कोई अपने सौतेले पिता को मार डालने की बातें करता है जो कि सालभर पहले ही मर चुका होता है। कई मामलों में यह भी देखने को मिला है कि व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि वह फलां चोरी में शामिल था जबकि वास्तविकता में उसने चोरी में शामिल लोगों से महज सामान खरीदा होता है। हाल में बेंगलूर में एक पत्रकार ने स्वेच्छा से कराए गए नार्को टेस्ट के दौरान कहा कि वह शाहरूख खान की मम्मी से बेइंतहां प्यार करता है, जबकि नार्को जांच से पहले उसने अपने लिखित बयान में कहा था कि वह अपनी मां से बहुत प्यार करता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;संबंधित तारीख और निश्चित जगह की जानकारी संबंधी सूचनाओं की सत्यता प्राय: परस्परविरोधी साबित होती है क्योंकि परीक्षण के दौरान मरीज समय का बोध खो चुका होता है। यह सिद्ध हो चुका है कि नाम और घटनाओं के बारे में उसके उल्लेखों की सच्चाई सवालों के घेरे में होती है। सही-सही घटनाक्रम के बारे में उहापोह की स्थिति के कारण मरीज गैरइरादतन सत्य छिपाने में सफल हो जाता है। निश्चित ही पुनर्रावस्था में आने के बाद वह इस बात के प्रति सजग हो जाएगा कि उसकी गोपनीयता भंग करने के लिए उससे पूछताछ हुई है। इस सूरत में अपने व्यक्तित्व पर पराये अधिकार, उगले गए रहस्यों का भय और अवसाद की स्थितियां मरीज के अंदर नकारात्मकता, शत्रुता और आक्रामकता को जन्म दे सकती हैं। ड्रग्स आमतौर पर वैचारिक शक्ति, जिसमें प्रतिरोध की इच्छा भी शामिल है, को नुकसान पहुंचाती हैं और उन ठोस सूचनाओं में भी बेरोक हस्तक्षेप करती हैं जिन्हें उगलवाने के लिए पूछताछ की जा रही हो। ऐसे में  पूछताछ की दृष्टि से सबसे माकूल परिस्थितियों में भी परिणाम काल्पनिक, गड़बड़ और असत्य हो सकता है। इन्हीं सारे तथ्यों के मद्देनजर दुनिया भर में बनी एकराय के चलते ही नार्कोअनलिसिस को पूछताछ के लिए बहुत पहले खारिज किया जा चुका है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में लॉ के पूर्व प्रोफेसर अनिरुद्ध काला जिन्हें कि ट्रुथ सीरम परीक्षणों में भाग लेने और देखने का गहरा तजुर्बा हासिल है, ने उल्लेख किया है कि ऐसे परीक्षण उन लोगों पर कभी-कभार ही सफल होते हैं, जिनसे यदि बिना दवा के सही ढंग से पूछताछ की जाए तो वे सच को दबाए नहीं रख सकते। जो व्यक्ति झूठ बोलना तय कर चुका हो, वह दवा के प्रभाव में भी अपनी इस फिदरत को बनाए रखने में सफल होता है। देखा जाए तो अपराध की स्वीकारोक्ति में पूछताछ की प्रवीणता का अधिक योगदान होता है, न कि दवा के इस्तेमाल का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#999900;"&gt;पेन्टोथॉल के दुष्प्रभाव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;पेन्टोथॉल जीवन को जोखिम में डालने वाले कई दुष्प्रभावों को जन्म देता है। जैसे-अवसाद का बढ़ना और श्वसन क्रिया पर असर। इससे सीएनएस भी प्रभावित होता है जिसके कारण सिरदर्द, यादाश्त का मंद पड़ जाना, उद्दीपन और लंबी निंद्रा इत्यादि के अलावा कई और दुष्प्रभाव हो सकते हैं। सोडियम थियोपेंथल एक और अवसादकारक दवा है जिसका कई बार पूछताछ में प्रयोग किया जाता है। इसके एकदम अलग  दुष्प्रभाव हैं। वैसे इसके बारे में कहा जाता है कि इससे दर्द नहीं होता, लेकिन यह सत्य नहीं है। इसका अकस्मात धमनियों में जाना दर्दनाक होता है। (देखें स्टीफन रॉफ्टेरी की पुस्तक, ''ब्रिस्टल रॉयल हनफरमैरी, यूके, फार्माकोलॉजी अंक 2, 1942'')&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc9933;"&gt;&lt;strong&gt;भारतीय परिदृश्य&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 2000 में बेंगलूर स्थित फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी द्वारा पुलिस जांच अधिकारियों के लिए परीक्षण के 'फोर-इन-वन' पैकेज के ऐलान के साथ ही देश में नार्कोअनलिसिस का पुनर्जन्म हुआ। तब से ये परीक्षण भारतीय पुलिस की पसंद बन गए हैं और वह हर अनसुलझे मामले में पेन्टोथॉल सोडियम को आजमा रही है। पुलिस को लगता है कि इस दवा के प्रभाव के आगे पूछताछ की उसकी कुशलता फीकी है। सुप्रीम कोर्ट को अपवाद मान लें तो अपराध अनुसंधान की दिशा में न्यायपालिका इस प्रकार के छद्मविज्ञानी तरीकों के इस्तेमाल की मौन स्वीकृति दे चुकी है। चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तो इसे उसी 1922 के वाकिये की उत्तेजक सामग्री के रूप में देखता है, जब चिकित्सक रॉबर्ट हाउस ने इस दवा को ट्रुथ सीरम नाम दिया था और प्रेस ने खूब चटकारे लिए थे। भारतीय मनोरोग विज्ञान इस तमाशे को काफी सावधानी से देख रहा है। तंत्रिका रोग विशेषज्ञों के सामने तो मस्तिष्क विज्ञान के क्षेत्र में गैर-चिकित्सकों द्वारा किए जा रहे इस अनाधिकार हस्तक्षेप की खिल्ली उड़ाने के सिवा कोई और चारा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;फोर-इन-वन पैकेज&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;इस कथित एकमुश्त सुविधा में चार प्रकार के परीक्षण शामिल हैं- साइकोलॉजिकल प्रोफाइल, पोलीग्राफ टेस्ट, ब्रेन फिंगरप्रिटिंग टेस्ट और नार्कोअनलिसिस। ये चारों परीक्षण विशेषज्ञ कहलाने वाले एक ही मनोविज्ञानी द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। पहले परीक्षण की पुष्टि होने के बाद दूसरा और फिर इसी तरह एक के बाद एक तीसरा और चौथा परीक्षण किया जाता है। दुखद बात यह है कि नार्कोअनलिसिस के रूप में अंतिम परीक्षण की पुष्टि होने के साथ ही पहले के परीक्षण निरर्थक मान लिए जाते हैं। नार्कोअनलिसिस की रिपोर्ट मौखिक बयानों के रूप में होती है, जबकि बाकी तीनों परीक्षण तरंगीय प्रतिक्रिया पर आधारित होते हैं। दरअसल परीक्षणकर्ता पहले परीक्षण के संभावित परिणामों की कोई चिन्ता किये बगैर अगले परीक्षण के परिणामों के प्रति पूर्वाग्रही होता है। यह किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान के सिद्धान्ताें और आचारों के खिलाफ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;परीक्षण&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पोलिग्राफ टेस्ट: पूछताछ की इस तथाकथित तकनीक का सबसे नाटकीय  पक्ष यह है कि जब एक मर्तबा नार्को टेस्ट बेकार साबित होता जाता है तो फिर पोलिग्राफ यानी तथाकथित लाइ-डिटेक्टर सामने आता है। पोलिग्राफ शरीर में होने वाले उन खास बदलावों की निगरानी और रिकॉर्ड का काम करता है जो किसी व्यक्ति की भावुक अवस्था से प्रभावित होते हैं। रिकॉर्ड किए गए परिवर्तनों का अध्ययन व विश्लेषण किया जाता है और पूछे गए सवालों से उनका मिलान किया जाता है। पोलिग्राफ टेस्ट नाम से ही भ्रमित करने वाला है। टेस्ट शब्द तथ्यों पर आधारित मूल्यांकन की सौदेश्यपूर्ण प्रक्रिया का आभास कराता है। मसलन डीएनए टेस्ट या ब्लड टेस्ट। पोलिग्राफ टेस्ट के नतीजे कम भरोसे लायक होते हैं। खासकर तब, जब इसमें इस्तेमाल होने वाले उपकरण दो अलग-अलग सवालों पर शरीर की प्रतिक्रिया को नापते हों। ये सवाल संगत और असंगत दोनों तरह के होते हैं। परीक्षणकर्ता को इन दोनों तरह के प्रश्नों का आपसी संबंध और एक दूसरे से इन्हें मिलाकर देखना जरूरी होता है ताकि वह इस आधार पर अपने निष्कर्ष निकाल सके। पोलिग्राफ के  बारे में एक घृणित और गोपनीय तथ्य यह है कि सारा परीक्षण छल-कपट और चालबाजी पर निर्भर करता है, विज्ञान पर नहीं क्योंकि इसकी बुनियाद ही सत्य के खिलाफ पूर्वाग्रह पर आधारित है। परीक्षणकर्ता परीक्षण के नतीजों को तोड़-मरोड़ सकता है। उसे कानून लागू करने वाले उस अधिकारी से भला कैसे भिन्न माना जा सकता है जो संदिग्ध के खिलाफ झूठे सबूत जुटाने की कला में माहिर होता है। जाहिर है, इन दोनों परिस्थितियों में साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ संभव है।&lt;br /&gt;ब्रेन फिंगरिंग: यह तकनीक नब्बे के  दशक की शुरुआत में हावर्ड मेडिकल स्कूल में मनोरोग विभाग के पूर्व शोध सहायक लॉरेंस फेयरवल ने ईजाद की थी। इस ईजाद के बारे में दावा किया गया कि यह पोलिग्राफ टेस्ट का विकल्प है जिसके तहत व्यक्ति एक कंप्यूटर पर चुनिंदा शब्दों, वाक्यांशों और चित्रों को देखता है। ये चित्र हत्या में इस्तेमाल हथियार या फिर अपराध को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल की गई कार के हो सकते हैं। यह दावा किया जाता है कि इन तस्वीरों की शिनाख्त सिर्फ वही व्यक्ति कर सकता है जिसने संबंधित अपराध किया हो। इसके लिए व्यक्ति के सिर पर लगाए गए सेंसर से चित्रें के बारे में उसका ईईजी और मस्तिष्क की तरंगों का अध्ययन किया जाता है। ईईजी के संकेत एक एम्लीफायर और एक अन्य कंप्यूटर की मदद से मस्तिष्क की तरंगों को दर्शातें हैं और उनके बारे में बताते हैं। पोलिग्राफ टेस्ट की ही तरह इस प्रणाली में यह नहीं देखा जाता कि व्यक्ति सच बोल रहा है या नहीं, बल्कि यह पता करने की कोशिश की जाती है कि क्या उसके मस्तिष्क में संबंधित चित्रों, वाक्यांशों या शब्दों का कोई ब्यौरा दर्ज है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#999900;"&gt;&lt;strong&gt;फेयरवेल की भारत यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इन पंक्तियों के लेखक को फेयरवेल की भारत यात्रा के दौरान उनकी फिंगरप्रिंटिंग तकनीक के पीछे छिपी भ्रांतियों का खुलासा करने का मौका मिला। 27 मार्च 2004 को फेयरवेल की यात्र के दौरान आंध्र प्रदेश फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने ट्रुथ डिटेक्टिंग टेक्नीक्स पर व्याख्यानमाला आयोजित की। फेयरवेल ने जब अपना पर्चा पढ़ा तो लेखक ने उनकी दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह तकनीक किसी अपराधी के मस्तिष्क की तरंगों और अपराध के बारे का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति की तरंगों में अंतर स्पष्ट नहीं करती। फेयरवेल इस सत्य से इनकार नहीं कर सके। फेयरवेल और उनके साथी अपने साथ भारत में बिक्री के लिए ब्रेन फिंगरिंग तकनीक के एक दर्जन से अधिक उपकरण लाये थे। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक सुकुमारन ने वहीं पर तत्काल सारे ऑर्डर रद्द कर दिए जो उन्होंने इससे पूर्व आंध्र प्रदेश फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के लिए फेयरवेल को दिए थे। इस प्रकार फेयरवेल को बिना बिक्री के सारे उपकरण अपने साथ वापस अमेरिका ले जाने को मजबूर होना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग लेबोरेटरी की असलियत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;'द डेस मोइनीस रजिस्टर' नामक अखबार ने 6 सितंबर 2004 को फेयरवेल की कंपनी के बारे में बहुत ही रोचक रिपोर्ट छापी जिसमें ब्रेन फिंगरप्रिटिंग के क्षेत्र में शोध के नाम पर एक लाख अमेरिकी डॉलर की धोखाधड़ी का खुलासा किया गया था। इसमें आगे जानकारी दी गई थी कि फेयरफील्ड के बाहरी इलाके में एक कच्ची-पक्की सड़क के किनारे एक साइनबोर्ड लगा था- 'हरमिट हैवन, नैशनल डेटा सेंटर एंड रीजनल ऑपरेशंस सेंटर फॉर ब्रेन फिंगरप्रिटिंग लेबोरेटरीज'। यह सेंटर किराये के एक छोटे से मकान में था जहां कोई लेबोरेटरी नहीं थी। बेसमेंट में पड़े मात्र कुछेक कंप्यूटर थे जिनमें पुराने प्रयोगों से संबंधी डेटा के सिवा कुछ नहीं था। इन कंप्यूटरों को इस्तेमाल करने वाला कोई कर्मचारी तक वहां नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ माह पहले लेबोरेटरी ने क्षेत्रीय आर्थिक विकास विभाग से सहायता के नाम पर सवा लाख डॉलर की रकम इकट्ठा की थी। क्षेत्र के अटॉर्नी-जनरल कार्यालय का कहना था कि तथाकथित ब्रेन फिंगरप्रिंटर फेयरवेल की औकात किसी खोमचे वाले से ज्यादा नहीं थी। इसी कार्यालय के एक अन्य वकील का कहना था कि सरकार ने इस निवेश के जरिये करदाताओं के पैसे पानी में बहा डाले। तीसरे वकील की राय में ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग कंपनी के दावे बेवकूफी भरे थे। खुद अमेरिका में इसका कोई खरीदार नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#339999;"&gt;भारत में ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ जहां ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग की असलियत यह है, वहीं दूसरी ओर भारत में फोरेंसिंग जांच की दो साइंस लेबोरेटरियां, जिसमें अब गुजरात की लैब भी शामिल हो चुकी है, ने इसे अपनाने में ज्यादा ही तेजी दिखाई। बेंगलूर की लैब का तो दावा है कि उसने अभी तक ब्रेन मैपिंग के 700 और नार्कोअनलिसिस के 300 मामले पूरे कर लिये हैं। हमारे मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने अभियुक्तों के दिमाग में दर्ज गोपनीय रहस्यों को बाहर निकालने में अनूठी कामयाबी हासिल की है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क की तरंगों की प्रतिक्रिया हासिल करने का जो गर्वीला दावा किया जाता है, वह सत्यता की कसौटी पर मात्र सुई की नोक जितना है। सामान्य गवाहों और ब्रेन मैपिंग वाले गवाहों की दिमागी तरंगों में फर्क नहीं है। जब तक हमारे विशेषज्ञ इन फर्क को महसूस करने की अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे, तब तक ब्रेन मैपिंग के कोई मायने नहीं हैं। इन पंक्तियों के लेखक का कहना है कि उन्हें अभी तक इस कड़ी में किसी आधारभूत अनुसंधान के बारे में कोई प्रकाशन देखने को नहीं मिला है। यदि किन्हीं विशेषज्ञों ने इस बारे में लिखा भी है तो वह पुराने साइंस जनरलों में छपी बातों की ही समीक्षा है। इस तरह की अफवाहें भी हैं कि ये लोग रॉयल्टी का भुगतान कि ए बगैर फेयरवेल की तकनीक के पेटेंट की ही नकल कर रहे हैं और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। सबसे पहले यह जरूरी है कि यदि उनके पास फेयरवेल से अलहदा कोई तकनीक है तो उन्हें खुद की इस ईजाद को लेकर सामने आना होगा और इसे किसी मामले में प्रयुक्त करने से पहले इसकी विश्वसनीयता का भरोसा दिलाना होगा। मौजूदा दौर में ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग को फोरेंसिक साक्ष्यों के लिहाज से बहुत कम समर्थन हासिल है और इसे लाइ-डिटेक्टर से बेहतर नहीं माना जाता। यदि नार्कोअनलिसिस आदिम तकनीक है तो ब्रेन मैपिंग को अपरिपक्व तकनीक कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;डीएफएस द्वारा त्वरित कार्रवाई&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस बीच गृह मंत्रालय के मातहत काम करने वाले फोरेंसिक साइंस महानिदेशालय (डीएफएस)  ने एक आधिकारिक मैनुएल जारी किया है, जिसमें नार्कोअनलिसिस जांच के संबध में दिशा-निर्देश शामिल हैं। फोरेंसिक साइंस महानिदेशालय द्वारा 2005 में जारी इस मैनुएल में परीक्षण के बेहतर तरीके और मानकों को बढ़ावा देने को कहा गया है जिनका पालन अभी तक तीनों केंद्रीय फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरियों में नहीं हो रहा है। नार्कोअनलिसिस की तकनीक को बर्बर करार देते हुए दुनिया के तमाम सभ्य देशों ने इसे समाप्त कर दिया है। दुनिया की किसी भी फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में इस तकनीक पर अमल नहीं किया जाता। अलबत्ता 1922 में ईजाद होने के बाद कुछ दशकों तक अस्पतालों में डॉक्टरों, मनोरोग चिकित्सकों और एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की देखरेख में इसका इस्तेमाल जरूर होता रहा। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;यह बेंगलूर स्थित स्टेट फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ही है जहां कुछ साल पहले अचानक इस तकनीक के प्रति खासी दिलचस्पी बढ़ी है। गृह मंत्रालय के मातहत फोरेंसिक साइंस महानिदेशालय द्वारा जारी मैनुएल में हालांकि इस तकनीक को देश की कई अन्य फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरियों द्वारा अपनाये जाने की सूचना दी गई है, जो कि सत्य नहीं है। वास्तविकता यह है कि बेंगलूर की लैब के अलावा भारत में और कहीं भी नार्कोएनलिसिस तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस टेस्ट में बेशक कोई लंबी-चौड़ी प्रक्रिया और गहन तकनीक शामिल नहीं है। यह कुछ प्राइवेट कंपनियों का खेल है जो अपने उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए इस तकनीक की वकालत करती रही हैं। इस कड़ी में वे इस टेस्ट के तमाम जोखिमों और नकारात्मक पहलुओं को दरकिनार कर बड़बोले दावे करती हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकारी मैनुएल में नार्कोअनलिसिस के दौरान उगली गई जानकारियों की पुष्टि के लिए पोलिग्राफी और ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग जैसे छद्मविज्ञानी तरीकों को आजमाने की भी सलाह दी गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;भारत सरकार से अपील&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस समूचे परिदृश्य के मद्देनजर इन पंक्तियों के लेखक ने नार्कोअनलिसिस को साइकोलॉजिकल थर्ड डिग्री तरीका करार देते हुए जुलाई 2006 में एक पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री से अपील की कि सरकार को चाहिए कि इस बारे में नीतिगत फैसला ले कि क्या पुलिस को नार्कोअनलिसिस टेस्ट की इजाजत मिलनी चाहिए। साथ ही  इस तरह के परीक्षण में फोरेंसिक विज्ञानियों की क्या भूमिका होनी चाहिए। लेखक ने इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की एक समिति गठित किए जाने और मामले को सुप्रीम कोर्ट को रेफर किये जाने का भी सुझाव दिया। इस पत्र को आगे की कार्रवाई के लिए गृह मंत्रालय को भेज दिया गया। इसके पश्चात लेखक ने अगस्त 2006 को गृह मंत्रालय को अलग से पत्र लिखकर इस बात के लिए उसकी निंदा की कि जिस पद्धति को दुनिया के सभ्य समाजों ने खारिज कर दिया हो, उसे हमारे यहां मुख्यधारा में लाने के प्रयास किये जा रहे हैं। लेखक ने नार्कोअनलिसिस की वकालत करने वाले संबंधित सरकारी मैनुएल को भी वापस लिए जाने की अपील की है, पर उन्हें अभी तक अपने इस पत्र का कोई जवाब नहीं मिला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;नैतिक दृष्टिकोण&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नीति व आचार संबंधी कारणों से ही मनोरोग विशेषज्ञों को किसी आपराधिक जांच में मदद के मद्देनजर नार्को परीक्षण का विरोध करने की सलाह दी गई है। वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन ने हाल ही में इस बारे में तोक्यो घोषणापत्र में संशोधन भी किया है जो इस प्रकार है-&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;1. कोई भी चिकित्सक किसी भी परिस्थिति के चलते उत्पीड़न अथवा किसी अन्य बर्बर व अमानवीय तरीकों में किसी भी रूप में भागीदार नहीं होगा, चाहे पीड़ित व्यक्ति किसी अपराध का संदिग्ध, आरोपी और दोषी ही क्यों न हो और किसी हथियारबंद मुहिम अथवा नागरिक संघर्ष के उसके उद्देश्य से प्रेरित क्यों न हो।&lt;br /&gt;2. यातना के किसी भी बर्बर और अमानवीय तरीकों तथा इस प्रकार की यातनाओं को सहने की प्रतिरोधक क्षमता को कम करने की कार्रवाई के लिए कोई चिकित्सक परिसर, उपकरण, सामग्री अथवा जानकारियां मुहैया कराने में मदद नहीं करेगा।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने भी अपनी आधिकारिक आचार संहिता में इन संशोधनों को शामिल करते हुए कहा है कि कोई चिकित्सक यातना अथवा उत्पीड़न में किसी प्रकार की मदद पहुंचाने का काम नहीं करेगा तथा मानसिक और शारीरिक आघात या किसी व्यक्ति विशेष अथवा ऐजेंसी द्वारा की गई उत्पीड़न की कारवाई पर पर्दा डालना मानवाधिकारों का खुला हनन है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अनिरुद्ध काला कहते हैं- यह हतप्रभ कर देने वाली बात है कि देश को विदू्रपताओं से भरा एक संगीन धोखा दिया जा रहा है। इसका पर्दाफाश करने के लिए विद्वतजन और वैज्ञानिकों का दल गठित किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#339999;"&gt;उपसंहार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पुलिस एक अनुशासित बल है जो कानून का पालन सिखलाता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कानूनसम्मत ढंग से कार्य करने को प्रेरित करता है। संविधान के प्रावधानों में पुलिस की शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए पुलिस अधिनियम, आपराधिक दंड संहिता, साक्ष्य अधिनियम तथा कई अन्य स्थानीय व विशेष कानूनों को शामिल किया गया है ताकि कार्य निष्पादन के क्रम में पुलिस के तौर-तरीकाें को नियंत्रित किया जा सके। फोरेंसिक विज्ञानियों को चाहिए कि वे पुलिस को इस बात के लिए प्रेरित करें कि इन वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल करते वक्त वे नियमों का उल्लंघन न करें। यदि फोरेंसिक विज्ञानी इन बाध्यकारी तरीकों के इस्तेमाल में भागीदार बनते हैं तो उन्हें भी साजिश रचने का अपराधी माना जाना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अदालतों को यह अधिकार है कि पुलिसिया कामकाज के दौरान मानवाधिकार हनन की सूरत में वे पुलिस की जवाबदेही तय कर सकती हैं। जाहिर है अदालतों को भी इन तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस प्रकार के शारीरिक परीक्षण के एक मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों अपने एक फैसले में कहा कि नार्कोअनलिसिस, लाइ-डिटेक्टर टेस्ट और ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग का प्रयोग किसी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 20 (3) के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। यह फैसला संभवत: इसलिए आया कि अदालत को इन परीक्षणों के बारे में संपूर्ण तकनीकी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। जाहिर है कि यदि इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखाई गई तो फोरेंसिक साइंस की आड़ में जारी इन छद्मविज्ञानी तौर- तरीकों से मानवाधिकारों का हनन होता रहेगा। यह कहीं अधिक जरूरी है कि मीडिया, लोकायुक्तों, मानवाधिकार आयुक्तों और पुलिस संगठनों के जिम्मेदार अधिकारियों को इन बाध्यकारी उपायों के बारे में गंभीर संज्ञान लेना होगा और गृह मंत्रालयों को इस दिशा में एक समान संहिता तैयार करने की राह दिखानी होगी। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;मनोविज्ञानियों द्वारा अपनाये जाने वाले हाइनोसिस, नार्कोअनलिसिस, दमनकारी सिद्धांतों, यादाश्त खोने, असामाजिक बर्ताव, अकेलेपन व अन्य मनोविकारों से जुड़े उपायों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन कथित सिद्धहस्त मनोविज्ञानियों पर उनकी विश्वसनीयता और परीक्षण क्षमता के आधार पर उंगली उठाई जा सकती है। हम मानते हैं कि नार्को-एनलिसिस का बरसों पहले का बर्बर तरीका और सत्य की पड़ताल का मौजूदा आतंकवाद दोनों ही कुछेक स्वयंभू छद्मविज्ञानियों की करतूत का हिस्सा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;- लेखक फारेंसिक इंटरनैशनल तथा फोरेंसिक साइंस सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और इंडियन जर्नल ऑफ फोरेंसिक साइंसेस के एडिटर-इन-चीफ हैं&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-3023024717854009165?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/3023024717854009165/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=3023024717854009165' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/3023024717854009165'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/3023024717854009165'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_8743.html' title='ड्रग्स से सच उगलवाने का सफेद झूठ - पी चन्द्रशेखरन'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-9098314780548225443</id><published>2007-10-08T07:50:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T07:55:47.943-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विश्व'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्मेलन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दंड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्याय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानवाधिकार'/><title type='text'>दंड से छूट संवैधानिक शासन के अनुरूप नहीं - केजी कन्नाबीरन</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;भागलपुर में कैदियों की आंखें फोड़ने से लेकर पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर में निर्दोष लोगों की पुलिस या सेना की मुठभेड़ों में हत्याओं तक में कहीं न कहीं राज्य की मूक सहमति और संलिप्तता रही है। तब भी दोषी पुलिसकर्मी या अन्य सरकारी कर्मचारी दंडित नहीं किये जाते।  राज्य के पक्ष में झुकी न्याय-दंड व्यवस्था पर टिप्पणी कर रहे हैं केजी कन्नाबीरन&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दंड  से छूट करना निस्संदेह गंभीरतम न्यायिक समस्याओं में से एक है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। जिन लेखों और रिपोर्टों को हम यहां शामिल कर रहे हैं वे इस समस्या पर प्रकाश डालती हैं और संभवत: समाधान भी पेश करती हैं - स्वभावत: पूरी तरह नहीं, पर शुरू करने के लिए जरूर। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आपातकाल के बाद भागलपुर के अंखफोड़वा कांड ने हमें स्तब्ध कर दिया था जिसमें डाकुओं की आंखें फोड़ दी गयी थीं और बताया गया था कि इसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। इसके अलावा बिना मुकदमा लंबी अवधि तक जेल में बंद रहने के मामलात सामने आए। फिर मुठभेड़ के नाम पर जानबूझ कर नक्सलियों की हत्याओं के मामलों में न्यायाधीश भार्गव आयोग का गठन हुआ। चैतन्य कालबाग ने तब इंडिया टुडे में उत्तर प्रदेश की दो सौ फर्जी मुठभेड़ों का किस्सा बयान किया था जिन्हें डाकू बताकर मारा गया  था। नौजवानों को नक्सलाइट बता कर उनकी हत्या करने के मामले में मद्रास के वाल्टर थेवरम समाचारों की सुखियां बने।  चैतन्य कालबाग और चेन्नई के एक प्रसिद्ध लेखक एसवी राजादुरै ने इनके बारे में उच्चतम न्यायालय में अनुमति याचिका भी दायर की थी। आंध्र प्रदेश में जिन्दगी और आजादी के संवैधानिक मूल्यों को लेकर निरंतर अभियान चलाया जा रहा है, पर न ही कार्यपालिका पर न ही न्यायपालिका पर कोई असर पड़ता नजर आता है।  नक्सल आंदोलन को आरंभिक दौर में ही दबा देने के लिए बंगाल में सैकड़ों नौजवानों की हत्या कर दी गई। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय (निर्विभाग) ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी। पंजाब में सैकड़ों लोगों को उठा लिया गया और गोली मार दी गई।  सैकड़ों लापता हो गए और जब पुलिस द्वारा अंतिम संस्कार किए गए लोगों की गणना जसवंत सिंह कालरा ने शुरू की तो वह भी लापता हो गए। उच्चतम न्यायालय में इस संबंध में लंबित जनहित याचिका राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेज दी गई जो वहां आज भी लंबित है।&lt;br /&gt;दंडमुक्त (सही शब्दों में दंड से छूट) करने के सरकारी मामलों का पता लगाने की जरूरत नहीं है क्योंकि रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। काफी बड़ी संख्या में मानवाधिकारों के झंडाबरदार इस बहाने मार दिए गए कि वे उग्रवादआतंकवाद के समर्थक थे।  आपातकाल के बाद के दिनों में शासन के नाम पर किए गए काले कारनामों की जांच के लिए कई अन्य आयोग गठित किए गए थे। न तो सरकार और न ही जनता ने इनसे कुछ सीखा।  आपातकालीन कानून का शासन बिना किसी संशोधन के किसी न किसी रूप में आज भी चल रहा है। आपातकाल ने हमारी संस्थाओं को जो नुकसान पहुंचाया था, उसे कभी ठीक नहीं किया गया। कोई भी संस्था संविधान की भावना के अनुरूप नहीं चल रही है। कोई भी संविधान के राजनीतिक या नैतिक पाठ पर ध्यान नहीं देना चाहता। मैंने हालांकि 'संविधान के नैतिक पाठ' की अवधारणा रोनाल्ड ड्वॉर्किन से ग्रहण की है लेकिन मैं इसका प्रयोग उनके अर्थों में नहीं बल्कि अपने संविधान की प्रस्तावना, उसमें प्रदत्त मूलभूत अधिकारों, निर्देशक सिद्धांतों तथा मूलभूत कर्तव्यों के संदर्भ में कर रहा हूं। नेता लोग अपना कामकाज, अपने कार्यक्र्रम संविधान को ध्यान में रख कर नहीं बनाते। सरकारी नौकर यह नहीं समझते कि उन्हें जो काम दिया गया है, उनका जो कर्तव्य है वह संविधान के साथ जुड़ा हुआ है। अपनी संस्थाओं को पुनर्स्थापित करने में हमारी असफलताओं ने चारों ओर दंडमुक्ति का माहौल बना दिया है। पुलिस, जो सरकार की ओर से कानून लागू कराने का काम करती है, अगर उससे होशियारी से काम लिया जाए तो वह लोगों में कानून की आदत डाल सकती है। जैसे-जैसे प्रशासन में से लोकतांत्रिक तत्व समाप्त होता जा रहा है, कानून लागू करने वाली एजेंसियों को दंड से छूट देने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। हम लोगों ने यह तय कर दिया है कि पुलिस को पूरी छूट दे दी जाए ताकि हमें किसी तानाशाही की जरूरत न पड़े। हमारा संविधान कहता है कि सामाजिक रूपांतरण लाने की जो सीमित संभावना है, उसमें रुकावट पैदा करना तानाशाही है। हमारे बहुलतावादी समाज में अल्पसंख्यकों को समानता के आधार पर आगे बढ़ने से रोकना भी फासीवाद होगा। अल्पसंख्यक समुदाय के हर सदस्य को समानता के आधार पर जीने का अधिकार है।  भाईचारा और मानवीय गरिमा की अवधारणा सिर्फ समानता पर नहीं, वास्तविक समानता पर बल देती है। इस देश में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के बावजूद रूढ़िवादी, दमनकारी, धार्मिक और जातिवादी लोग निर्णय करने की प्रक्रिया में समान और प्रभावी भूमिका के साथ महिलाओं, दलितों और पिछड़ी जातियों को पूर्ण मानव के रूप में विकसित नहीं होने दे रहे हैं, यही फासीवाद है। यथास्थिति बनाए रखने का कोई भी प्रयास फासीवाद है और फासीवाद लागू करने के हर जरिये को कानून लागू करने की एजेंसियों से दंडमुक्ति की मंजूरी मिली होती है। भारत ने विकृत जाति व्यवस्था का दमन किया और एक ऐसे उदार पश्चिमी संविधान को स्वीकार किया जिसने भ्रष्ट लोकतंत्र का अपना स्वरूप ही पेश किया। इसने एक ऐसी सत्ता स्थापित कर ली है जो चली आ रही जाति व्यवस्था में स्थित धार्मिक जड़ता और दंडमुक्ति की परंपरा से जुदा नहीं है। मैं कहूंगा कि इसने एक तरह से ''संसदीय फासीवाद'' की स्थिति पैदा कर दी है। चुनाव उन राजनीतिक दलों के लिए कोई फर्क पैदा नहीं करता जो हिंसा फैलाते हैं। दिल्ली में हजारों सिख मारे गए और हत्यारे चुनाव में जीत गए। बाबरी मस्जिद के बाद मुंबई में कई हजार मुसलमान मारे गए और श्री कृष्ण आयोग बाल अधिकारों के प्रभाव या बाबरी मस्जिद ढहाने की जिम्मेदार भाजपा के प्रभाव पर कोई असर नहीं डाल पाया। गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां निर्माणात्मक लोकतंत्र लागू किया जा रहा है जिसके मुख्यमंत्री की पार्टी के चुने हुए सदस्य और उनके समर्थक उन उपलब्धियों के गुण गाते रहते हैं जो हासिल ही नहीं की गईं।  यह स्कूल में पढ़ी 'सम्राट की पोशाक' कहानी की याद दिलाता है। वहां हजारों लोग मारे गए, टुकड़ों-टुकड़ों में काट दिए गए, आग की लपटों में झोंक दिए गए और जो जनसंहार घटित हुआ उसके सारे प्रमाण मिटा दिए गए। पुराने धर्मस्थल तोड़ दिए गए। उनके ऊपर से सड़कें बना दी गईं। किसी विश्वविद्यालय के कुलपति, विद्वान और बुद्धिजीवी नरेन्द्र मोदी के अनुपस्थित परिधान की प्रशंसा नहीं भी कर सकते हैं पर 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'एनडीटीवी' में अपनी इच्छा के विरुद्ध देखना पड़ता है। मुख्यमंत्री का अपना सुसंगठित माफिया है जो जरूरत पड़ते ही सक्रिय हो जाता है और यही लोगों को चुप करा देता है। संविधान और कानून को न पढ़ने से हम यह बहस कर सकते हैं कि पहली तीन तरह की स्वतंत्रता का अर्थ बोलने की, किसी के साथ होने की और किसी बैठक या सभा में शामिल होने की स्वतंत्रता भी होता है। इन सभी क्षेत्रें में कानून के शासन को काम नहीं करने दिया जाता है और जहां यह करता है वहां गाहे-ब-गाहे ऐसा करने दिया जाता है। आंध्र प्रदेश में चार दशक से हिरासत में राजनीतिक विरोध के चलते न्यायिक प्रक्रिया के बगैर लोगों की हत्या करना शासन व्यवस्था का हिस्सा बन गया है जहां पुलिस की व्यवस्था ही तय करती है कि लोगों के लिए अच्छी राजनीति क्या है, इस स्थिति पर कोई भी चर्चा राष्ट्रीय प्रेस या राष्ट्रीय बहस से बाहर रखी जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दरअसल अस्वाभाविक मौतों की मजिस्ट्रेटी जांच गिरफ्तारी से बचने का सबब बन चुकी है जिसके बाद सत्र अदालत में मुकदमा चलता है। आंध्र प्रदेश की सरकार अपने से संबंधित हत्या के मामलों में अच्छा इंतजाम कर ले रही है। यह समझना जरूरी है कि दंडमुक्ति और लोकतांत्रिक प्रशासन के बीच परस्पर विरोध का संबंध है।  जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बल और अर्द्धसैनिक बल पिछले पचास साल से दंडमुक्ति का लाभ उठा रहे हैं। इसके खिलाफ वहां के लोगों की आवाज देश भर में कहीं नहीं सुनी गई। जब शांति की प्रक्रिया शुरू हुई तब जाकर हम लोग न्यायिक प्रक्रिया के बगैर लोगों के मारे जाने की बात सुन रहे हैं और ऐसी हत्याओं के खिलाफ हाल में उपजे रोष के संदर्भ में संपादकीय लिखे जा रहे हैं। कुछों को दंडमुक्ति असल में जीवन जीने की स्थिति को तहस-नहस कर देती है। वह भय की स्थिति पैदा करती है। यहां तक कि नजर आ रहे अन्याय के खिलाफ शिकायत करने में भी। दंडमुक्ति ने इस खूबसूरत प्राकृतिक भू-दृश्य और यहां के लोगों के जीवन को तबाह कर दिया है और बादशाह जहांगीर के उस शेर को इसमें बदल दिया है कि ''अगर कहीं नरक है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है।''&lt;br /&gt;पूर्वोत्तर के राज्य हमेशा हमारी सीमा में और हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल रहे हैं। पर, हम लोग अपने संसदीय फासीवाद के इतने आदी हो गए हैं कि हाल में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। उसे इन राज्यों की स्थिति सुधारने के लिए उपाय सुझाने थे। समिति ने विशेष सशस्त्र बल कानून हटाने की बात तो दूर, उसमें 2004 में संशोधित अवैध गतिविधि निरोधक कानून को शामिल करने की सिफारिश कर दी। मुझे नहीं लगता कि इस समिति ने पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में संवैधानिक समीक्षा समिति की रिपोर्ट देखी होगी। दंडमुक्ति की पृष्ठभूमि में ही भाजपा ने मलिमथ समिति नियुक्त की थी। उस समय राजग की हैसियत से वह सत्ता में थी। इस समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मलिमथ थे। उनकी सहायता के लिए एक प्रमुख कानूनविद भी थे जो कानून की कई प्रमुख संस्थाओं के संस्थापकों में से एक रहे। इस समिति की रिपोर्ट में दंडमुक्ति जैसी कोई सिफारिश नहीं थी। एक प्रमुख और लगभग परिवर्तनकारी सिफारिश इस समिति ने यह की कि अपराध न्याय का मुख्य आधार सच्चाई की खोज होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था क्या अपने लिए सच्चाई की खोज करर् कत्तव्य निर्धारित कर सकती है? जीसस क्राइस्ट को सजा देने के बाद जूडिया के वकील ने जब यह सवाल उठाया था तो इसका जवाब देने में असमर्थ निर्णायकों ने फिर कभी किसी न्यायाधिकरण में सच्चाई की खोज को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। हमेशा अपराध की पृष्ठभूमि में तथ्य की जांच हुआ करती है। ये सुधार की बड़ी बेतरतीब और जल्दबाजी में तत्कालीन गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री को पेश की गयी सिफारिशें थीं। संभ्रांत न्यायविद और पुलिस बुद्धिजीवी इन सुधारों को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस सुधार के नाम पर पुलिस में सुधार लाने की बजाय उसे और अधिकार दिए जा रहे हैं। अगर पुलिस सुधार में दंडमुक्ति के मसले पर विचार नहीं किया जाता तो सुधार हो ही नहीं सकता। जरूरत दंडमुक्ति पर पूरी तरह रोक लगाने की है। गुजरात के हाल के रहस्योदघाटनों पर ध्यान दें। अखबारों में छपी खबरों को यहां फिर से दे रहे हैं ''चर्चा:गुजरात में पुलिस और मुख्यमंत्री का घपला? गुजरात पुलिस ने गुजरात में फर्जी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख के मारे जाने के मामले में तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए और बाद में उन्हें गिरफ्तार किया। सोहराबुद्दीन, जिसकी 22 नवंबर 2005 को गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी, उसे फर्जी तौर पर लश्करे तोयबा का कार्यकर्ता बताया गया और कहा गया था कि वह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या करने के मिशन पर था। सोहराबुद्दीन की बीबी कौसर बी भी मुठभेड़ के समय उसके साथ थी। पर, घटना के बाद से उसका कोई पता नहीं है। इन लोगों का एक दोस्त तुलसी राम प्रजापति भी मुठभेड़ में मारा गया क्योंकि उसने पुलिस के कहने पर अदालत में गवाही देने से मना कर दिया। हालांकि, कुछ खबरों में कहा गया था कि मकतूल सोहराबुद्दीन कोई मासूम व्यक्ति नहीं था और लुटेरा था जो बिल्डर माफिया के लिए काम करता था। पर उसकी हत्या ने देश के उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियों की गरिमा और ईमानदारी पर गहरा संदेह पैदा कर दिया। राजनीतिक पक्ष भी सवाल के घेरे में है जो जांच को प्रभावित करता नजर आता है तथा कानून को खतरनाक मोड़ पर ले जा रहा है। अब गुजरात सरकार ने सीआईडी जांच के बाद मान लिया है कि यह एक फर्जी मुठभेड़ थी। क्या मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को गद्दी नहीं छोड़ देनी चाहिए?  टेलीविजन चैनल सीएनएन-आईबीएन के कार्यक्रम फेस द नेशन में चर्चा का यही विषय था जिसका संचालन विद्याशंकर अय्यर कर रहे थे। चर्चा में शामिल विशिष्ट लोगों में भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावेड़कर तथा सामाजिक कार्यकर्ता और 'सिटिजन्स फार जस्टिरस एंड पीस' की सचिव तीस्ता सितलवाड थीं।  क्या नरेन्द्र मोदी को हट जाना चाहिए?  गुजरात विधानसभा में विपक्ष के कुछ नेताओं ने मंगलवार को कहा कि दो आईपीएस अधिकारियों की गिरफ्तारी वास्तव में मोदी और शाह को बचाने की राज्य सरकार की मुहिम का हिस्सा है। मुद्दा यह नहीं है कि कौन गद्दी छोड़े।  मुद्दा यह है कि क्या ऐसे राजनेताओं पर अपराध की गंभीरता को देखते हुए एक या दो चुनाव के लिए कानून बनाकर रोक नहीं लगा देनी चाहिए?  दंडमुक्ति के खुलासे के बारे में प्रकाशित समाचार यही है और यह केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी के हितों के अनुरूप है।  मुद्दा यह है कि चाहे जो भी राजनीतिक दल सत्ता में हो, क्या हम प्रशासन को दंडमुक्त करने जा रहे हैं? क्या हम कोई ऐसी पुलिस दंडसंहिता बनाने जा रहे हैं जो न सिर्फ दंड का विधान करे बल्कि उसके साथ सामाजिक स्तर पर भी कोई व्यवस्था दे और इस तरह संवैधानिक शासन की स्थापना करे।  हमारी सोच को तब बल मिला जब यूरोपीय परिषद की संसद ने 18 अप्रैल 2007 को यह प्रस्ताव पारित किया कि मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। पर यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि दंडमुक्ति की संस्कृति पर प्रतिबंध लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो।  दंडमुक्ति का विपरीतार्थ पीड़ित को न्याय से वंचित करना है। रिपोर्ट यूरोपीय देशों के संदर्भ में थी, पर समयानुकूल थी। हमने पुलिस सुधार समिति को जो जवाब लिखा वह इस प्रकार है -- ''ब्लैक के कानूनी शब्दकोश में एक लातिन अभिव्यक्ति है जिसका अंग्रेजी में अनुवाद इस प्रकार किया गया है। ''दंडमुक्ति अपराध करने की छूट की व्यवस्था को पुष्ट करती है। यह व्यवस्था किसी भी संविधान में स्वीकृत नहीं है, किसी भी कानून या किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते में भी नहीं और मानवाधिकार की सार्वजनिक घोषणा से पहले और बाद में तो निश्चित ही नहीं। फिर भी अपराध करने की यह व्यवस्था भारत सरकार सहित दुनिया की हर सरकार की आदत बन गई है।''&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;हम चूंकि अपनी सरकार की अपराध करने की व्यवस्था से चिंतित हैं, इसलिए यह याद दिलाना चाहते हैं कि हमारा एक सक्रिय संविधान है जो बदल दिए जाने की कई नाकाम कोशिशों के बावजूद हमें एक सीमित ही सही, प्रशासन तो प्रदान करता ही है। हमारा संविधान जहां तक जनता का अधिकार और राज्य के कर्तव्यों का सवाल है, न सिर्फ प्रशासन की बल्कि राज्य के सभी सहकारों की सीमा तय करता है। सरकार की ''अपराध करने की व्यवस्था'' असीम और अबाध हो गई है। यह प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष दोनों तरह से मारने-पीटने से लेकर हत्या करने तक व्याप्त है। हमारी नजर में पुलिस का कानून अपराध की इस व्यवस्था को समाप्त करने वाला होना चाहिए। हमारी दृष्टि से, अगर आप पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों को इस विकृत (और असंवैधानिक) अपराध करने की व्यवस्था से बाहर निकाल देते हैं तो अव्यवस्था समाप्त हो जाएगी और कानून का शासन लागू हो सकेगा। विशेष अदालतें, विशेष कानून, उस जनता को शासित करने के लिए जरूरी हो सकते हैं जो विद्रोह करने पर आपादा हो, पर किसी लोकतंत्र में नहीं जहां कि संविधान लागू हो। वास्तव में, विशेष कानून और अदालतें सिर्फ बहाना होती हैं, जिन्हें यह जानते हुए सरकारें बनाती हैं कि वे अप्रभावी रहेंगी और सिर्फ उन्हें दंडमुक्त करने के काम आएंगी। जब तक सरकार सरकारी कर्मचारियों को अपराध करने की व्यवस्था से बाहर नहीं निकालती, अव्यवस्था की स्थिति बनी रहेगी और अगर सरकार संविधान के अनुरूप एक बहुलतावादी समता पर आधारित समाज व्यवस्था लागू नहीं करती, यह अव्यवस्था और गहरा जाएगी। सरकार को खासतौर पर अनुछेद 14 और 21 के अनुरूप मूलभूत स्वतंत्रता को स्वीकार करना चाहिए। यह जानते हुए कि अनुच्छेद 21 संविधान के 44वें संशोधन के जरिए अनुल्लंघनीय बना दिया गया है, यहां तक कि आंतरिक विद्रोह की आपातस्थिति में भी, तो इस तरह की हत्याओं की घटनाओं को संविधान के तंत्र का ध्वस्त होना ही माना जाएगा। नासमझी के प्रशासन का सीधा परिणाम आतंकवाद होता है।  इसलिए आतंकवाद के खिलाफ शोर मचाने का कोई अर्थ नहीं होता क्योंकि वह सरकार के अर्द्धसैनिक शासन का एकमात्र जवाब है। हम लोग प्रशासन को दंडमुक्त करने की समस्या के समाधान के लिए किए गए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों पर भी विचार करेंगे ताकि समस्या की व्यापकता का पता चल सके और तत्काल इस समस्या के प्रति हम जागरूक हो सकें, अगर हम अपने संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवहार को बचाए रखना चाहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दंडमुक्ति कई देशों की समस्या बनी हुई है इसलिए यूरोपीय परिषद की संसद ने एक रिपोर्ट को मंजूरी दी है जिसमें मानवाधिकारों के उल्लंघन को कतई बर्दाश्त नहीं करने की सिफारिश की गई है।  मानवाधिकार आयोग ने 1997 के अक्तूबर में एक पुनरीक्षित रिपोर्ट को मंजूरी दी जिसे उपआयोग के निर्णय 1996119 के अनुरूप जोएनेट ने तैयार किया था।  मैं इस प्रस्ताव को इसकी पूर्णता में पेश कर रहा हूं ताकि उन गड़बड़ियों का पता चल सके जिन्हें प्रशासन समझ जाता है और दंडमुक्ति की व्यवस्था को समाप्त करने का रास्ता दिखा सके ताकि प्रशासन को संवैधानिक बनाया जा सके। अपने 43वें सत्र में (अगस्त 1991) उपआयोग ने रिपोर्ट के लेखक से अनुरोध किया कि वे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में दंडमुक्त किए जाने की घटनाओं का अध्ययन करें।  अध्ययन से यह पता चला कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने वर्षों बाद दंडमुक्ति से निपटने की जरूरत का अनुभव चार स्तरों पर किया है।&lt;br /&gt;पहला स्तर - सत्तर के दशक में, गैर सरकारी संगठनों, मानवाधिकारों के पैरोकारों, कानून के विशेषज्ञों और कुछ देशों में लोकतांत्रिक विपक्ष ने जब राजनीतिक बंदियों को रिहा कराने के लिए अपनी बात रखने में सफलता पाई।  खासतौर से यह लातिन अमेरिकी देशों में संभव हुआ जहां तानाशाही थी।  ऐसे लोगों और संस्थाओं में प्रमुख रही ब्राजील की एमनेस्टी संस्थाएं, उरुग्वे में अमनेस्टी के लिए गठित इंटरनैशनल सेक्रेटेरियट ऑफ जूरिस्ट, पैराग्वे के लिए गठित सेक्रेटेरियट फॉर एमनेस्टी एण्ड डेमोक्रैसी। एमनेस्टी जो स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया है, एक ऐसा मुद्दा है जो जनमत का निर्माण कर सकता है। इस तरह यह तानाशाही के प्रतिरोध या शांतिपूर्ण विरोध के लिए इस दौर में सक्रिय कई प्रयासों को जोड़ने में क्रमश: सफल रहा।&lt;br /&gt;दूसरा स्तर - दूसरा स्तर 1980 के दशक में आया। स्वतंत्रता का प्रतीक एमनेस्टी और सक्रिय हुआ 'दंडमुक्ति के खिलाफ आश्वासन' के रूप में, फिर पतनशील सैनिक तानाशाहों ने समय रहते अपने लिए दंडमुक्ति का प्रावधान करने के लिए आत्महत्या के कानून बनाए। इसकी पीड़ितों में भारी प्रतिक्रिया हुई। वे 'न्याय' सुनिश्चित करने के लिए संगठित होने लगे। इसका प्रमाण लातिन अमेरिका में बने मदर्स आफ द प्लाजा डी मेचो और लातिन अमेरिकन फेडरेशन आफ असोसिएशन्स आफ रिलेटिब्स आफ डिसअपीयर्ड्स - जैसी संस्थाओं से मिलता है। बाद में इस तरह की संस्थाएं दूसरे महाद्वीपों में भी बनीं।&lt;br /&gt;तीसरा स्तर - बर्लिन की दीवार गिरने के साथ शीतयुद्ध समाप्त हुआ। इस दौर में लोकतंत्रीकरण या लोकतंत्र की वापसी तथा आंतरिक, सशस्त्र संघर्ष समाप्त करने के लिए शांति समझौतों की कई प्रक्रियाएं आरंभ हुईं। चाहे राष्ट्रीय स्तर की वार्ताएं हों या शांति समझौते हों, दंडमुक्ति का सवाल पूर्व दमनकारियों और पीड़ितों की 'न्याय की खोज' के संघर्ष में बार-बार उभरा। पूर्व दमनकारी सब कुछ भुला देने की मांग करते और पीड़ित न्याय की।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;चौथा स्तर - यह वह समय था जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने दंडमुक्ति के मुद्दे के विरोध का महत्व समझा। उदाहरण के लिए द इंटर अमेरिकन कोर्ट आफ ह्यूमन राइट्स  ने अपने एक परिवर्तनकारी फैसले यह स्पष्ट किया कि मानवाधिकार का गंभीर रूप से उल्लंघन करने वालों के लिए माफी तटस्थ और स्वतंत्र अदालतों में मामला चलाने के संबंध में आम व्यक्ति को प्राप्त अधिकार से मेल नहीं खाती। मानवाधिकार पर विश्व सम्मेलन (जून 1993) ने इस विचार का समर्थन अपने अंतिम दस्तावेज विएना डिक्लरेशन एंड प्रोग्राम आफ एक्शन में किया है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;इस रिपोर्ट का शीर्षक 'विएना प्रोग्राम आफ एक्शन' है। इसमें दंडमुक्ति के खिलाफ कार्रवाई करके मानवाधिकारों को संरक्षण और बढ़ावा देने के लिए कुछ सिद्धांत तय किए है और संयुक्त राष्ट्र महासभा से इन्हें मंजूर करने की सिफारिश की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;सिद्धांतों का विवरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर इन सिद्धांतों और इनके कार्य क्षेत्र को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है।  पीड़ित के कानूनी अधिकार के संदर्भ (क) पीड़ित का जानने का अधिकार (ख) पीड़ित का न्याय पाने का अधिकार और (ग) पीड़ित का भरपाई का अधिकार। इसके अलावा बचाव के तौर पर कई ऐसे उपाय सुझाए गए हैं कि फिर से उल्लंघन की घटना न हो।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;जानने का अधिकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;यह किसी पीड़ित व्यक्ति या उसके निकट के किसी व्यक्ति के लिए महज यह जानने का अधिकार नहीं है कि क्या हुआ था सच्चाई जानने का अधिकार सामूहिक अधिकार भी है, अतीत को देखते हुए यह सुनिश्चित करना कि फिर से हिंसा नहीं होगी। इसका विपरीतार्थ है 'याद रखने का कर्तव्य' जो राज्य को हमेशा पूरा करना चाहिए ताकि इतिहास की विकृतियों से बचा जा सके जिन्हें प्रतिक्रियावाद और समझौतावाद कहा जाता है।  दमन के जिस दौर से देश गुजरता है उसका ज्ञान जनता की राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा होता है और इस रूप में इसे याद रखना जरूरी है। इस तरह एक सामूहिक अधिकार के रूप में जानने के अधिकार का यह मुख्य उद्देश्य होता है।&lt;br /&gt;इसके लिए दो तरह के उपाय सुझाए गए हैं। पहला यह कि यथाशीघ्र गैर न्यायिक जांच आयोग गठित कर दिया जाए, इस आधार पर कि जब तक वे अपनी जांच की रिपोर्ट नहीं दे देते, अदालतें दमनकारियों और उनके आकाओं को जल्दबाजी में सजा नहीं दे सकें। दूसरा उपाय मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों के अभिलेख तैयार करने तथा उन्हें संरक्षित करने के उद्देश्य से प्रेरित है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;गैर न्यायिक जांच आयोग - इसके दो मुख्य उद्देश्य हैं पहला, उस तंत्र को ध्वस्त करना जिसने आपराधिक व्यवहार को लगभग नियमित प्रशासनिक व्यवहार के रूप में मान्यता दी और यह सुनिश्चित करना कि फिर ऐसा व्यवहार नहीं हो। दूसरा, अदालत के लिए साक्ष्य जुटाना और यह भी स्थापित करना कि जिसे दमनकारी झूठ बताकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जलील करते हैं वे खुद सच्चाई से परे होते हैं। इस तरह इन कार्यकर्ताओं को पुन: स्थापित करना।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अनुभव से पता चलता है कि इस बात की सावधानी बरतनी चाहिए कि इस तरह के आयोग अपने उद्देश्य से विचलित न हो जाएं और अदालतों के सामने जाने से बचने में बहाने न तलाशने लगें।  इस तरह आधारभूत सिद्धांतों को प्र्रस्तावित करने का विचार इसलिए आया कि इनके बगैर आयोग अपनी प्रतिष्ठा खोने का संकट झेल सकते थे।  ये सिद्धांत निम्लिखित मुद्दों से जुडे हैं :&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;(क)   निष्पक्षता सुनिश्चित करना - गैर न्यायिक जांच आयोग का गठन कानून के जरिए होना चाहिए। इनका गठन एक आम कानून के जरिए या लोकतंत्र बहाली और शांति की प्रक्रिया शुरू होने के दौर में समझौते के जरिए हो सकता है। इनके सदस्य कार्य समाप्त होने से पहले बर्खास्त नहीं किए जाने चाहिए और उन्हें संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। अगर जरूरी हुआ तो आयोग को पुलिस की सहायता लेने का अधिकार होना चाहिए। इसके अलावा लोगों को गवाहियों के लिए बुलाने तथा जांच के लिए जगह-जगह जाने का भी अधिकार होना चाहिए।&lt;br /&gt;(ख)   पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा - पीडितों और गवाहों से उनके साक्ष्य स्वेच्छा के अनुसार ही लिये जाने चाहिए। सुरक्षा की दृष्टि से, सिर्फ निम्लिखित परिस्थितियों में ही गोपनीयता बरतनी चाहिए - यह निश्चित रूप से असामान्य हो (यौन प्रताड़ना के मामलों को छोड़ कर), गोपनीयता बरतने की मांग के आधार की जांच अध्यक्ष और आयोग के एक सदस्य को करने का अधिकार होना चाहिए और गोपनीय रूप से वे गवाह की पहचान कर सकते हैं जिसका उल्लेख रिपोर्ट में दर्ज गवाही के साथ होना चाहिए। गवाहों और पीड़ितों को मानसिक और सामाजिक सहायता गवाही देते समय उपलब्ध होनी चाहिए। उन्हें गवाही देने का खर्च चुकाया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;(ग)   फंसे हुए व्यक्ति के लिए गारंटी - अगर आयोग उनका नाम सार्वजनिक तौर पर बताने की अनुमति देता है तो फिर उसकी या तो सुनवाई होनी चाहिए या कम से कम इसके लिए उसे बुलाना चाहिए या उसे यह अवसर जरूर दिया जाना चाहिए कि वह अपना जवाब लिखित रूप में दे दे।  उसका जवाब फाइल में शामिल होना चाहिए।&lt;br /&gt;(घ)   आयोग की रिपोर्ट का प्रचार - गवाहों पर दवाब कम करने और उनकी सुरक्षा के लिए आयोग की कार्यवाही को गोपनीय रखने की हालांकि जरूरत पड़ सकती है, पर आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होनी चाहिए तथा उसका व्यापक प्रचार होना चाहिए। आयोग के सदस्यों को अवमानना के मुकदमे से छूट मिलनी चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानवाधिकार के उल्लंघन से संबंधित अभिलेखों का संरक्षण - जानने के अधिकार में यह शामिल है कि अभिलेख सुरक्षित रहें, खास तौर से परिवर्तन काल में। इसके लिए निम्लिखित उपाय किए जा सकते हैं - &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;(क) अभिलेखों को हटाने, नष्ट करने या उनके दुरुपयोग करने की दृष्टि से उनके संरक्षण और ऐसा करने वालों के लिए दंड की व्यवस्था।&lt;br /&gt;(ख) अभिलेखों की सूची तैयार करना, जो तीसरे देश में हो उनकी भी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जरूरत पड़ने पर उन्हें उनकी अनुमति से मंगाया जा सकता है और फिर वापस किया जा सकता है।&lt;br /&gt;(ग) अभिलेखों को देखने और उपयोग करने के संबंध में नियमों, कानूनों को स्वीकार करना और किसी को भी अभिलेख पर उत्तर देने के अधिकार की अनुमति देना।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उचित और प्रभावी विकल्प का अधिकार - इसका तात्पर्य यह है कि सभी पीड़ितों को अपना अधिकार हासिल करने का तथा उचित और प्रभावी विकल्प का अवसर दिया जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका उत्पीड़क मुकदमे का सामना कर सके तथा उन्हें उचित मुआबजा मिल सके। जैसा कि प्रस्तावना और निर्देशक सिद्धांतों में कहा गया है, तब तक उचित और स्थायी तौर पर विवाद नहीं निपट सकता जब तक कि वह न्याय की जरूरत पूरी न करता हो।  विवाद के निपटारे के लिए माफ करने का मतलब यह होता है कि पीड़ित को पता हो कि उसका उत्पीड़क कौन है और उत्पीड़क पश्चाताप करने की स्थिति में हो। माफ करने से पहले जरूरी है कि माफी मांगी गई हो।&lt;br /&gt;लाभ का अधिकार राज्य के लिए यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह उल्लंघन की जांच करे, उल्लंघन करने वालाें पर मुकदमा चलाए, अगर उनका दोष सिद्ध हो जाता है तो उन्हें दंडित करे। मुकदमा चलाने का फैसला हालांकि आरंभिक रूप से राज्य को करना होता है पर प्रक्रियागत नियमों के अंतर्गत यह अनुमति दी जानी चाहिए कि अगर सरकारी अधिकारी ऐसा नहीं करते तो पीड़ित व्यक्ति अपने तौर पर मामला दायर कर सके।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;सैद्धांतिक रूप से यह तय होना चाहिए कि ये मामले राष्ट्रीय अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं क्योंकि स्थायी समाधान राष्ट्रीय स्तर पर ही आना चाहिए पर अक्सर राष्ट्रीय अदालतें निष्पक्ष न्याय देने की स्थिति में नहीं होती या फिर मौलिक दृष्टि से काम करने की स्थिति में ही नहीं होतीं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय अदालत के अधिकार क्षेत्र का महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या इसे एक तदर्थ अदालत होना चाहिए, जो पूर्व यूगोस्लाविया या रवांडा में हुए उल्लंघनों की सुनवाई के लिए गठित की गई थी या स्थायी अंतर्राष्ट्रीय अदालत होनी चाहिए जैसा कि संयुक्त राष्ट्र की महासभा के समक्ष पेश दस्तावेज में प्रस्तावित है? चाहे जो समाधान निकले, वह निष्पक्ष मुकदमे की कसौटी पर खरा होना चाहिए। जो उल्लंघन के दोषी हैं उन्हें मानवाधिकारों का निश्चित रूप से सम्मान करना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अंतत: अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समझौतों में 'विश्व कानून' का एक ऐसा अनुच्छेद जोड़ना चाहिए जिसमें यह व्यवस्था हो कि हर देश उल्लंघन करने वाले के खिलाफ या तो मुकदमा चलाए या उसे प्रत्यर्पित कर दे। जाहिर है कि ऐसा अनुच्छेद जोड़ने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है, उदाहरण के लिए 1949 में जेनेवा समझौते में या यातना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र समझौते में शामिल मानवीय प्रावधानों को शायद ही कभी लागू किया गया। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;दंडमुक्ति के खिलाफ संघर्ष में कुछ प्रतिबंध जरूरी - दंडमुक्ति के खिलाफ संघर्ष को समर्थन देने के लिए कुछ नियम-कानूनों पर प्रतिबंध जरूरी है। इसका उद्देश्य ऐसे नियम-कानूनों का उपयोग दंडमुक्ति के हक में करने से रोकना है, क्योंकि इनसे न्याय की प्रक्रिया बाधित होती है। प्रमुख प्रतिबंध निम्लिखित हैं :&lt;br /&gt;अध्यादेश आदेश - अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर अपराधों के मामले में अध्यादेश या आदेश का कोई प्रभाव नहीं है जैसे मानवता के विरुद्ध अपराध में। इसका मानवाधिकार उल्लंघन के किसी मामले में कोई उपयोग नहीं है, अगर प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं हो। इसी तरह दीवानी, प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई में भी इसे लागू नहीं किया जा सकता।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आम माफी - उल्लंघन के दोषियों को आम माफी नहीं दी जा सकती जब तक कि पीड़ितों को प्रभावी विकल्प के जरिए न्याय नहीं मिल गया हो। मुआवजे के अधिकार के तहत पीड़ितों द्वारा किसी खास मुकदमे पर इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अदालतों को बल मिलना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;लेखक पीयूसीएल  के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-9098314780548225443?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/9098314780548225443/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=9098314780548225443' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/9098314780548225443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/9098314780548225443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_5575.html' title='दंड से छूट संवैधानिक शासन के अनुरूप नहीं - केजी कन्नाबीरन'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-6313299740020467551</id><published>2007-10-08T07:44:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T07:48:46.683-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सहायता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सामंजस्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानूनी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्याय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नि:शुल्क'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वास्तविकता'/><title type='text'>सबके लिये नहीं है न्याय - पारुल शर्मा</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#996633;"&gt;देश में नि:शुल्क कानूनी सहायता के प्रावधानों के बावजूद न्याय का पहिया सिर्फ गरीबों और लाचारों को कुचलने के लिए घूमता दिखाई देता है। ये वे लोग हैं जो खुद को बेकसूर साबित करने के लिए साधन जुटाने में असमर्थ हैं। सबसे दर्दनाक स्थिति का सामना विचाराधीन उन महिला कैदियों के बच्चे कर रहे हैं जो लंबे समय से जेलों में सड़ रही हैं और इस बात के आसार दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहे कि उनका मुकदमा कब शुरू होगा, बता रही हैं पारुल शर्मा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरूरमतंदों को न्याय दिलाने के लिए देश में लागू नि:शुल्क कानूनी सहायता के प्रावधान पर असफलता की गारंटी का संदेश पहले से ही जड़ दिया गया है। भले ही इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी गरीब और लाचार को त्वरित और उचित न्याय दिलाना हो, पर इसके पीछे कोई ठोस चिंतन अथवा सोच दिखाई नहीं देती। संबंधित वकील के लिए तय मामूली फीस के जरिये शुरू में ही सारी प्रक्रिया को बट्टा लगाने का प्रबंध कर दिया गया है। सालों-साल चलने वाले ऐसे किसी मुकदमे में वकील की फीस प्रति केस 300 से 700 रुपये के बीच कुछ भी हो सकती है। ऊपर से इस फीस के भुगतान में देरी के चलते भी कोई वकील जाहिर तौर पर ऐसी कानूनी सहायता सेवाओं की जिम्मेदारी लेने से कतराता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ऐसे मामलों में प्राय: देखा गया है कि मुवक्किल को समय पर कानूनी सहायता मुहैया नहीं कराई जाती। जबकि कानून में गिरफ्तारी के साथ ही इस आशय की मदद का प्रावधान है और 24 घंटे के अंदर इसकी बाकायदा अधिसूचना जारी हो जानी चाहिए। एक ओर हम देखें तो सरकारी वकील को सरकार से वेतन मिलता है और वह दो सौ रुपये प्रतिदिन अलग से भी प्राप्त करता है। दूसरी ओर नि:शुल्क कानूनी सहायता सेवाओं के मामले में अलग तरह का नजरिया अपनाया जाता है। इन सेवाओं के लिए अधिवक्ताओं की नियुक्ति करते समय विशेष योग्यता और अन्य मानकों के मद्देनजर समानता के सिद्धांतों का ध्यान नहीं रखा जाता, जबकि ऐसा होना जरूरी है। अलबत्ता पीड़ित व्यक्ति की इच्छा को प्राथमिकता अवश्य दी जानी चाहिए। परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्याय की शुरुआत तो यहीं से होने लगती है, जब किसी गरीब को किसी अलग  प्रणाली का अंग समझ उस पर गरीबी का लेबल चिपका दिया जाता है। दरअसल नि:शुल्क कानूनी सहायता की यह प्रक्रिया छलावा मात्र है जिसके  जरिये अन्याय को ढांपने की कोशिश होती है। यह सिलसिला वर्षों से इसी तरह जारी है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;विलंबित न्याय का इससे अनूठा उदाहरण और क्या होगा, जब किसी गरीब व्यक्ति को कोई अन्यायी व्यवस्था बगैर मुकदमे के लंबे समय तक तथाकथित विचाराधीन बनाये रखती है। उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति 33 से अधिक साल से जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में दिन काटने को अभिशप्त है। उसके केस में शिकायतकर्ता और गवाहों दोनों की मृत्यु हो चुकी है। देवी प्रसाद नाम का यह अभियुक्त गाजीपुर शहरी क्षेत्र का रहने वाला है। उसे 1973 में अपनी बीवी के कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसे वाराणसी जेल भेज दिया गया और उसके परिवार वालों ने भी उसे मरा जान कर उसकी कोई सुध नहीं ली। जब उसके भाई पीतांबर को उसके जिंदा होने की सूचना मिली तो वह उससे मिलने वाराणसी जेल पहुंचा। लेकिन विक्षिप्त अवस्था में पहुंच चुके देवी प्रसाद ने अपने भाई को पहचानने से इनकार कर दिया। जब देवी प्रसाद गिरफ्तार हुआ था, तब वह महज 24 साल का था। अपनी तमाम जिंदगी सलाखों के पीछे काटते हुए आज न तो वह शारीरिक और न ही मानसिक रूप से स्वस्थ है। (द हिन्दू, रविवार 19मार्च 2006) &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;हमारी न्यायिक प्रणाली भले ही व्यक्ति के जीवनाधिकार की वकालत करती रही है, पर जहां तक ऐसे मामलों का ताल्लुक है, संविधान की धारा 21 के तहत प्रदत्त इस अधिकार में मानवीय आधार और शारीरिक-मानसिक पहलुओं को नजरअंदाज कर जीवन का वजूद जानवरों जैसा समझ लिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:78%;color:#999900;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सामाजिक जागरूकता का रूप&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;एक मायने में समान अनुभूति का तात्पर्य दूसरों की भावनाओं को बेहद करीब से समझने और महसूस करने की क्षमता से है। यह किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति के आंतरिक भाव को पहचानने की योग्यता मात्र नहीं है, वरन खुद को दूसरों की जगह खड़ा कर समान परिस्थिति में उत्पन्न मौन व्यवहार का ठीक वैसा ही अनुभव प्राप्त करना भी है। (साइकोलॉजी- एन इंट्रोडक्शन,चार्ल्स जी. मोरिस, 1996, नौवा संस्करण )&lt;br /&gt;यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी न्यायिक प्रणाली में इस तरह की संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। पिछले दिनों में 'ट्रिब्यून इंडिया' (अदिति टंडन, फ्रॉम बिहाइंड द बार्स, चिल्ड्रेन सफर विद मदर्स, चंडीगढ़ 3 जुलाई 2007 ) द्वारा की गई एक पड़ताल से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है। इस खोजपरक रिपोर्ट में विचाराधीन महिला कैदियों के बच्चों की दर्दनाक दास्तान उजागर की गई है। जालंधर सेंट्रल जेल में बंद विचाराधीन कैदी 27 वर्षीय अनीता ने अपने पहले बच्चे साहिल को जेल में ही जन्म दिया। तीन माह के साहिल ने अभी तक अपने पिता को नहीं देखा है। शिशु विकास के लिए जरूरी समझी जाने वाली उसके हिस्से की रोशनी और आवाज तक उसे नसीब नहीं है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;प्रसव पूर्व और बाद में आवश्यक समझे जाने वाले देखभाल संबंधी इंतजामों का जेल में काफी बुरा हाल है। जेलों में सप्ताह में मात्र एक दिन स्त्रीरोग विशेषज्ञ के दौरे का प्रावधान है। अनीता बताती है कि जब वह गर्भवती थी तो उसे कोई अतिरिक्त खुराक नहीं दी गई। दाल-रोटी के रूप में नियमित मिलने वाले भोजन के अलावा थोड़ा दूध जरूर दे दिया जाता था। प्रसव के बाद वह काफी कमजोर हो चुकी है और अन्य माताओं की तरह अपने बच्चों को पोषाहार के रूप में समुचित मात्रा में अपना दूध तक नहीं पिला पाती। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;मनोचिकित्सक काकली गुप्ता कहती हैं कि इस तरह की लापरवाही के नतीजे काफी खतरनाक हो सकते हैं। स्त्रियों के मामले में मातृत्व का गुण ही सबसे प्रभावकारक पहलू होता है। अपने शिशु की स्थिति का माता की दिमागी हालत पर गहरा असर पड़ता है। शुरुआती पांच साल की परवरिश का बच्चों के मानसिक विकास से काफी संबंध होता है और यही अवस्था उसके अंदर भावों का संचार करती है। यदि हालात विपरीत हुए तो उन्हें सुधरने में बहुत वक्त लगता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;गंदे वार्डों में 86 कैदियों के साये में रह रहा कोई बच्चा आसपास के माहौल से सुस्ती, नीरसता और पीडा से अधिक पा भी क्या सकता है? अनीता की तरह छह और बच्चों की मातायें इसी जेल में रह रही हैं। वे भी इसी बात से आतंकित हैं कि उनके बच्चों जेल के माहौल में पलकर सिर्फ यहीं की भाषा सीखेंगे। दो साल की बच्ची रोहिणी की मां 34 वर्षीय प्रिया कहती हैं, हम बेबस हैं। हमारे परिवार भी जेलों में हैं। हमारे बच्चों का पालन-पोषण कौन करेगा? &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस खोजपरक रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि जालंधर की इस जेल में बच्चों को उनके मानसिक विकास के लिए जरूरी समझे जाने वाले कोई भी खिलौने, गेम्स या कलर मुहैया नहीं कराये जाते हैं। रिपोर्ट में इस बात को खासतौर पर रेखांकित किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने कैदी माताओं के साथ रहने वाले बच्चों के मामले में अधिकतम आयु सीमा छह साल निश्चित की है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को यह भी निर्देश दिए हुए हैं कि प्रत्येक जेल में बच्चों के लिए क्रेश और नर्सरी का प्रबंध होना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि इस अन्यायी व्यवस्था के शिकार ये बच्चे दूसरों से भिन्न हैं। पंजाब के पुलिस महानिदेशक (जेल ) इजहार आलम हालांकि कहते हैं कि राज्य की जेलों में महिलाएं और बच्चे बेहतर हालत में हैं। यहां तमाम नियम-कानूनों का पालन हो रहा है और फगवाड़ा, मोगा, दसोया, पठानकोट, पालती व अन्य स्थानों पर नई जेलें बसाने पर विचार कर रहे हैं ताकि जो बची-खुची दिक्कतें हैं, उन्हें दूर किया जा सके।&lt;br /&gt;जेल अधिकारी जो दावे करें, पर हकीकत यही है कि ऐसी माताओं के बच्चे पशुवत जीने को अभिशप्त हैं। यह 'कन्वेंशन ऑन द राइट ऑफ द चाइल्ड' (सीआरसी) का खुला उल्लंघन है। जब यह समझौता मंजूर हुआ और इस पर दस्तखत हुए, यूनिसेफ ने 1990 में इसे अपने दस्तावेज 'द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन' में शामिल करते हुए एक सशक्त उद्धोषणा जारी की जिसे 'प्रिंसीपल ऑफ द फर्स्ट कॉल' कहा जाता है। इसमें कहा गया है- बच्चों का जीवन और उनका सहज विकास समाज के सरोकारों और क्षमताओं का प्रथम आह्वान होना चाहिए और बच्चों में अच्छे और बुरे समय, सामान्य और आपातकाल, शांतिकाल और युद्धकाल तथा उन्नति व अवनतिकाल के उत्तरदायित्वों के प्रति बोध की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन भारतीय न्याय प्रणाली अपने अन्यायी स्वरूप के साथ इन सरोकारों को पूरी तरह दरकिनार करती नजर आती है क्योंकि विचाराधीन कैदी माताओं के ये बच्चे इतनी कम उम्र में कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं और वह भी महज इस कारण कि वे गौण समझे गए मनुष्यों की संतानें हैं।&lt;br /&gt;इन सब बातों को देखकर कभी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि न्याय प्रणाली की इस  रद्दी किताब से उसका मूलपाठ मिटाकर हम इसमें सामंजस्य व वास्तविकता के सिद्धांतों का समावेश करें, जहां जीवनाधिकार की राह में पशुवत परिस्थितियों की कोई जगह न हो और इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के अधिकार शामिल रहें।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#999900;"&gt;_लेखिका स्टॉकहोम में मानवाधिकार संबंधी मामलों की अधिवक्ता हैं। उनकी पुस्तक ''राइट टू लाइफ, द प्लूरलिज्म ऑफ ह्यूमन एक्जिसटेंस'' को हाल ही में इंडियन रिसर्च प्रेस ने जारी किया है&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-6313299740020467551?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/6313299740020467551/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=6313299740020467551' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/6313299740020467551'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/6313299740020467551'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_7978.html' title='सबके लिये नहीं है न्याय - पारुल शर्मा'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-8611098817360480264</id><published>2007-10-08T07:35:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T07:43:32.084-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रोफेसर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='न्यायालय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तर्क'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शोध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घटिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लड़खड़ाते'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपेन्द्र बख्शी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दरअसल'/><title type='text'>लचर तर्कों वाली रिपोर्ट -प्रोफेसर उपेन्द्र बख्शी</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#996633;"&gt;&lt;em&gt;फौजदारी न्याय प्रणाली सुधार समिति की रिपोर्ट में जो तर्क प्रस्तुत किये गये हैं यदि वैसे तर्क किसी विधि संस्थान का छात्र प्रस्तुत करे तो परीक्षा में पास भी न हो पाये, तर्क दे रहे हैं प्रोफेसर उपेन्द्र बख्शी&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी को इस बात का ठीक-ठीक पता नहीं है कि सरकार को अब जाकर फौजदारी न्याय प्रणाली पर मलिमथ कमेटी बिठाना क्यों जरूरी लगा। कमेटी की रिपोर्ट में इसका जिक्र है। सभी को मालूम है कि देश में फौजदारी न्याय प्रणाली 'दम तोड़ने वाली थी'। लंबित मामलों में बढ़ोत्तरी और अपराध सिद्ध करने की दर में धीमी प्रगति ने अपराध को एक कमाऊ धंधा बना लिया है (पैरा 1.3)। अपराध तो पुराने जमाने से समाज के साथ एक व्याधि की तरह जुड़े रहे हैं, पर यह एक धंधा भी बन सकता है, इसे देखते हुए फौजदारी न्याय प्रणाली की व्यापक समीक्षा होनी ही चाहिए और यह काम विशेषज्ञों की एक और समिति को सौंपा जाना चाहिए!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समिति इस काम को कहीं ज्यादा और बेहतर ढंग से अंजाम दे सकती है। रिपोर्ट में इस बात का कहीं भी संकेत नहीं है कि सरकार या आम लोगों की ओर से इस दिशा में क्यों इतनी उदासीनता बरती गई। इस मामले को जोरदार ढंग से उठाया जा सकता था, पर वह हुआ नहीं और इसको अत्यंत कम महत्व दिया गया। क्या अपनी घोषित विशेषज्ञता के बावजूद समिति प्रदेशों और सहभागियों के साथ अपनी वैध भूमिका निभाने में असमर्थ रही। हम यह कैसे समझें कि केंद्र की गठबंधन सरकार के घटकों से इतर चलायी जाने वाली प्रदेश सरकारों में से केवल सात ने वितरित प्रश्नावली का जवाब भेजा। बाकियों से उत्तर न मिलने पर उन्हें शायद बार-बार नहीं झकझोरा गया अन्यथा उनका रुख इतना दुर्बल और बेनतीजतन न होता। उनसे उत्तर प्राप्त करने की कोशिशें बार-बार क्यों नहीं की गईं। तीन हजार एक सौ चौसठ (3164) लोगों में से केवल 284 ने ही उत्तर क्यों दिया? भारत के प्रधान न्यायाधीश के निर्देशों के बावजूद न्यायालयों में निर्धारित परिपत्र में सूचनाएं क्यों नहीं दी गयीं? (पैरा 1.10) तमाम विधिवेत्ताओं (परेशानी में डालने वाली भारतीय विधि शब्दावली के अनुसार) में से जिसने भी उत्तर दिये उनमें अधिकतर दिल्ली में रहने वाले ही क्यों थे? (पैरा 1.15) समिति ने कर्तव्यवश सूचना एवं संचार की असफलता का जिक्र तो किया है लेकिन उसके कारणों पर मौन साधे रखा।&lt;br /&gt;वास्तव में यह देखकर ताज्जुब होता है कि रिपोर्ट अपने आभिजात्य स्वरूप (कुलीन रूप) में आई है। वह व्याख्या करती है कि 'समय की मांगें' मुट्ठीभर लोगों या चुनिंदा व्यक्तियों की सोच के मुताबिक लगें। इन्हें भारतवासियों की आकांक्षाओं के बराबर ठहरा दिये जाने का भी सुझाव प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc9933;"&gt;घटिया शोध, लड़खड़ाते तर्क&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस रिपोर्ट के तथ्यों में, समाचारपत्रों की शीर्ष पंक्तियों अथवा शीर्षकों या फिर संपादकीय पृष्ठों के सहारे गहनता लाने की कोशिश की गई है। अनेक जगहों पर अधिवक्ताओं की भाषा में कहा जाए तो सच को छिपाने और झूठे सुझाव देने के जतन किये गये हैं।&lt;br /&gt;यह रिपोर्ट मौन रहने के अधिकार का किस तरह चित्रण करती है उसका एक उदाहरण इस प्रकार है- आरोपी के मौन रहने पर उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाने से संविधान की धारा 20(3) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार को आंच नहीं आती क्योंकि ऐसा करने में कोई साक्ष्य संबंधी बाध्यता नहीं है। इसलिए समिति चाहती है कि इस धारा में इस आशय का संशोधन किया जाए कि आरोपी के मौन से यथोचित अनुमान निकालने की व्यवस्था हो सके। (पैरा 3.40)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट में दी गयी अधिकार प्रक्रिया मेनका गांधी की व्याख्या से पहले की स्थिति में सिकुड़ गई है। मेनका गांधी की व्याख्या यहीं तक सीमित थी कि धारा 21 में निहित जीवन और जीवन-स्वातंत्र्य के अधिकारों की व्याख्या कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है जो अपने में काफी नहीं है। इस लिहाज से मलिमथ कमेटी भारतीय संवैधानिक विधि परंपरा की संपूर्ण समझ के साथ काम कर रही है। यह अलग बात है कि किसी प्रतिष्ठित विधि संस्थान में पढ़ने वाला कोई छात्र इस तरह का तर्क प्रस्तुत करेगा तो उसे परीक्षा में पास होना भी मुश्किल होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस 'बेशकीमती' सिफारिश के साथ दो 'सावधान-पत्र' भी जुड़े हैं : पहला यह कि केवल न्यायालय ही प्रश्नों को तय करेगा और तब ही वह इन प्रश्नों को करेगा भी। दूसरे, अपराधी को शपथ नहीं दिलाई जायेगी और प्रश्नों के उत्तर देने से मना करना या झूठे उत्तर देना दण्डनीय अपराध नहीं होगा। इसमें नया यह नहीं है कि न्यायालय ही प्रश्नों का निर्धारण करेगा और उन्हें करेगा भी बल्कि नया यह है कि अभियुक्त मौन रहने के अधिकार का उपयोग करेगा तो उसे प्रतिकूल अनुमान का जोखिम उठाना पड़ सकता है। कमेटी के अनुसार यह ऐसी साक्ष्य संबंधी वाध्यता के समान नहीं है जो मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई और जीवन तथा जीवन-स्वातंत्र्य के अधिकारों का उल्लंघन करे।&lt;br /&gt;भारत में न्याय रिपोर्ट परंपरा की समझ पर आधारित नहीं है, बल्कि तुलनात्मक न्याय व्यवहार, जिस पर समय-समय पर ठीक-ठीक शोध भी नहीं हुआ है, इस रिपोर्ट का मार्गदर्शन है। यह प्राथमिक रूप से मानव अधिकार संबंधी यूरोपीय न्यायालय के दो निर्णयों मुर्रे और कॉन्ड्रोन पर निर्भर करती है, मगर इस व्यापक सिफारिश का समर्थन भी नहीं करती। मुर्रे में अभियुक्त शपथ लेकर साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करता। कॉन्ड्रोन में ऐसा होता है। कॉन्ड्रोन में न्यायाधीशों द्वारा निर्णायक मंडल (जूरी) को दिये गये निर्देशों का मामला निहित है जबकि भारतीय स्थिति में पंच फैसले की सार्थकता न के बराबर है। न्यायालय ने कॉन्ड्रोन मामले में यह बात पाई कि पुलिस थाने में आवेदक के मौन से क्या निर्णायक मंडल को प्रतिकूल अनुमान लगाने का अधिकार देने की संभावना उचित ठहरती है। इस बात का मूल्यांकन करने में निम्लिखित सुरक्षा-उपायों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए: आवेदक के गुनाह का पता निर्विवाद रूप से संपूर्ण अदालती कार्रवाई के बाद ही लग पाता है, निर्णायक मंडल को विशेष रूप से निर्देश दिया गया है कि आवेदकों का मौन अपने आप में उनके गुनाह को सिद्ध नहीं करता, मुकदमे की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को आवेदकों के मौन पर निर्णायक मंडल को निर्देश जारी करने से पहले खुद की जवाबदेही के प्रति अपने आप को आश्वस्त करना पड़ता है। निर्णायक मंडल केवल ऐसी स्थिति में प्रतिकूल अनुमान लगा सकता है जब उसे निश्चित रूप से पता हो कि पुलिस द्वारा पूछताछ के समय आवेदकों का मौन इसलिये है कि उनके पास कोई उत्तर है ही नहीं या ऐसा कोई उत्तर नहीं है जो न्यायालय में किये जाने वाले प्रश्नों को झेल सके और अंतिम रूप से यह कि निर्णायक मंडल का आवश्यक रूप से यह कर्तव्य भी नहीं है कि वे प्रतिकूल अनुमान लगायें ही।&lt;br /&gt;ऊपर दिये गये लंबे किंतु आवश्यक उद्धरण में इस बात पर जोर दिया गया है कि अपराध को सिद्ध करने के लिए अपराध के तार्किक संदेह से परे मानक का पता लगाना जरूरी है, ऐसा मानक जिसे यह रिपोर्ट भारतीय आपराधिक न्याय प्रशासन को ध्वस्त करने के लिये उचित ठहराती है। इंगलैंड की आत्मस्वीकृतियों के अंतर्गत, सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को जवाबदेही के स्तर पर अपने आपको संतुष्ट करना होता है। निर्णायक मंडल प्रतिकूल अनुमान तभी लगा सकता है जब वह तर्कजन्य संदेहों से परे निश्चय की स्थिति में हो लेकिन मलिमथ रिपोर्ट न्यायाधीशों के हाथों में मानव अधिकारों की कहीं अधिक मजबूत और विरोधी डोर सौंपती हैं। साथ ही, ये मामले इस बात की इजाजत न देने पर जोर देते हैं कि अभियुक्त यदि मौन रहने के अपने अधिकार पर डटा रहता है तो उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगा लिया जाए या जब ऐसे अनुमान को उचित ठहराने वाला कोई भी सबूत न हो। वास्तव में ये निर्णय ऐसे अनुमान लगाने के लिए उपलब्ध साक्ष्य के मान्य वजन को देखते हुए केवल तार्किक और उचित ठहराने लायक निष्कर्षों के आधार पर एक अधिकार को जन्म देते हैं, और स्थापित करते हैं। यह विवेकपूर्ण अधिकार प्राथमिक रूप से तब उपलब्ध होता है जब अभियुक्त शपथ लेकर सबूत देने के रास्ते को चुनता है और तब भी जब बहुत मुश्किल और राष्ट्रीय या क्षेत्रीय मानव अधिकार निगरानी व्यवस्थाओं के अंतर्गत समीक्षा योग्य परिस्थितियां सामने आती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन मामलों को 10-15 बार सरसरी तौर पर पढ़ लिए जाने से निष्कर्ष यह संभव नहीं जान पड़ता कि कमेटी के विद्वान सदस्यों को इस न्याय व्यवहार ज्ञान की थोड़ी भी समझ न हो। रिपोर्ट में शामिल ब्रिटेन के न्याय व्यावहारिक ज्ञान संबंधी उल्लेख अत्यंत त्रुटिपूर्ण हैं। दरअसल आस्ट्रेलियाई न्याय व्यावहारिक ज्ञान के बारे में इसकी टिप्पणी अचंभित कर देती है क्योंकि इसमें अधिकारों के विधेयक का जरा भी जिक्र नहीं है। इसके अलावा अमेरिका, कनाडा, फ्रांस और इटली के न्याय व्यावहारिक विधा के समर्थन का उल्लेख करते हुये बहुत कम सबूत पेश किये गए हैं जबकि उल्लेखों में इनका समर्थन किया गया है! अनभिज्ञता के इस दायरे में कमेटी से यह अपेक्षा करना बहुत ज्यादा होगा कि वह तुलनात्मक आपराधिक और मानव अधिकार न्याय व्यावहारिक विधा की थोड़ी बहुत, भले ही वह बहुत कम हो, जानकारी रखे। वास्तव में उपराष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार सम्मेलनों में कथ्य और निष्पक्ष सुनवाई की व्याख्या करते समय कमेटी ने बहुत कम ध्यान दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे आगे मलिमथ कमेटी भारतीय आरोपी को उपलब्ध कानूनी सेवाओं तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न मार्गों को भी नजरअंदाज करती है। अधिक 'विकसित' यूरोपीय-अमेरिकी व्यवस्था में मौन के अधिकार से अनिच्छा के बावजूद दूरियां व्याप्त हैं जबकि ऐसे कल्याणकारी राज्य में वे कायम हैं जो अब भी आरोपी को कारगर और समान रक्षा परामर्श सेवाएं प्रदान करने में बहुत ज्यादा वित्तीय भार वहन करता है। इसके विपरीत हम कानूनी सेवाओं के लिए केन्द्र और राज्यों के बजट पर सतही निगाह डालें तो भी पूरी तरह पता चल जायेगा कि फौजदारी न्याय प्रणाली के शिकंजे में फंसे मताधिकार से वंचित भारतीयों ने खुद ही मानवीय और मानव अधिकारों की कीमत चुकाई है। कमेटी अकिंचन भारतीय विधि राज्य को उच्च व्यावसायिक और अपरिमित परामर्शी अधिकार व्यवस्था की बराबरी करने वाला ठहराती है। उसे जरूरत सिर्फ इस बात की थी कि वह वास्तविकता को वास्तविकता की दृष्टि से देखे कि अत्यंत गरीब आरोपी के लिए कानूनी सहायता की खातिर नियुक्त परामर्शदाता सार्वजनिक अभियोजन पक्ष और हिरासत में व्याप्त आतंक और प्रताड़ना की स्थिति दोनों से टकरा रहा है जिससे एक क्रूर असंतुलन पैदा हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff9900;"&gt;निर्दोषिता (भोलेपन) की परिकल्पना&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट ने निर्दोषिता की परिकल्पना की कड़ी में कुछ कमियों के बारे में जोर देते हुए किसी बात को सिद्ध करने की प्रामाणिकता के मानक को संशोधित करना चाहा है। फिर भी दोनों ही बातों में उसका विश्लेषण अधकचरा रहा है। इसे और तीखे रूप में कहें तो कमेटी जिसके बारे में भी कह रही है, उसके बारे में ज्यादा सबूत पेश नहीं करती। निर्दोषिता की परिकल्पना सिद्धांत के बारे में वह बुरी तरह परेशान है जो उसने अभिव्यक्त भी किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रोफेसर ग्लानविल विलियम्स की नजीर पर (पैरा 5.145.15) संदर्भ सहित टिप्पणी करते हुए रिपोर्ट दोषपूर्ण रिहाई यानि 'दोषियों की रिहाई की अतिशय प्रतिशतता' का जिक्र करती है और प्रसन्नतापूर्वक कहती है: दोषियों की रिहाई की संख्या जितनी अधिक, उतने ही अधिक अपराधी भी, जिन्हें अधिक अपराध करने के लिए समाज में विचरण की पूरी छूट दे दी जाती है। वे और भी निर्भीक होंगे क्योंकि वे अपने अनुभव से जानते हैं कि उन्हें दण्डित किये जाने का कोई मौका नहीं है। (पैरा 5.16)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक प्रोफेसर ग्लानविल विलियम्स को समझने की बात है, वहां तक तो ठीक है, पर इस तरह के तर्क ऊपर से भले ही ठीक लगें, दरअसल ऐसे हैं नहीं। कोई यह कैसे जान लेता है कि निर्दोषिता की परिकल्पना के झांसे में अपराधी रिहा कर दिये जाते हैं? निश्चित ही इस तरह का विचार तार्किक ढंग से इस धारणा को जन्म देता है कि उचित प्रक्रिया से पहले जो ज्ञान मीमांसा काम करती है (आपराधिकता तय करने से पूर्व ज्ञान मीमांसा की भूमिका आवश्यक है) वह गलत है। परिणाम तक पहुंचने के लिए किसी को स्थापित विधि-प्रक्रिया के बाहर पूर्व निर्धारण की इस स्थिति में पहुंचना पड़ता है कि आरोपी गुनहगार है भी या नहीं। उसे सीधे ही गुनहगार कहने मात्र से ही वह गुनहगार नहीं हो सकता, ऐसे परिणाम तक पहुंचने का इरादा कोई भी सुधी विचारक नहीं कर सकता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे भी आगे हम यह कैसे जान सकते हैं कि अनेक आरोपी निर्दोषिता की परिकल्पना को अपराध करने का लाइसेंस मानकर चलते हैं। रिपोर्ट में ऐसे किसी अध्ययन का उल्लेख नहीं है। न्यायालय, दरअसल, एक निर्दोष को बचाने के लिए दस गुनहगारों को रिहा नहीं करता। प्रत्येक मामले में न्यायाधीश और न्यायालय आरोपी के गुनाह या भोलेपन को उनके सामने रखे गये तथ्यों या तर्कों के आधार पर परख कर फैसला देते हैं। दुबारा कहें तो 'निर्दोषिता की परिकल्पना' का जुमला दरअसल इस तथ्य का द्योतक नहीं है कि अगर एक निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुंचता हो तो उसे बचाने के लिए 10 दोषियों को छोड़ दिया जाए, बल्कि वह तो बार-बार यही कहता है कि न्यायालय किसी भी हालत में यह परिकल्पना नहीं करते कि 11 में से 10 लोग वास्तव में कथित अपराधों के गुनहगार हैं। रिपोर्ट फौजदारी न्याय की नई आमसमझ के चक्करदार आविष्कार के बैनर तले इस जुमले की वेशकीमती शक्ति को उलट देना चाहती है।&lt;br /&gt;इस नई आम समझ को आगे जाकर लोकवादी अलंकरण का जामा पहनाया गया है। कमेटी व्यंग्यपूर्ण ढंग से कहती है कि निर्दोषिता की परिकल्पना के अंतर्गत रिहा कर दिये गये 'अपराधी' सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण और संवेदनशील पद ले सकते हैं। अगर देश पर अपराधियों का शासन चलने लगे तो कोई भी परिणामों की कल्पना कर सकता है। (पैरा 5.16)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमेटी से सहमत कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसी विकट स्थिति आ चुकी है। ऐसी अनेक और मलिमथ कमेटी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रिपोटर्ें उपलब्ध हैं जैसे वोहरा कमेटी और निर्वाचन आयोग के तत्वावधान में चुनावी सुधार, इस रिपोर्ट की तरह निर्दोषिता की परिकल्पना के सिद्धांत की कार्य पद्धति पर दोषारोपण नहीं करती। वह समस्या के हल के रास्ते निर्वाचित प्रणाली में सुधार में ढूंढती है और ऊंचे पदों में भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिये उत्तरदायी तंत्रों पर और ज्यादा जोर देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रिपोर्ट की मूलभूत कठिनाई उसका सहर्ष यह परिकल्पना करना है कि प्रत्येक आरोपी गुनहगार है जब तक कि वह निर्दोषिता (भोलापन) सिद्ध नहीं कर देता। एक निर्दोष को बचाने के लिए दस गुनहगारों को छोड़ देने वाली धारणा के वशीभूत कमेटी अपने लिए असाधारण अधिकार का दावा करती है। वह यह पहले ही जानती है कि रिहा हुये 10 लोग वास्तव में गुनहगार हैं जबकि यह जानने के लिए उचित प्रक्रिया पर आधारित सुनवाई और पुनर्विचारार्थ अपीलीय प्रक्रिया जरूरी है। यह किसी मनमाने शासन द्वारा बनाई गई कमेटी के छह सदस्यों को भेंट स्वरूप दी गई उस क्षमता जैसी है, जो उन्हें भविष्यवक्ता बना देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#33ccff;"&gt;तर्कसंगत संदेह से परे गुनहगार ठहराना&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट सबूत के मानक की प्रामाणिकता को लेकर खासी परेशान है। फिर भी कोई उसकी इस तड़पन के मूलाधारों की व्यर्थ में तलाश करना चाहे तो करे।&lt;br /&gt;उसके टेढ़े-मेढ़े विवरणों को समझने में सबसे विकट रुकावट इस तथ्य के कारण उपस्थित होती है कि कमेटी अपने लक्ष्य के बारे में अनिश्चित है। एक ओर उसका विलाप है कि यह मानक अनिवार्य रूप से निर्दोषिता की परिकल्पना के सिद्धांत से ही जन्म लेता है तो दूसरी ओर कमेटी खुद ही कई जगहों पर इस बात को स्वीकार करती है कि 'मानक अपने में अंतिम नहीं है'। विधायी अपकर्ष और विचलन, तभी संवैधानिक माने गये हैं जब संविधान की धारा 21 के प्रदत्त अधिकारों की बार में उनका डट कर विरोध हुआ (पैरा 5.6-5.8)। तब क्या चीज समस्या खड़ी करती है जिसे कमेटी निशाना बनाना चाहती है? इस प्रश्न का कमेटी बिल्कुल भी उत्तर नहीं देना चाहती! हमें कहा जाता है कि हम आस्था के रूप में कुछ तो लें, लेकिन सबूत के मानकप्रमाणिकता के संदर्भ में यह गलत है। इस 'कुछ तो' को अत्यधिक उदासीनता के साथ व्याख्यायित किया जाता रहा है। हमें पढ़ायाबताया जाता रहा है (विस्तृत प्रकथन के बगैर) कि 'तर्कसंगत संदेह से परे का सबूत' सार्वभौमिक प्रयोग का मानक नहीं है : फ्रांस ने इस मानक को नहीं अपनाया है (पैरा 5.22)। इस तुलनात्मक न्याय व्यवहार ज्ञान के चुटकलों से आखिर मिलता क्या है? वर्ष 1867 की ओर देखें तो हमें पढ़ाया ही नहीं, बल्कि इस तथ्य से हमारा मनोरंजन भी किया गया कि सार्वजनिक जुआ अधिनियम के धारा 4 में इस मानक की व्याख्या है। पर इस औपनिवेशिक इतिहास की गप्प से भी क्या निष्कर्ष निकलता है? रिपोर्ट कहती है कि समय बदल चुका है।&lt;br /&gt;अब कितना बदलाव आ चुका है... आजकल लोगों की जानकारी बेहतर है। प्रेस, रेडिया, टेलीविजन, फिल्में, और विभिन्न प्रकार का साहित्य लोगों की जानकारी बढ़ाने और अपराधों के विभिन्न तौर-तरीकों के प्रति आगाह करने में अत्यधिक असरकारक है। अपराधी आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग और ऐसी तकनीक काम में लाते हैं जिनसे ऐसा कोई सबूत हाथ नहीं लगता कि उन्हें पकड़ा जा सके। आरोपी और ज्यादा दुस्साहसी और क्रूर होते जा रहे हैं। नैतिकता का स्तर गिर गया है और सच्चाई के प्रति आदरभाव दूर होता जा रहा है। ...ऐसा लगता है जैसे अपराधी कानून और व्यवस्था कायम करने वाली एजेंसी से ज्यादा ताकतवर होते जा रहे हैं। (पैरा 5.28)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर दिये गये अनर्गल या खोखले तर्कों से तो एक ही आशय प्रकट होता है कि कुछ चीजें सच हैं क्योंकि हम कहते हैं कि वे ऐसी है। यह भी कि सबूत के मानक में संशोधन करने की जरूरत है। विधि-सुधार के उपाय, जिन्हें अनर्गल तर्कों, गप्पों और नारों से पुष्ट करने का प्रयास रहता है, आज फौजदारी न्याय के प्रशासन में मानव अधिकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। जो भी हो, रिपोर्ट तय करना चाहती है कि किसी भी तरह तर्कसंगत न्याय से परे जो भी सबूत हो, उसके मौजूदा लचीले मानक को बदल दिया जाए। रिपोर्ट के पैरा 5.30 में सुझाव है कि हम 'स्पष्ट और समझ में आने वाले' सबूत के भिन्न मानक अपनाएं। कमेटी के अनुसार यह दीवानी मामलों में संभाव्यता के प्रभुत्ववान (प्रधान) मानक और फौजदारी मामलों में तर्कसंगत संदेह से परे वाले मानक के बीच की सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। रिपोर्ट मानती है कि तर्कसंगत संदेह से परे वाला मानक अत्यंत व्यक्तिपरक (आत्मनिष्ठ) होता है; यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित मानक इससे कम कैसे हो सकता है। कमेटी की सिफारिश है (पैरा 5.13(द्बद्बद्ब)पृ.270) कि साक्ष्य अधिनियम के अनुच्छेद 3 को संशोधित कर इस तरह पढ़ा जाना चाहिए: फौजदारी मामलों में, जब तक अन्य व्यवस्था न हो, किसी तथ्य को तभी सिद्ध हुआ बताया जाता है, जब अपने समक्ष आये मामलों पर गौर करने के बाद अदालत संतुष्ट हो जाये कि यह सच है। तर्कसंगत संदेह से परे वाले सबूत के बारे में यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह भारतीय निर्णयन के इतिहास में कभी न दिखे, कमेटी आगे सिफारिश करती है कि प्रस्तावित संशोधन ''किसी भी अदालत के फैसले या आदेश में इसके विरुद्ध कुछ भी पाये जाने के बावजूद कारगर बना रहेगा''। अधिवक्तागण इसे 'आउस्टर क्लॉज' (बाहर निकाल फेंकने वाले परिच्छेद) का नाम देते हैं - एक ऐसी व्यवस्था जिसे न्यायिक शक्ति को हटाने की दृष्टि से बनाया गया है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस तरह के परिच्छेदों की वैधता के बारे में अक्सर टिप्पणी की है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर ऐसे परिच्छेद कानूनी जामा अख्तियार कर भी लें तो सामान्य न्याय व्यावहारिक ज्ञान और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत के अंतर्गत भी उनकी वैधता को निरस्त कर दिया जायेगा क्योंकि यह सिद्धांत न्यायिक शक्ति को कम करने की किसी भी साजिश का पक्षधर नहीं है। मलिमथ कमेटी जिसे 'अभी यात्रा कर लो, भुगतान बाद में कर लेना' की तर्ज वाले विधि-सुधार में विशेषज्ञता हासिल है, इस स्थिति से कतई विचलित नहीं हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संभव भी है और ऐसी धारणा भी बनाई जा सकती है कि प्रस्तावित संशोधन, संभावनाओं के प्रभुत्व के सबको नापसन्द और अपेक्षाकृत कम मानक की ओर यथार्थत: न्यायिक रास्ते से लौट आए। कोई भी सावधानीपूर्वक काम करने वाला न्यायालय वास्तव में इस भाषा के स्पष्ट उपयोग के जरिये अपने निर्णय को उचित नहीं ठहरायेगा। लेकिन वास्तव में वह इस बात का पता लगा सकता है कि यह तथ्य सच है, कम से कम इस कारण कि उसके विचार से न्यायिक अपराध निर्णय को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त संभावना है। रिपोर्ट का इस संभाव्य की ओर ध्यान नहीं है कि इस दोष में फौजदारी न्याय देने की प्रक्रिया में मानव अधिकारों के लिए खतरा निहित है। खासतौर से जब पूर्व मानक संबंधी न्यायिक वार्तालाप को पूरी तरह बाहर फेंक देने वाले अतिरिक्त संशोधन की भूमिका पूर्णत: नजरों के सामने रहे। फौजदारी न्याय प्रणाली की मान्यताओं के साथ छेड़छाड़ या जोड़-तोड़ करने वाली यह प्रवृत्ति तभी ठीक समझ में आ सकती है जब हम प्रतिवादी प्रणाली के आंशिक संशोधन के उस तर्क को समझ लें जिसे रिपोर्ट दिली तौर पर प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;फौजदारी न्याय की संकर प्रणाली&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेरा विश्वास है कि रिपोर्ट का असल पाठ 'अन्वेषकीय' प्रणाली के अच्छे तत्वों को चुनिंदा रूप से शामिल करने की छद्म प्रवृति को पकड़ पाने में बाधक है। खण्ड-1 में अन्वेषकीय प्रणाली की हूबहू तस्वीर दी गई है, अन्वेषकीय प्रणाली को कमेटी द्वारा सीधे ही समझ लेने वाली बात खण्ड-2 के परिशिष्ठ-10 में दी गई है। खण्ड-2 केवल एक अधिक्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करता है और वह है फ्रांस। लेकिन यहां भी, आलेख कम बेतुका नहीं है। कमेटी को सूचित किया गया कि अभियोग पक्ष को तर्कसंगत संदेह से परे मामले को सिद्ध करना है (खण्ड-2, पृ 378)। अगर ऐसा है तो यह समझना मुश्किल है कि फिर वह सबूत की प्रामाणिकता और मानक को हटा देने की क्यों सिफारिश करती है।&lt;br /&gt;आगे चलकर कमेटी पाती है कि सच की न्यायिक जांच प्रणाली पूर्व-मामलों पर आधारित नहीं होती। पूर्व के निर्णय, पूर्व-पीठिका नहीं बनते और उनका कभी-कभी ही उल्लेख होता है। फ्रांस में ऐसा प्रतीत होता है कि आपराधिक अपीलों में भी जूरी (पंच) प्रणाली काम करती है। अन्वेषकीय प्रणाली से शामिल किये गये अच्छे, चुनिंदा हिस्सों का जूरी से क्या ताल्लुक है - निष्पक्ष और पूर्व-निर्णयों पर ध्यान देने वाली भारत की फौजदारी न्याय प्रणाली में कमेटी की जरा भी रुचि नहीं है। जो उसे अच्छा लगता है, वह यह तथ्य (या अफवाह?) है कि फ्रांस में मामले तेजी के साथ निपटा दिये जाते हैं, एक ही दिन में या दो साल में। अवधि मामले के स्वभाव या उसकी जटिलता पर निर्भर करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय मामले की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देगा, हम मौजूदा भारतीय संविधान के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा अधिकारों के कानून को आमूलचूल बदले बिना चुनिंदा तौर पर भी ऐसा रास्ता किस तरह चुन सकते हैं? फ्रांस में मजिस्ट्रेटों और अभियोग चलाने वालों के ओहदे या पद आपस में परिवर्तनीय हैं। क्या यह परिवर्तन भारत में जरूरी या संभव है? अगर ऐसा है तो रिपोर्ट को हमें और खुलासा करके बताना चाहिए। फ्रांस के न्यायालय में शांत और चुस्त माहौल देखने को मिलता है जबकि भारत के न्यायालय के माहौल में व्यस्तता ही व्यस्तता नजर आती है। कमेटी आगे चलकर फ्रांस की एक सरसरी यात्रा करने के बाद बताती है कि फ्रांस के लोग अपने देश में मिलने वाले न्याय से प्रसन्न और संतुष्ट लगते हैं (पृ 378)। वास्तव में वे फ्रांस में वहां के लोगों से मिले भी नहीं। कुछ चुनिंदा अंशों को शामिल करने की सिफारिश मुख्य रूप से फ्रांसीसी लोगों की संतुष्टि जैसे वर्णन पर ही आधारित है। पेरिस में छुट्टी मनाने की मदहोशी में कमेटी अनेक उच्च न्यायालयों द्वारा इस बदलाव के प्रति व्यक्त दुखद प्रतिक्रिया को सुनना ही नहीं चाहती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सबके रहते, अन्वेषकीय प्रणालियों के चुनिंदा अंशों को शामिल करने के विचार को समझ पाना मुश्किल है। वास्तव में प्रस्तावित यह है कि प्रतिवादी प्रणाली को पूरे पैमाने पर हल्काफुल्का कर दिया जाए। सच्चाई का पता लगाने का उनकार् कत्तव्य है। जांच को निर्देश देने के उनके पास अनेक नये अधिकार हैं और मौन के अधिकार तथा निर्दोषिता की परिकल्पना को वे क्षीण या कमजोर कर सकते हैं, ऐसे आरोपण से न्यायाधीश और न्यायालय अभियुक्त ठहराने की दर में वृद्धि करना अपना कर्तव्य मान लेंगे। संक्षेप में, कमेटी भारतीय फौजदारी न्याय प्रणाली के आमूल नवीकरण का प्रस्ताव करती है चाहे वह प्रच्छन्न या गुप्त रूप से हो या फिर निष्क्रियता से। प्रच्छन्न रूप से इसलिये कि वह मौजूदा प्रतिवादी प्रणाली को सुधारने के बहाने अन्वेषकीय प्रणाली की तस्करी करना चाहते हैं और निष्क्रियता से इसलिये क्योंकि उसे परिवर्तन के काम और शिल्प पर सावधानी और जिम्मेदारीपूर्वक ध्यान देने की कोई फिक्र नहीं है। देश की स्वाधीनता के पांच से अधिक दशक के बाद आधी-अधूरी विधि-सुधार प्रक्रियाओं का, जो भारत में मानव अधिकारों के भविष्य पर संकट बढ़ाने का काम कर सकती हैं, यह एक दुखद और तीक्ष्ण लक्षण दिखाई देता है। यह और भी दुर्भाग्य की बात है कि केन्द्रीय विधि मंत्री मलिमथ कमेटी के प्रति अपनी पूर्व-प्रतिबद्धता का यह कहकर संकेत देते हैं कि वह सुधारों को कमेटी के सुझावों के अनुरूप कार्यरूप देंगे (देखें रिपोर्ट का कृतज्ञता ज्ञापन पृष्ठ)! सचमुच में यह पूर्णाधिकार पत्र के जरिये, विधि-सुधार करने जैसा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#33cc00;"&gt;अपराध, गिरफ्तारी, जांच और जमानत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यहां पर 'आतंक से पीड़ितों' से आशय आमतौर पर अंगछेदन, हत्या, आगजनी और बलात्कार के दौर से गुजरने वाले पीड़ितों से है। ये लोग राजनीति से प्रेरित किसी पीड़ादायक कर्म के पीड़ित नहीं हैं। जहां तक मैं देख सकता हूं, ऐसी एक भी सिफारिश नहीं है जो राजनीतिक वर्ग से संबंधित किसी संदिग्ध या आरोपी को अपने घेरे में लाती हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी इसमें कहीं भी हिरासत में हिंसा, शारीरिक यंत्रणा और निरंकुशता के खिलाफ लड़ने पर जोर नहीं दिया गया है। (पहले की सिफारिश कि भारत को औपनिवेशिक काल से विरासत में मिले भारतीय पुलिस अधिनियम में संशोधन करने की जरूरत है, का आमतौर पर समर्थन करने के अलावा - पैरा 7.31)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#33cc00;"&gt;असाधारण कानून&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अधिकतर भारतीय राजनीतिक दल, चाहे वे किसी भी विचारधारा के हों, चुनाव प्रक्रियाओं में अपराधियों के प्रवेश की जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकते। ये अपराधी राजनीतिक दलों का हरसंभव ढंग से समर्थन करते हैं ताकि वे इन पार्टियों में टिके रह सकें या शक्ति प्राप्त कर सकें। समाज-विरोधी तत्वों को राजनीतिज्ञ केवल चुनाव में अपनी मदद के लिये ही नहीं लाते वरन उनके जरिये अपने प्रतिद्वन्द्वियों का सफाया भी करना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीतिक नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं आदि की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा हत्याएं गंभीर रूप अख्तियार करने लगी हैं। राजनीतिक दलों और संगठित अपराध के बीच सांठगांठ पूरे जोरों पर है। (पैरा 17.16.7)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमेटी ने इस सांठ-गांठ को कमजोर करने के इरादे से एक भी विशिष्ट या सीधा सुझाव नहीं दिया है। आर्थिक अपराधों और आतंकवादजन्य अपराधों पर रिपोर्ट ने ध्यान केन्द्रित तो किया है लेकिन इस सांठ-गांठ को तोड़ने के तरीके क्या हो सकते हैं, इसके बारे में कोई सुझाव नहीं दिया गया है। ऐसी स्थितियों में, राजनीति और संगठित अपराध को लेकर उस पर दुख प्रकट करना घड़ियाली आंसू बहाना बनकर रह जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमेटी यह भी पूरी तरह मानने को तैयार नहीं है कि नौ नवंबर से बहुत पहले और करीब-करीब भारतीय स्वाधीनता के आरंभिक वर्षों से ही भारतीयों को तब-तब मूलभूत मानव अधिकारों के उल्लंघन के ढेर सारे अनुभव होते रहे हैं, जब जब उन्होंने राजनीतिक विप्लव के विभिन्न स्वरूपों, अक्सर जिन्हें आतंकवाद का नाम दिया जाता रहा है, में भागीदारी निभाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्ट, इस सांस्थानिक उभयवृत्तिता के प्रति भी चिंतित नहीं है। बल्कि राज्य के पीड़ोन्माद के सांस्थानीकरण की वैध कार्यवाही की ओर से मुंह मोड़ लेती है। दूसरे शब्दों में कहें तो उसका प्रच्छन्न संदेह, जो अत्यंत परेशानी में डालने वाला है, यह है कि रोजमर्रा की आपराधिक न्याय प्रणाली और असाधारण उपायों के बीच जो आधी शताब्दी से अंतर चला आ रहा है उसका संवैधानिक जामा अब उतरने ही वाला है।&lt;br /&gt;गुजरात में 2002 में शासन द्वारा प्रायोजित हिंसा की असाधारण गतिविधियों के रहते किसी को भी समझ में आ जाता है कि 'राष्ट्रीय' (विश्व हिन्दू परिषद की तरह) और 'राष्ट्रविरोधी' (आवश्यकीय रूप से मुसलमानों के) संगठनों, जो विदेशी धन प्राप्त करते हैं, के बीच अंतर कायम किये जा सकते हैं। रिपोर्ट में भारतीय मुसलमानों का गुण्डा राज्य (पैरा 18.10) और पाकिस्तान के धनबल से चलने वाला आतंकवाद (पैरा 19.419.5) के गद्य से स्थिति और बिगड़ी नजर आती है। रिपोर्ट अपनी एकतरफा प्रस्तुति में बहुत बड़ी गलती करती है क्योंकि दुर्भाग्यवश यह सुझाव देती लगती है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियां किन्हीं नामित और चिन्हित समुदायों की अन्तर्निहित प्रवृत्ति में शामिल रहती हैं। रिपोर्ट के पाठ में दुर्भाग्यवश ऐसी चीजें उठाई गई हैं जो इरादातन तो नहीं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक वातावरण में राजनीतिक रूप से उग्र कटाक्ष हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'राष्ट्र विरोधी' नाम की मिसाइल अक्सर बेधड़क और असावधानीपूर्वक दाग दी जाती है, ऐसे विवेकशील, ईमानदार और सभ्य, शालीन नागरिकों के खिलाफ जो भारत के संविधान के अंतर्गत अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहते हैं। संविधान की ओर उन्मुख किसी भी फौजदारी न्याय प्रणाली के सुधार में मूल अधिकारों की रक्षा के लिए जगह दी जानी चाहिए ताकि लोग अपने मूल दायित्वों व कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। रिपोर्ट ने फौजदारी न्याय प्रणाली को फिर से लोकतांत्रिक स्वरूप में लाने का अमूल्य अवसर खो दिया है, यह दुख की बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इधर-उधर की&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;कमेटी द्वारा की गई कुछ सिफारिशों में तो 'सरमन ऑन द माउन्ट' जैसी गुणवत्ता निहित है। वे मिथकीय 'टेन कमाण्डमेंट्स' के समकक्ष लगती हैं। कुछ अध्याय तो बिल्कुल खोखले हैं। मिथ्या शपथ की समस्या पर तो रिपोर्ट खोखली लगती है और पाठक को कहीं भी नहीं ले जाती (पृ. 154-5)। यही हाल अदालतों के लंबित मामलों को निपटाने संबंधी पृष्ठों का है जिनमें गपशप ज्यादा है और कोई बात निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। लंबित मामलों के निपटान संबंधी स्कीम तो ठोस नजर आती है (पैरा 13.6.1) पर मामलों के बकाया रह जाने का कोई ठोस कारण नहीं दिया गया है ताकि साफ समझ बन सके। मेरी अपनी पुस्तक 'क्राइसिस ऑफ दि इंडियन लीगल सिस्टम' में इसी विषय का विश्लेषण उपलब्ध है। यह पुस्तक बहुत पहले 1982 में प्रकाशित हुई थी। वह हर स्तर पर प्रतिबद्धता और आक्रामक ढंग से पीछा करने की सराहना करती है और सुझाव देती है कि आवश्यक वित्त, मानव-शक्ति और आधारभूत ढांचा बिना किसी चापलूसी, खुशामद या लाग लपेट के उपलब्ध कराया जाना चाहिए। (पृ.166) कोई सिर्फ यह कह सकता है: ''आमीन, निस्संदेह इन ऊंचे दिमागी उपदेशों में कहीं कोई प्रसंगानुकूलता, संगति तो है नहीं, उल्टे भारत में न्याय-निर्णय प्रक्रिया की आर्थिकी और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के इतिहासों की थेड़ी-सी भी समझ को उनमें शामिल नहीं की गई है''। भारत में पुलिस की भूमिका से संबंधित अध्याय-19 भारतीय पुलिस में सुधार संबंधी राष्ट्रीय रिपोर्टों के थका देने वाले अंबार में ज्यादा कुछ नहीं जोड़ पाता। दरअसल इस रिपोर्ट का गद्य पिछली सामग्री को पढ़ने के अध्यवसाय संबंधी गहरे संदेहों को उठाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय दण्ड विधान में सुधार के लिए की गई कुछ सिफारिशें आज भी ऐसे लगती हैं जैसे उन्हें करने में दिमाग से काम नहीं लिया गया। उदाहरण के तौर पर पैरा-16.4 अनुच्छेद 498ए को 'बेदिल व्यवस्था' करार देता है (बिना कोई आंकड़े या सबूत दिये), सिर्फ इसलिये कि वह विवाहित महिलाओं के खिलाफ क्रूर व्यवहार करने वालों को गैर-जमानती और असंयोजनीय का दर्जा देता है। उत्सुकतावश, रिपोर्ट मानती है कि क्योंकि भारतीय महिला का विवाह एक पवित्र बंधन है, इसलिए वैवाहिक संबंधों और घरेलू क्रूरता और हिंसा के संदर्भों में तथा उस पर प्रतिघात करने से वह अपेक्षाकृत बड़ी मुश्किल में पड़ जाती है क्योंकि वह आर्थिक रूप से हमेशा दूसरों पर निर्भर रहती है। (पैरा 16.4.3)&lt;br /&gt;रिपोर्ट अपने प्राक्कथन में यहां तक जाती है कि एक कम सहिष्णु और आवेगी महिला किसी नगण्य अपराध के लिए भी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करवा सकती है (पैरा 16.4.4)। यह अनुच्छेद न तो पत्नी की मदद करता है न पति की (पैरा 16.4.4)। जैसे पादरी या अध्यापक अपने आसन से उतरने के बाद कोई तर्क दे। रिपोर्ट सिफारिश करती है कि अपराध को जमानती और संयोजनीय दोनों दर्जे में रखा जाये जिससे दम्पति या युगल को एक दूसरे के पास आने का अवसर मिले (पैरा 16.4.5)। यह तो एक तरह से पागलपने जैसी बात हुई। कमेटी ने इस अनुच्छेद को लागू करने के सामाजिक प्रभाव की समस्या पर आंकड़ेवार या समाजशास्त्रीय दृष्टि से गौर करने का प्रयास नहीं किया, उल्टे वह स्थिर और पितृसत्तात्मक कल्पनाओं को फिर से चक्र में घुमाती है। यहां तक कि वह विशिष्ट पितृसत्तात्मक हितों के पक्ष में बोलती है। जिन परिवर्तनों के बारे में वह बिना सोचे समझे प्रस्ताव करती है, उनके लिए वह कोई मामला तैयार करने में भी असफल रही है। जब वह सिफारिश करती कि फौजदारी प्रक्रिया कानून में बलात्कार के मामलों में (पैरा 16.7) एफआईआर पेश करने के लिए यथोचित अवधि तय करने हेतु एक उपयुक्त व्यवस्था शामिल की जानी चाहिए, तब ऐसा लगता है जैसे कोई घुड़सवार योद्धा या 17वीं शताब्दी का राजपक्षीय व्यक्ति अपनी राय जाहिर कर रहा हो। यह विश्वास करने में दिक्कत होती है कि कमेटी गुजरात 2002 के अनुभव के बाद भी ऐसी सिफारिश करती है। गुजरात 2002 में केवल तीन एफआईआर ऐसी थीं जिनके बल पर आपराधिक मामला बन सकता था, जबकि शासन द्वारा प्रायोजित घटनाक्रम में असंख्य महिलाओं के साथ मर्यादा उल्लंघन की घटनाएं हुई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;निष्कर्ष के बदले में&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुझे न्यायमूर्ति मलिमथ और कमेटी के कम से कम एक सदस्य को जानने का फक्र हासिल है। यह सदस्य हैं कुलपति माधव मेनन, जिन्हें मैं दो दशक से ज्यादा अवधि से जानता हूं। अगर मुझे पूरी तरह यह बताया जाए कि वास्तव में रिपोर्ट को मैंने कैसे और कहां पर गलत पढ़ा या उसके बारे में गलत धारणा कायम की तो इससे ज्यादा खुशी मुझे किसी और चीज से नहीं मिलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी यह निबंध उनके क्रियाकलाप पर धावा बोलता है। मेरी भूमिका एक सहयात्री की रही है, ऐसे सह-नागरिक की जो धारा 51-ए से अनुप्राणित रहा है। इसके अनुसार सभी नागरिकों का दायित्व बनता है कि वे अपने में वैज्ञानिक सोच की चेतना जगा कर उसका विकास करें और सार्वजनिक प्रयासों के सभी रूपों में इस चेतना और वैज्ञानिक सोच की श्रेष्ठता को स्थान दें। कमेटी के विद्वान सदस्यों ने, मेरा विश्वास है कि अपनी सार्वजनिक छवि को धुंधला किया है और इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि उनके काम से फौजदारी न्याय प्रणाली में सुधार करने के उद्देश्य को भी नुकसान पहुंचा है। विधि-सुधार के गंभीर मुद्दों को यह नुकसान उनके भावना में बह जाने या दंभी हो जाने और घुड़सवार जैसी मनोवृत्ति अपनाने से हुआ। विधि सुधार के लिए मिला यह महान अवसर बड़ी बेरहमी से गंवा दिया गया। यहां तक कि उसकी कुछ ठीकठाक सिफारिशें भी, अभिव्यक्ति की खामी के चलते अपना रहा-सहा अर्थ गंवा बैठी हैं।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#33ff33;"&gt;_लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-8611098817360480264?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/8611098817360480264/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=8611098817360480264' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8611098817360480264'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/8611098817360480264'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_6822.html' title='लचर तर्कों वाली रिपोर्ट -प्रोफेसर उपेन्द्र बख्शी'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-7904899042643573385</id><published>2007-10-08T07:31:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T07:34:27.634-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गांधी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाशविक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अहिंसा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अप्राकृतिक मैथुन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बलात्कार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यातना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आचारविहीन'/><title type='text'>जेलों की बदहाली</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;कैदियों से लगभग सभी जगह समान रूप से बर्बरता का व्यवहार किया जाता है, यद्यपि हम भारतीय ऐसा नहीं सोचते हैं। विकसित और विकासशील दोनों तरह के देश अपने मुजरिमों के साथ अत्यंत निंदनीय व्यवहार करते हैं। उनके इस व्यवहार से समकालीन सभ्यता के स्वरूप और मनुष्यों के प्रति उनके आचार-व्यवहार का पता लगता है।&lt;br /&gt;अत्यधिक प्रतिगामी मानक लागू करते हुए भी भारतीय कैदी बहुत ही बुरी स्थिति में हैं - वे दुष्टता और विकृति के ऐसे माहौल में हैं जिसकी बराबरी विदेशों में धर्म और सदाचार पर पाखंड भरे उपदेशों से की जा सकती है। गांधीजी और अहिंसा के देश में जेल आचारविहीन और पाशविक हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;बलात्कार, अप्राकृतिक मैथुन, यातना, गैर कानूनी ढंग से लोगों को हिरासत में लेना, हथकड़ियां और बेड़ियां लगाना, निर्धारित सजा से अधिक समय तक नज़रबंदी, कालकोठरी की सजा, बच्चों को निर्दयी और कठोर बनाना, जेल अधीक्षकों द्वारा नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार और वेश्यावृत्ति कराने जैसी घटनाएं रोजाना जेलों में होती हैं। लोगों की आंखें निकाल लेना जैसा भागलपुर में हुआ, लोगों को अंधा बना देना अथवा कैदियों की गुदा में डंडा डाल देना जैसा कि बत्रा के मामले में हुआ था, ऐसी घटनाएं शायद हर सप्ताह का कार्यक्रम हैं।&lt;br /&gt;अगर भारत में मानव अधिकारों के अभाव की ओर किसी का ध्यान नहीं गया है तो इसका कारण यह है कि राज्य ने कानून और लाठी के बल पर उस पर पर्दा डाल दिया है। इससे होकर केवल वही लोग गुजरते हैं, जिन्हें लौटने की आशा नहीं होती। और जहां प्रेस, जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में जाने की अनुमति नहीं होती। अदालतें इस की अनदेखी करती हैं। जहां संदिग्ध मानकों के अंतर्गत गोपनीय शोध पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, जिनकी पांडुलिपियां, डिग्री मिलने के बाद कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं, जेल सुधारों पर अनुसंधान के बारे में कुछ भी नहीं किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप जेल प्रशासन का अपराधीकरण निरंतर बढ़ता जा रहा है। अपराधियों में कठोरता के और बढ़ने तथा कैदियों के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से टूटने का यह प्रमुख कारण है।&lt;br /&gt;मानव अधिकारों के प्रश्न के अलावा भारतीय राज्य को इतनी कम समझ है कि वह यह नहीं समझ रहा है कि अपनी जनसंख्या के इतने बड़े भाग को बेड़ियों में रखना अथवा उन्हें अक्षम बना देना, बुर्जुआ शब्दों में भी न तो आर्थिक दृष्टि से संभव है और न व्यावहारिक है।&lt;br /&gt;न्यायिक सुधार की गति धीमी-बहुत धीमी रही है। पर, 1980 क ा दशक इसलिये याद किया जाएगा कि एक व्यक्ति ने किस प्रकार लोक स्वातंत्र्य और मानवाधिकारों के संघर्ष में योगदान किया। हम सबको इस व्यक्ति अर्थात् उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कृष्ण अय्यर की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने अपनी सेवा निवृत्ति के बाद भी दोगुने उत्साह से इस कार्य को आगे बढ़ाया। उनके निर्णय खराब मिसालों के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के साथ ही उपनिवेशवादी जेल नियमों और अवज्ञाकारी निचली अदालतों पर लगाम कसने की कोशिशें हों, भले ही निचली अदालतों ने उन्हें न माना हो और बदले में जेल प्रशासन या पुलिस के प्रति ही जी-हजूरी करने को तैयार रही हो। बहरहाल, सत्तर और अस्सी के दशक के प्रारंभ में उन्होंने भारतीय जेल विधि शास्त्र का रूपान्तरण कर दिया और उनसे प्रेरित कुछ अन्य न्यायाधीशों ने भी इस परिवर्तन में योगदान दिया। अस्सी के दशक के मध्य में अपनी सेवा निवृत्ति के समय तक, एक दशक तक न्यायमूर्ति अय्यर ने देश में न्यायिक परिवर्तनों का नेतृत्व किया। लेकिन अपनी सेवा निवृत्ति के बाद अधिकार शून्य स्थिति में वह इस बात को लेकर दुखी थे कि उनके निर्णयों का 'वर्दीधारी अपराधियों' द्वारा उल्लंघन किया जा रहा है। समय बीतने के साथ लोग सभी कुछ तो भूल जाते हैं और भारत में भी पुराने ढर्रे पर काम होने लगा।&lt;br /&gt;यह ज्वार उतर रहा था कि इसी दौरान हुसैनारा खातून और मोतीराय के मामले में उच्चतम न्यायालय ने गरीबी से पीड़ित अभियुक्त की जमानत की राशि बहुत अधिक निश्चित करने के विरुध्द राय दी और सिफारिश की कि ऐसे लोगों को बिना जमानत के निजी मुचलके पर छोड़ दिया जाए। आज मुकदमा पूरा होने तक लाखों लोगों को जेल में रहना पड़ता है क्योंकि या तो वे अनपढ़ होने के कारण जमानत की अर्जी नहीं दे सकते या गरीबी के कारण जमानत नहीं दे सकते। होसकोट केस के बावजूद कानूनी सहायता का काम केवल कागज पर हो रहा है, इस मद का अधिकांश पैसा कानूनी सहायता में नहीं बल्कि समितियों, रिपोर्टों और विचार-गोष्ठियों में खर्च किया जा रहा है। इसी तरह शीला बरसे के केस से पता चलता है कि जनहित के मामलों में लोगों की रुचि कम हो रही है। कैदियों से भेंट करने के प्रेस के अधिकार की भाषा इतनी अस्पष्ट रखी गई है जिससे कि प्रेस के अधिकार व्यवहार में समाप्त हो जाते हैं। खान के मामले के बावजूद कैदियों को अक्सर समाचारपत्र और किताबें नहीं दी जातीं। वालकॉट मामले के बावजूद कैदियों को मनमाने ढंग से सजा दी जाती है। मलिक के मामले के बावजूद बड़ों के साथ बच्चों को भी कठोर, निर्दयी बनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाल वर्ष के दौरान विचार गोष्ठियां आयोजित की गयी और फिल्में बनाई गईं लेकिन किसी बच्चे को जेल से नहीं छोड़ा गया। बत्रा और कौशिक के मामलों में की गई सभी सिफारिशों की उपेक्षा की जाती है। जेलों में कैदियों की संख्या में बहुत वृध्दि हो गई है। मुलाकातियों का बोर्ड एक भद्दा मजाक है। जेल मैनुअल (नियमावली) और अन्य नियमों को एक दम गुप्त रखा जाता है और यहां तक की बचाव पक्ष तक के वकीलों को उन्हें पाने में कठिनाई होती है। अगर परिवार के सदस्य किसी कैदी से सुविधाजनक तरीके से भेंट करना चाहते हैं तो उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। कृष्ण अय्यर ने पुलिस के विरुध्द शिकायतें सुनने के लिए लोकपाल जैसी व्यवस्था की जो बात की थी वह अब असंभव है। कैदियों के उपचार के लिए जो न्यूनतम मानक नियम बनाए गए थे उनका अनुसरण नहीं किया जाता बल्कि उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 235(2), 248(2) के अंतर्गत सजा देते समय दया का परिचय देने का निर्देश है उनकी गियासुद्दीन और संता सिंह के मामलों के बावजूद अनदेखी की जाती है। वर्गीज मामले के बावजूद गरीबी से पीड़ित, कर्जदारों को जेल भेजा जाता है। जेल सुधार, मजदूरी में वृध्दि मामले के बावजूद कैदियों से गुलामों की तरह काम लिया जाता है या उन्हें मनमाना या मिथ्या आभास देने वाली मजदूरी दी जाती है। अगर, जैसा कि नंदिनी सत्पथी के मामले में हुआ, पुलिस के तरीके, ढंग और आचार-विचार सरकार की वास्तविक सुरुचि शिष्टता के माप हैं, हमारा शासन निरंकुश है। मधुकर जम्भाले के मामले में दिए गए निर्देशों के विपरीत पत्र व्यवहार को सेंसर किया जाता है और सुनील बत्रा मामले के निर्देशों के विरुध्द कालकोठरी की सजा की जाती है। और अभियुक्तों को जानवरों की तरह एक साथ बांध दिया जाता है और शुक्ला के मामले में आदेशों की उपेक्षा करते हुए उन्हें सड़कों पर घुमाते हुए अदालत में पेश किया जाता है। वह 'छोटा हिटलर' जो बत्रा मामले में तिहाड़ जेल के आसपास घूमते हुए देखा जाता था, अब बड़ा हो गया है। शाह और डोंगरे के मामले के बावजूद मुआवजा कभी नहीं दिया जाता। वीणा सेठी के मामले के आदेशों के बावजूद मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के साथ दर्ुव्यवहार किया जाता है और उन्हें पागल बना दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने जेल प्रशासन और पुलिस पर जो 'आशा और विश्वास' प्रकट किया था वह अब मजाक बन गया है। बर्से के मामले के बावजूद महिलाओं के अधिकार लागू नहीं किए जाते। नवचंद्र के मामले के बावजूद बिना सोचे-विचारे हवालात भेज दिया जाता है। भारत में कुछ नहीं बदलता-कभी भी। जैसे-जैसे हम बूढ़े हो रहे हैं, न्यायाधीशों और वकीलों की स्मृति में कृष्ण अय्यर का जोश विलीन होता जा रहा है। उसका स्थान एक नये संकीर्णवाद ने ले लिया है। एक बार फिर न्यायिक उदासीनता और बेपरवाही ने कैदियों के दुखों को बढ़ा दिया है।&lt;br /&gt;इसलिए उनके निर्णयों का महत्व सैध्दांतिक है, संभवत: निर्णयों का एकमात्र गुण जैसा कि न्यायमूर्ति ह्यूज ने एक बार कहा था, 'वे कानून की विचार अथवा चिंतन करने वाली भावना और भविष्य की बौध्दिकता के लिए एक अपील है। वे कुछ समान प्रवृत्तियां और विशेषताएं प्रदर्शित करते हैं। पहली बात यह है, मानव अधिकारों के संबंध में न्यायिक मानक सर्वत्र समान रूप से शोचनीय हैं, और दूसरी बात यह है भारत में न्यायाधीश सभी जगह बड़े अपराधों की पक्की गवाही के बावजूद जेल अधिकारियों और पुलिस कर्मियों को दंड देने के लिए तैयार नहीं होते हैं।&lt;br /&gt;न्यायिक अनिच्छा, प्रशासिक कठोरता और राज्य द्वारा सफेदपोश अपराधों के घटित होने की बात स्वीकार न करने के कारण भारत तेजी के साथ उस संकट की ओर बढ़ रहा है, जहां श्रमजीवी अपने को अलग-थलग एवं निर्दय बनता पाते हैं और न्याय व्यवस्था लोगों की नजर में, जैसे कि यह मुख्यत: है-एक वर्ग विशेष का हथियार बन जाती है, जो हमेशा से अन्याय करता है।&lt;br /&gt;वीणा सेठी के मामले में न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर द्वारा कही गई कथा सच हो सकती है, ''एक दिन अधिकतर लोगों की चीखें और निराशा हमारे समाज की नींव को हिला देंगी और संपूर्ण लोकतांत्रिक ढांचे को खतरे में डाल देंगी। जब ऐसा होगा तो उसके लिए दोषी केवल हम होंगे।                                                  _कॉलिन गोन्साल्विस&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/46848728515505981-7904899042643573385?l=h-rights-pnn.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/feeds/7904899042643573385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=46848728515505981&amp;postID=7904899042643573385' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/7904899042643573385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/46848728515505981/posts/default/7904899042643573385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://h-rights-pnn.blogspot.com/2007/10/blog-post_2075.html' title='जेलों की बदहाली'/><author><name>pnn hindi</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08792323784334722710</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-46848728515505981.post-2248366194786171934</id><published>2007-10-08T07:20:00.000-07:00</published><updated>2007-10-08T07:28:13.708-07:00</updated><title type='text'>फौजदारी कानून व्यवस्था में भारी गिरावट</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;&lt;strong&gt;अपराधों की रोकथाम की दिशा में पुलिस के क्रिया-कलाप कानून को पंगु बना रहे हैं और वह हालात का इस्तेमाल अपने पक्ष में करने में सफल रही है। इस तरह फौजदारी न्याय व्यवस्था प्रभावित हो रही है। पुलिस ज्यादा से ज्यादा लोगों को सजा दिलाने पर आमादा है। वह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित उस परंपरा को भी नकार रही है जिसके अनुसार आरोपित व्यक्ति को खुद को निर्दोष सिद्ध करने का पूरा मौका मिलता है। आरोपित व्यक्ति को कानूनी संरक्षण दिए जाने की व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो गई है क्योंकि बड़ी अदालतों के कई फैसले न सिर्फ आरोपित के अधिकारों के बारे में अतीत की अपनी ही व्यवस्थाओं को नजरअंदाज कर देते हैं बल्कि संविधान के उन प्रावधानों को भी नकार देते हैं जो व्यक्ति के जीवन और उसकी स्वतंत्रता के संरक्षण की गारंटी देते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता धैर्यशील पाटील उन मामलों को बतौर उदाहरण पेश करते हैं जिनमें उच्चतम स्तर पर न्यायपालिका अपनी ही पहले की व्यवस्थाओं के खिलाफ चली जाती है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;समझा जाता है कि अभियुक्त के संरक्षण से संबंधित अपराध कानूनों को नष्ट करने की प्रक्रिया 15 वर्ष पहले शुरू हुई। यह शुरुआत न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर इस अवधारणा के साथ हुई कि संरक्षण संबंधी कानून बहुत व्यापक हैं और इन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसका प्रचार बड़े पैमाने पर सुनियोजित अभियान के जरिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने राष्ट्रीय टेलीविजन के माध्यम से किया। न्यायपालिका पर कुछ ज्यादा ही मानवाधिकार संबंधी दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगाया गया। देश भर में टेलीविजन पर पुलिस अधिकारियों का आना अचानक नहीं हुआ था बल्कि यह अपराध कानून व्यवस्था को नष्ट करने की आपराधिक साजिश का एक हिस्सा था जिसे उच्च स्तर पर न्यायपालिका के विश्वास डिगा कर अंजाम दिया जा रहा था। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुलिसकर्मियों ने कुछ प्रमुख मामलों के संदर्भ में जनता को यह समझाया कि उन लोगों ने तो दुर्दांत अपराधियों और आतंकवादियों को पकड़ लिया था पर अदालतें उन्हें जमानत पर छोड़ रही हैं अथवा बरी कर रही हैं क्योंकि वह अपने को साफ-सुथरा दिखाना चाहती है और ऐसे मामलों के पीड़ितों की उपेक्षा कर रही है।&lt;br /&gt;पुलिस ने टेलीविजन कार्यक्रमों में गलत आंकड़े पेश करके यह जताने की भी कोशिश की कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के मामलों में सजा दिए जाने की दर बहुत कम है। बताया यह गया कि सजा सुनाने की दर मात्र दस प्रतिशत है। यह भी कहा गया कि टाडा मामलों में सिर्फ पांच प्रतिशत सजा सुनाई गई है। पर वे यह भूल गए कि टाडा के अभियुक्तों को पांच-पांच साल तक मुकदमा शुरू होने से पहले जेल में बंद रखा जाता है। इसलिए अगर वे अंतत: छोड़ भी दिए जाते हैं तो कम से कम पांच साल की कैद तो काट ही चुके होते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;स्वभावत: न्यायाधीश लोग यह बताने के लिए प्राइम टाइम में टेलीविजन पर नहीं आ सकते कि जांच कार्य के घटिया स्तर और जांच प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के कारण ही अधिकतर अपराधी छूट जाते हैं। न्यायाधीशों को जाहिर तौर पर सजा सुनाने की कम दर पर शर्मिंदा होना पड़ता है। ऐसे में उनके दिमाग में न्याय करना नहीं बल्कि यही रहता है कि जनता क्या सोचेगी। एक समय न्यायपालिका ने यह तय किया कि चाहे जो हो सजा देने की दर बढ़ानी है। दस वर्ष से हम लोग इसी तरह अभियुक्तों को संरक्षण के लिए बने कानूनों को नष्ट करने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। तब अगर न्याय व्यवस्था अपराध दंड संहिता नहीं भी रहे तो क्या फर्क पड़ता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि जिन लोगों को अपराधी मान लिया जाता है, उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जाना चाहिए, उन्हें जमानत नहीं दी जानी चाहिए, कड़ी से कड़ी सजा, यहां तक कि मौत की भी सजा दे देनी चाहिए। अब यह नया लक्ष्य निर्धारित हो रहा है कि आपराधिक मामलों के संदर्भ में न्यायपालिका के बारे में जनता के दृष्टिकोण को बदलना है और यह सिद्ध कर देना है कि अभियुक्तों के प्रति अदालतों का रवैया सख्त है। इस बात पर कभी विचार नहीं किया गया कि यह लक्ष्य संविधान के अनुरूप और अभियुक्त के अधिकारों की सुरक्षा करते हुए भी हासिल किया जा सकता है। न्यायपालिका के प्रति आम आदमी की जो धारणा बनी है उसे बदलने की हड़बड़ी में मामला दर मामला अभियुक्त को संवैधानिक कानूनी संरक्षण देने की बात की अनदेखी की गई। किसी ने इस बात की जांच करने की जहमत नहीं उठाई कि ऐसी धारणा आम आदमी की है या उच्च मध्य वर्ग की। किसी भी मामले में गरीबों की विशाल आबादी अपराध न्याय व्यवस्था को उत्पीड़न का तंत्र मानती है, जहां बड़े पैमाने पर यातना दी जाती है और गरीबों को दंडित किया जाता है जबकि अमीर बच निकलते हैं। अंतत: उच्च मध्य वर्गीय धारणा मंजूर कर ली जाती है तथा मीडिया के अनुसार व्यवस्था निर्देशित होने लगती है न कि संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने की इच्छा के अनुसार। अक्सर संविधान की रक्षा करना बदनामी का सबब बन जाता है। खासतौर पर तब, जब गरीबों और मजदूर वर्ग से संबंधित मामला हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#660000;"&gt;फौजदारी कानून को कम आंकना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फौजदारी कानून को कम करके आंकने की प्रक्रिया विभिन्न तरह से शुरू हुई। सबसे पहले नजीरों के अनुसार चलने तथा असहमति के बावजूद छोटी न्यायपीठों द्वारा बड़ी न्यायपीठों का अनुसरण करने के सिद्धांत को तिलांजलि दी गई। बड़ी न्यायपीठों के फैसलों, यहां तक कि संविधान पीठ के फैसलों की उपेक्षा इस आधार पर की जाने लगी कि यह दृष्टिकोण तकनीकी है या बड़ी पीठ की व्यवस्था  बौद्धिक तर्क पर आधारित थी या महज सतर्क करने की थी। पर, फौजदारी कानून मूलत: तकनीकी नियमों और प्रक्रियाओं का सेट होता है जो न्यायाधीश के विवेकशील और सतर्क होने की मांग करता है साथ ही ऐसी दिशा तय कर सके जिससे न्यायाधीश यह तय कर पाता है कि संदेह की गुंजाइश कहां है। अगर एक बार इन तकनीकी नियमों की उपेक्षा की जाती है और न्यायाधीश विवेकहीन तथा उताबला हो जाता है तो ''संदेह'' का मानक हवा में उड़ जाता है।  फिर, न्यायाधीश मनमाना फैसला लेने लग सकता है और जो भी सही समझता है या महसूस करता है उसके आधार पर सजा देने या बरी करने का काम करने लगता है। जब ऐसा होने लगता है तो कानून के शासन की कोई अहमियत नहीं रह जाती। हम लोग सचमुच खतरनाक रास्ते पर चल पड़े हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;समन्वित पीठों और उच्चतम न्यायालय की बड़ी पीठों के दशकों से चले आ रहे उदाहरणों की भी तब उपेक्षा की जाती है जब कोई समन्वित पीठ या छोटी पीठ बगैर बड़ी पीठ को फैसले के लिए कोई मुद्दा सौंपे उच्चतम न्यायालय के मान्य पूर्व उदाहरण की अवहेलना करती है। फिर ऐसे फैसले का अनुकरण आगे के कई मामलों में किया जाने लगता है। मामला दर मामला इसका उल्लेख करते रहने के बाद पहले नजीरें निरर्थक हो जाती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;ऐसा इसलिए नहीं कहा जा रहा है कि सुधार अनावश्यक है। निश्चित रूप से सुधार जरूरी है। पर, इसके लिए कुछ हद तक पारदर्शिता, सलाह-मशविरा और धैर्य की जरूरत है। सिर्फ कुछ लोग कई दशकों से चले आ रहे कानून और प्रक्रियाओं को छोड़ देने का फैसला नहीं कर सकते तथा मनमाने तरीके और तदर्थ रूप से इसमें परिवर्तन नहीं ला सकते। ऐसे सुधार की भी अनुमति नहीं दी जा सकती जिनके प्रभाव से अपराध कानून संहिता की ही उपेक्षा हो।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;फौजदारी न्याय व्यवस्था में सुधार का अर्थ मानकों को बिगाड़ना और पेशे की गरिमा घटाना नही है। इसका अर्थ पुलिस और सरकारी वकीलों को और सक्षम बनाना है ताकि वे उच्चतम न्यायालय के फैसलों के जरिए निर्धारित उच्च मानकों के अनुरूप काम कर सकें। दु:ख की बात है कि हम विपरीत दिशा में जा रहे हैं। यह मान लिया गया है कि पुलिस और सरकारी वकील तो अयोग्य और भ्रष्ट होते ही हैं। इसके साथ ही न्याय व्यवस्था में गति लाने और फैसले की दर बढ़ाने की बात भी की जाती है, भले ही जांच का स्तर दयनीय स्तर पर बना रहे। ऐसे में न्यायपालिका ने पुलिस की जांच का स्तर बढ़ाने का अच्छा मौका गवां दिया है और उल्टे वह फौजदारी कानून संहिता के उच्च स्तर को पुलिस के स्तर तक नीचे उतार लाई है। इससे न सिर्फ अभियुक्त बल्कि व्यापक स्तर पर जनता का भी नुकसान हो रहा है। लोगों को मनमानी गिरफ्तारी, मुकदमें में फंसने और अपराधी घोषित किए जाने के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा पुलिस के इसी तरह काम करते रहने का संदेश भी जाता है। ऐसे में पुलिस बल में जांच को पेशेवर तरीके से करने की जो सीमित इच्छाशक्ति रहती है वह भी खत्म हो जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;मलिमथ रिपोर्ट ने इसके बावजूद अपराध न्याय सुधार की ऐसी ही सिफारिश की है। इसकी बड़े पैमाने पर आलोचना हुई है। फौजदारी कानून के मानकों में परिवर्तन के लिए अपराध दंड प्रक्रिया और भारतीय दंड संहिता में व्यापक संशोधन करने की जरूरत है। कार्यपालिका ऐसे परिवर्तन के पक्ष में नहीं है लेकिन कानूनी व्यवस्था बेहिसाब परिवर्तन करती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पुलिसकर्मी बतौर पंच&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जी श्रीनिवास गौड़ बनाम आंध्र प्रदेश सरकार 2005(8) एससीसी-183 मामले में उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीशों की पीठ ने यह व्यवस्था दी कि किसी पुलिसकर्मी को बतौर पंच गवाही देने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#996633;"&gt;घटनास्थल पर सील नहीं किया गया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;महाराष्ट्र सरकार बनाम बीसी रागिनी 2001(9) एससीसी-1 मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि सिर्फ इसलिए ''राई का पहाड़'' बनाना गैरजरूरी है कि बरामद हथियारों को घटनास्थल पर सील नहीं किया गया और उन्हें प्रेस कांफ्रेंस में -- दिखाया गया। हमारी यह राय है कि निचली अदालत ने हथियारों की बरामदगी के मामले में तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया और इस गलत निष्कर्ष पर पहुंची कि बरामदगी के संबंध में साक्ष्य को अलग-थलग करके रखना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;करतार सिंह बनाम पंजाब सरकार 1994(3) एससीसी-569 मामले में संविधान पीठ के फैसले का उच्चतम न्यायालय की छोटी पीठों ने बाद में अनुकरण नहीं किया।&lt;br /&gt;करतार सिंह के मामले में उच्चतम न्यायालय एक संवैधानिक अदालत के रूप में अपने कर्तव्य के निर्वहन का काम छोड़कर कार्यपालिका के मुद्दों पर अधिक ध्यान देने लगा जिन्हें बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था।  एक ओर जहां कार्यपालिका की चिंता आतंकवाद के मुद्दे से ही संबंधित होती है न कि आतंकवादी कानून और आरोपित व्यक्ति के मानवाधिकारों के बीच संतुलन बैठाने से संबंधित, वहीं दूसरी ओर उच्चतम न्यायालय की चिंता मुख्य रूप से यह संतुलन बैठाने की होती है।  फैसले का पैरा 21 से लेकर 23 तक और उससे आगे के पैरे ऐसी अस्पष्ट भाषा में लिखे गए हैं जो किसी राजनेता के अनुरूप हैं न कि न्यायाधीश के।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;फैसले के पैरा 83 में अदालत कहती है कि टाडा के प्रावधान, जिनमें विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान भी शामिल है, इस कानून के अंतर्गत त्वरित सुनवाई की अवधारणा ही व्यक्त करते हैं। इसके बाद 85वें पैरा में अदालत स्वीकार करती है कि वास्तव में अदालतों के समक्ष बेवजह विलंब के कारण अनेक मामलों को खारिज करने की मांग आ रही है।&lt;br /&gt;टाडा की धारा 15 का उल्लेख करते हुए, जिसमें पुलिस अधिकारियों के समक्ष कुछ इकबालिया बयानों क ो साक्ष्य के रूप में मंजूर किया गया है, उच्चतम न्यायालय ने पैरा 254 में कहा है उच्च पुलिस अधिकारियों को इकबालिया बयान दर्ज करने का अधिकार दिए जाने की कानूनी स्थिति को देखते हुए, जो अधिकार 2005 तक न्यायिक अधिकारी को ही प्राप्त था, हमारा कहना है कि इस मामले में प्रक्रिया और स्वीकृत तौर-तरीकों की कोई अवहेलना नहीं होनी चाहिए और सच्चा तथा स्वप्रेरित बचाव ही दर्ज होना चाहिए... (पृ. 680)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अदालत का कहना है वकील और न्यायाधीश के तौर पर वर्षों के अनुभव के बाद हम यह कहने से नहीं चूक सकते कि हम लोगों ने अक्सर पुलिस अधिकारियों द्वारा अति उत्साह में उत्पीड़न और क्रूरता के मामलों को देखा है जो अमानवीय, बर्बर, अप्रचलित और कठोर होते हैं। ऐसा वे उनसे किसी भी तरह अपने पक्ष में गवाही दिलाने के लिए करते हैं। हम दुख के साथ कहना चाहते हैं कि हमारी नजर में पूछताछ के दौरान हिरासत में हुई मौतों के भी मामले लाए गए हैं। हम लोग कुछ पुलिस अधिकारियों द्वारा किए गए अत्यधिक नीचतापूर्ण घृणित व्यवहार और दमनकारी रवैए से अत्यंत दुखी और चिंतित हैं।  (पृ. 679)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;''यह अत्यंत दुखद है कि हर दिन पुलिस के अत्याचार और क्रूरता की खून जमा देने वाली घटनाओं की खबरें आती हैं जो मानवीय कानून और सार्वजनिक मानवाधिकारों की अवहेलना करने वाली तथा संविधान की गारंटी और मानवीय गरिमा को पूरी तरह नकारने वाली होती है।'' (पृ. 711)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज भी भारत में यही स्थिति है कि यातना पुलिस की जांच का प्रमुख उपकरण है और उसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। ऐसे में पुलिस अधिकारी के समक्ष दिए गए इकबालिया बयान को ब्रिटिश काल से लेकर टाडा काल तक मंजूर नहीं किया जाना स्वाभाविक ही है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष कैसा साक्ष्य था कि उसने यह निष्कर्ष निकाला कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान वैध होगा क्योंकि वे लोग यातना देने के पक्ष में उतने नहीं होंगे?  उच्चतम न्यायालय का निष्कर्ष है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान तभी माना जाएगा जब पिछले सौ साल से फौजदारी मामलों को निपटाने में चल रहे तरीकों के अनुरूप कोई साक्ष्य नहीं हो। उच्चतम न्यायालय के पास इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं था कि पुलिस यातना में किसी तरह की कमी आई है। वास्तव में उच्चतम न्यायालय के फैसले पर ध्यान दिया जाए तो पता चलेगा स्थिति इसके उलट है अर्थात अपराध की जांच के दौरान पुलिस यातना की घटनाएं बढ़ी हैं जैसा कि हिरासत में हुई हिंसा की घटनाओं से पता चलता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय का यह भी कहना है कि पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान सह अभियुक्त के खिलाफ भी माना जा सकता है। संदर्भ सुखमंत सिंह बनाम सरकार-2003 आल एमआर (सीआर) 2365  आतंकवादी विध्वंसकारी गतिविधि (निरोधक) नियम, 1987 के नियम 15 में यह बताया गया है कि कैसे इकबालिया बयान लिया जाएगा और दर्ज किया जाएगा। इस नियम में खास तौर पर कहा गया है कि सम्बद्ध पुलिस अधिकारी को इस आशय का प्रमाण पत्र देना पड़ेगा कि बयान उसकी उपस्थिति में लिया गया है और जो कुछ दर्ज है वह सत्य और सम्पूर्ण है तथा बयान बिना किसी दबाव के अपने आप दिया गया है। इकबालिया बयान के संबंध में कानूनों और नियमों का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है वह शिद्दत से यह महसूस करता है कि सुरक्षा के कुछ ऐसे कड़े नियम होने चाहिए जिनका पालन इकबालिया बयान दर्ज करते समय कड़ाई से किया जा सके। &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;अब हम निम्लिखित मामलों में यह दिखाएंगे कि उच्चतम न्यायालय की छोटी पीठों ने किस तरह संविधान पीठ के निर्देशों की अवमानना की और यह व्यवस्था दी कि सुरक्षा नियम और दिशा-निर्देश निर्देशक होते हैं, अनिवार्य नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;करतार सिंह के मामले में संविधान पीठ के बाध्यकारी फैसले के बावजूद जमील अहमद बनाम राजस्थान सरकार-2003(9) एससीसी 675 के मामले में उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों क ी एक पीठ ने संविधान पीठ की उपरोक्त व्यवस्था का कोई उल्लेख किए बगैर यह व्यवस्था दी: ''नियम 15(5) में सीएमएम या सीजेएम की ऐसी कोई भूमिका निर्धारित नहीं है कि वह उक्त बयान के लिए पहल करे या इन बयानों पर विचार करे। यह महज उल्लिखित अदालतों को डाकघर में बदल देता है ताकि संबद्ध विशेष अदालतों में उन्हें भेजा जा सके। इस नियम का उद्देश्य यह है कि इस कानून की धारा 15 के तहत जो बयान दर्ज कराए गए हैं वे दर्ज कराने वाले के अधिकार क्षेत्र से यथाशीघ्र निकल कर अधिक सुरक्षित प्रमाण की हैसियत हासिल कर सकें। हमारी राय है कि दर्ज इकबालिया बयान को उक्त कानून की धारा 15 के तहत सीएमएम या सीजेएम के पास भेजे जाने की व्यवस्था महज निर्देशक है अनिवार्य नहीं।'' (पृ. 688)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर करतार सिंह के मामले को देखें। उस समय उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को नहीं माना था कि टाडा की धारा 15 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट को इकबालिया बयान दर्ज करने का अधिकार दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें न्यायिक गरिमा और स्वतंत्रता हासिल नहीं होती।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;न्यायमूर्ति के रामस्वामी ने इस पर असाधारण प्रतिरोध दर्ज किया। साक्ष्य कानून की धारा 25 का उल्लेख करते हुए, जिसमें पुलिस के समक्ष दर्ज इकबालिया बयान को मान्यता नहीं है, उन्होंने कहा कि यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष दर्ज बयान पर विश्वास करना खतरनाक है क्योंकि यह दबाव डाल कर भी लिया गया हो सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;न्यायमूर्ति रामस्वामी का कहना था: ''संहिता और साक्ष्य कानून हालांकि अभियुक्त से इकबालिया बयान लेने में पुलिस अधिकारी पर संदेह करने की प्रवृत्ति से बचने की सलाह देता है तो क्या यही संदेह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पर नहीं होगा? क्या इस तरह की प्रक्रिया किसी सचेत आदमी की चेतना पर आघात नहीं पहुंचाती और कुछ गलत होने का संदेह नहीं पैदा करती? क्या यह न्यायपूर्ण और उचित होगा कि वही काम धारा 15(1) के तहत सौंप दिया जाए? क्या केवल इस धारा को लागू करने मात्र से बुराइयां दूर हो जाएंगी और यह अनुच्छेद 14 और 21 के तहत वैध हो जाएगी? मेरा जबाव है 'नहीं', बिल्कुल नहीं।  मानवाधिकार की जो संवैधानिक अवधारणा है, साक्ष्य कानून में इसके लिए शामिल प्रावधानों को लागू करने का जो इतिहास है और संहिता की धारा 164 में जो तर्क निहित है वह धारा 15 की उपधारा-1 में निहित अवैधता को दर्शाता है और अदालत इसकी ओर से आंखें नहीं मूंद सकती तथा साक्ष्य कानून की धारा 114द्बद्बद्ब (ई) पर निर्भर करती है कि सरकारी कानून विधिनुसार होने चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि यह कानून धारा 15 की उपधारा (1) स्वच्छ प्रक्रिया की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और यह संवैधानिक रूप से वैध नहीं है।'' (पृ. 731)... पुलिस को न्यायिक अधिकार देने में जनता का विश्वास न्यायिक प्रशासन से उठने लगेगा। यह न सिर्फ न्याय की धारा को उसके मूल स्रोत में ही गंदा कर देगा बल्कि आम जनता के विश्वास को भी प्रभावित करेगा तथा कानून के शासन को भी कमजोर बनाएगा। (732)&lt;br /&gt;इस बहस के जवाब में कि वरिष्ठ अधिकारी को इकबालिया बयान दर्ज करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है, उन्होंने कहा : ''फिर, यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कम से कम पुलिस अधीक्षक के स्तर के अधिकारी से, जो जिला पुलिस प्रशासन का प्रमुख होता है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिये जिम्मेदार होता है, उम्मीद की जाती है कि वह अपराध समाप्त करने के लिए अपराधियों के मन में भय पैदा करने के उद्देश्य से कड़े से कड़े कदम उठाएगा। यह अधिकारियों के पद क्रम से जुड़ा मसला नहीं है बल्कि विभाग से संबंधित है। आरोपित तथा जांचकर्ता के मन से संदेह दूर करने के लिए इकबालिया बयान दर्ज करने से पूर्व निर्धारित सुरक्षात्मक प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए और इसमें कोई दाग नहीं लगना चाहिए। इसलिए धारा 15(1) के तहत पुलिस अधिकारी को बयान दर्ज करने का अधिकार देना ठीक नहीं है। अगर उसे बयान दर्ज करने का पवित्र अधिकार दिया जाता है तो वैधानिक कर्तव्य के निर्वहन का उद्देश्य जाहिर तौर पर वैसे ही संदिग्ध नजर आएगा और जनता में विश्वास की भावना पैदा नहीं कर पाएगा।  अगर एक बार भी इस अधिकार का उपयोग करने दिया गया, कम संकट के समय में न्यायिक अधिकार दे कर भी और गंभीर संकट के समय सामान्य तौर पर तो कानून का शासन और न्यायिक समीक्षा की यातना भी शामिल हो जाएगी तथा यह संविधान के अनुच्छेद 50 और संवैधानिक सत्ता को स्पष्ट रूप से नकारना होगा। ''&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;न्यायमूर्ति सहाय ने भी यह कहते हुए विरोध किया: ''बंदूक और बमों से लोकतंत्र की हत्या करने की अनुमति सरकार को नहीं दी जा सकती पर ऐसा करते हुए सरकार को यह देखना होगा कि वह ऐसे तरीके न अपनाए कि वे उसके ही खिलाफ चले जाएं। आतंकवादी और मासूम आदमी के बीच फर्क करना ही होगा। अगर सरकार दमन का अंधाधुंध उपाय करती है जिससे अपराधी और मासूम का फ र्क नहीं रहता तो यह मानवता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के उदार मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ होगा। --सरकार के उपाय सरकार में विश्वास और निष्ठा पैदा करने वाले होने चाहिए तथा लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का इस तरह निर्वाह किया जाना चाहिए कि सरकार की हर कार्रवाई कानून की कसौटी पर खरी उतरे।'' (पृ. 753)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;''एक पुलिस अधिकारी कोई भी तौर तरीका अपना कर परिणाम हासिल करने के लिए प्रशिक्षित होता है, जब तक लक्ष्य हासिल हो रहा हो तौर-तरीका माना जाता है और यह सोच अधिकारियों के किसी पदक्रम से नहीं बदल सकती। पुलिस का एक उपनिरीक्षक किसी पुलिस अधीक्षक या अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की तुलना में अपने दृष्टिकोण में रूढ़ और व्यवहार में अक्खड़ हो सकता है पर दोनों की मूल सोच एक ही प्रकार की होती है। पुलिस निरीक्षक की भी आरोपित से इकबालिया बयान हासिल करके परिणाम प्राप्त करने में उतनी ही दिलचस्पी होगी जितनी पुलिस अधीक्षक की। अपने प्रशिक्षण और दृष्टिकोण में वे अलग होते हैं। पर, प्रक्रियागत निष्पक्षता का उनके लिए कोई अर्थ नहीं होता। यह दुर्भाग्यपूर्ण लग सकता है कि पुलिस बल जिसकी स्थापना गुलामी के दौर में कड़े और क्रूर कानूनों के तहत की गई थी, वह जनता का शासन आने के बाद भी बदली नहीं है और स्वतंत्रता के बाद भी इतनी ही निर्मम और निर्दयी है। व्यक्ति की गरिमा और उसकी स्वतंत्रता, जो संविधान का मूल दर्शन है, अब तक गरीब से गरीब आदमी तक नहीं पहुंच पाई क्योंकि अब तक पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह एक ऐसा केन्द्रीकृत प्रशासनिक उपकरण है जो कानून और समाज के लिए नहीं सिर्फ अधिकारी वर्ग के पक्ष में डंडे के जोर पर बदजुबानी से काम करता है। ऐसी ब्रिटिश पुलिस भी नहीं थी।''&lt;br /&gt;''पुलिस अधिकारी के समक्ष किया गया इकबालिया बयान इंग्लैंड और अमेरिका में भी संदिग्ध माना जाता है। पर इसे उपरोक्त शर्तों के साथ मंजूर कर लिया गया। ऐसा क्यों किया गया? क्योंकि साक्ष्य कानून की धारा 26 के तहत यह व्यवस्था है कि उस वक्त अभियुक्त के वकील या किसी नजदीकी रिश्तेदार का होना जरूरी है।'' (पृष्ठ 762)&lt;br /&gt;''इसके अलावा पुलिस अधिकारी के समक्ष लिया गया इकबालिया बयान ऐसी स्थिति में मंजूर नहीं किया जाता जिसमें किया गया अपराध गैर अधिसूचित क्षेत्र का हो चाहे उसकी प्रकृति जो भी हो। पर, वही पुलिस अधिकारी बेदाग हो जाता है जब अपराध अधिसूचित क्षेत्र का हो। टाडा के अपराध भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून के अंतर्गत आने वाले अपराध से अधिक गंभीर माने जाते हैं।  स्वाभाविक यह है कि जितना गंभीर अपराध हो, उसकी जांच प्रक्रिया उतनी ही कड़ी होनी चाहिए। यह यहां बिल्कुल उलट है। एक हत्या के मामले में धारा 302 के तहत जो बात एक ऐसे व्यक्ति के लिए नामंजूर की जाने लायक है वही ऐसे व्यक्ति के खिलाफ टाडा कानून की धारा पांच में मंजूर कर ली जाती है जो हथियार रखने का या उकसाने मात्र का दोषी हो। बयान हासिल करने के लिए पुलिस जो तरीके अपनाती है, उसकी अदालत अपने कई फैसलों में किस तरह निंदा कर चुकी है यह बताने की जरूरत नहीं है। पर टाडा के लागू होते ही जैसे एक रात में ही सब बदल गया। बयान दर्ज करने का अधिकार पुलिस को देना इंग्लैंड और अमेरिका के तंत्र में हो सकता है पर इसके लिए पुलिस के दृष्टिकोण में भी परिवर्तन की जरूरत है। जैसा कि  पुलिस आयोग का कहना है कि ऐसा करने से पहले पुलिस बल को शिक्षण और प्रशिक्षण के जरिए उसकेर् कत्तव्य और जिम्मेदारियों से अवगत करना होगा। गड़बड़ी कर्मियों में नहीं, संस्कृति में है। ऐसे देश जहां बहुत कम लोग कानून का पालन करते हैं और किसी को कोई जवाब नहीं देता है। वहां सांस्कृतिक वातावरण ऐसे परिवर्तन के अनुकूल नहीं है। यहां तक कि जब संविधान का अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 20(3) और अनुच्छेद 21 नहीं था, तब भी पुलिस के  समक्ष दिया गया कोई बयान मंजूर नहीं था। सौ साल से भी अधिक की यह स्थापित प्रक्रिया है और फौजदारी कानून का अनिवार्य हिस्सा है। इसलिए दूसरे देशों में लागू कानून के आधार पर उचित सिद्ध किए जाने वाले प्रावधानों को शामिल करने से पहले दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना जरूरी है।'' (पृ. 762) -- धारा 15 सभी स्थापित तरीकों को सिर्फ इस आधार पर नकार देती है कि बयान उच्च पुलिस अधिकारी से दर्ज कराए जा सकते हैं। मेरी राय में हमारा सामाजिक वातावरण ऐसे खतरनाक परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है जैसे धारा 15 से आ सकता है। यह संवैधानिक आश्वासन के मूलभूत मूल्यों को नष्ट करने वाला है। (पृ. 763)&lt;br /&gt;टाडा के तहत दर्ज बयान तब भी स्वीकार योग्य होंगे, जब अभियुक्त टाडा के सभी आरोपों से बरी हो जाएगा।&lt;br /&gt;सरकार बनाम नलिनी-जेटी 1999(4) 106 - मामले में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला दिया: ''अगर टाडा के अपराधों से अभियुक्त बरी हो जाता है तब भी उसके इकबालिया बयान मंजूर किए जा सकेंगे।''&lt;br /&gt;यह कानून की स्तब्धकारी व्याख्या है। टाडा के तहत पहली बार पुलिस अधिकारी के समक्ष दिए गए बयान को इसलिए मंजूरी मिली कि आतंकवादी घटनाओं के तहत इसकी अत्यंत आवश्यकता महसूस की गई। अब अगर ये आरोप ही नहीं लगे, तब भी ऐसे सामान्य अपराध कानून के तहत अभियोजन के लिए साक्ष्य के तौर पर ये इकबालिया बयान मंजूर किए जाएंगे जिनमें इन्हें मंजूर नहीं किया जाता। इस तरह सामान्य अपराध कानून में साक्ष्य के तौर पर पुलिस अधिकारी द्वारा लिया गया बयान स्वीकार करने लायक हो गया है हालांकि विधायिका ने मूल संहिता में कोई संशोधन नहीं किया है।&lt;br /&gt;नलिनी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो संदेह व्यक्त किया इसे बिलाल अहमद कालू बनाम आंध्र प्रदेश - जेटी 1997-7 एससी 272 - में खारिज कर दिया गया।  बिलाल मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि पुलिस अधिकारी के समक्ष टाडा में दिया गया बयान साक्ष्य के तौर पर मंजूर किया जा सकता है हालांकि अभियुक्त को टाडा से बरी किया जा चुका है।&lt;br /&gt;नलिनी के मामले में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने फैसले में औचित्य पर इन शब्दों में संदेह व्यक्त किया था: ''जिस तरह से तीन न्यायाधीशों की पीठ ने नलिनी के मामले में इस कानून की व्याख्या की है उसके औचित्य पर हम लोग संदेह व्यक्त करने के लिए मजबूर हैं।''&lt;br /&gt;तो मुद्दा यह उठता है कि टाडा के आरोपों से बरी हो जाने के बाद भी क्या इकबालिया बयान मान्य होंगे, जब यह स्पष्ट हो कि टाडा कानूनों को गलत तरह से लगाया गया और बयान इसके तहत अपना कानूनी महत्व खो चुका है तथा अब इसकी हैसियत पुलिस के समक्ष दिए गये सामान्य बयान की ही रह गई है। नलिनी मामले में इस सवाल का सकारात्मक उत्तर हमें मिल जाता है। इसके बावजूद कई संदेह बने रहते हैं क्योंकि निष्पक्षता के आधार पर ही संपूर्ण न्याय व्यवस्था टिकी होती है। देश के फौजदारी कानून में सक्रिय भूमिका निभाने में ही न्याय व्यवस्था का हित है। न्याय का मानक स्थापित करना ही आज की जरूरत है। एक बार अदालत टाडा को हटाने के फैसले पर पहुंच जाती है तो यह कानून पूरी तरह अवैध हो जाता है या इसके तहत आरोप लगाना पूरी तरह गलत, तो क्या यह उचित होगा कि इसकी धारा-15 को टाडा मामलों की ही तरह प्रभावी तरीके से उन पर लागू किया जाए जो भले ही सामान्य कानून के ही तहत क्यों नहीं पकड़े गए हों। इसलिए उपरोक्त संदेह पैदा होता है।&lt;br /&gt;किंतु प्रकाश कुमार बनाम गुजरात सरकार - जेटी 2005 11 एससी 209 - के मामले में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने नलिनी मामले का तर्क स्वीकार किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बयान दर्ज करना&lt;br /&gt;नजीर अहमद बनाम किंग एम्परर एआईआर 1936 पीसी 253 मामले में प्रिवी कौंसिल ने यह व्यवस्था दी कि धारा 164 के तहत अगर कोई मजिस्ट्रेट बयान दर्ज करता है तो उसे इस धारा और स्थायी आदेशों में निर्दिष्ट तरीके से बयान दर्ज करना पड़ेगा किसी और तरीके से नहीं।  इस मामले में मजिस्ट्रेट ने कानून के निर्देशों के अनुरूप बयान दर्ज नहीं किया था और अभियुक्त को बरी कर दिया गया। इसका अनुसरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम सिंघाड़ा सिंह के मामले में भी किया गया जिसका विवरण एआईआर 1964 एससी 358 में मौजूद है।&lt;br /&gt;हाल में उच्चतम न्यायालय की छोटी पीठों ने नजीर अहमद के मामले में निर्धारित परंपरा की अनदेखी की। उदाहरण के लिए 1998(1) बॉम्बे क्रिमिनल केसेज 631&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयोगवश गवाह&lt;br /&gt;पूरन बनाम पंजाब सरकार - एआईआर 1953 एससी 459 के मामले से लेकर फैसलों के लंबे क्रम में उच्चतम न्यायालय ने ऐसे लोगों की गवाहियों को नामंजूर कर दिया जिन्हें सहज गवाह कहा जाता है, जो कथित तौर पर घटनास्थल पर उपस्थित बताए जाते हैं और कहते हैं कि संयोग से वे घटना के समय वहां मौजूद थे। आश्चर्यजनक रूप से उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार बनाम फरीद खां-2005(9) एससीसी 103 मामले में उल्टा दृष्टिकोण अपनाया, वह भी किसी पूर्व उदाहरण का उल्लेख किए। उच्चतम न्यायालय ने कहा: उच्च न्यायालय ने उसकी गवाही पर दो कारणों से विश्वास नहीं किया - पहला तो इस आधार पर कि वह पहले भी एक फौजदारी मामले में सजायाफ्ता है और उसे चार साल कैद की सजा हुई थी। उच्च न्यायालय के अनुसार उसकी गवाही को नामंजूर करने का यह उचित कारण था।  दूसरा आधार यह था कि वह निश्चय ही संयोगवश का गवाह होगा और उसका वह कहना कि वह सफी की दुकान पर जा रहा था सच नहीं भी हो सकता है क्योंकि उसके घर के पास उस इलाके में और कई बीड़ी बनाने वाले थे। यह सही है कि किसी गवाह की गवाही, जिसकी आपराधिक पृष्ठभूमि हो, को ध्यान से परखने की जरूरत है। पर, अगर ऐसी गवाही अन्य गवाहियों से काफी मेल खाती है तो उसे मान लेना गलत नहीं होगा। (पृ. 106)&lt;br /&gt;पूरन बनाम पंजाब सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों का कहना था: ''इन परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि सत्र न्यायाधीश ने इस गवाही को नामंजूर करके कोई गलती की है और उसे संयोग का गवाह कहा है। ऐसे गवाहों की अचानक घटनास्थल पर प्रकट होने और घटना को देख कर गायब होने की आदत होती है, जिसकी गवाही देने के लिए बाद में उन्हें बुलाया जाता है।'' (460)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून की जांच&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक फैसलों में जांच में कमी के कारण अभियुक्तों को बरी किया, जैसे पीड़ित के रक्त के साथ बरामद वस्तुओं पर पाए गए खून के नमूनों का मेल नहीं दिखा पाना आदि। एक स्तब्धकारी फैसले में, और एक बार फिर पूर्व उदाहरण दिए बगैर उच्चतम न्यायालय ने एक अभियुक्त को दोषी ठहरा दिया हालांकि यह सिद्ध नहीं हो पाया था कि जिस लुंगी पर खून के दाग पाए गए थे, वह अभियुक्त की ही थी। उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त को चुप रहने के उसके अधिकार से उसे वंचित ही नहीं किया बल्कि अत्यंत अपर्याप्त जांच के बावजूद प्रतिकूल निष्कर्ष भी निकाला। न्यायालय का कहना था: ''जैसा कि ऊपर कहा गया है और जैसा देखने को मिला है, पीड़ित को ऐसे घाव लगे जिनसे खून बह रहा था और जांच एजेंसी ने अभियुक्त से लुंगी बरामद की उन पर खून के धब्बे थे। रक्त जांच करने वाले ने यह तो बताया है कि यह आदमी का खून है पर उसका ग्रुप नहीं बता पाया है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, कि अपीलकर्ता के विद्वान वकील का यह कहना है रक्त ग्रुप की इस पहचान के बगैर लुंगी पर पाए गए खून के धब्बे किसी भी परिस्थिति में अभियुक्त को अपराध से नहीं जोड़ सकते।  हम यह नहीं समझते कि यह तर्क स्वीकार किया जा सकता है। अभियुक्त ने स्वीकार किया है कि लुंगियां उसकी हैं और उस से ही बरामद की गई हैं, और इस संदर्भ में वह कहता है उसी ने जांच अधिकारी को लुंगियां दीं पर वह यह नहीं बता सका कि लुंगियों पर वे खून के धब्बे कैसे लगे जो कम से कम आदमी का खून तो सिद्ध हुए ही हैं। इस संबंध में कुछ नहीं बता पाना अभियोजन पक्ष को ही मजबूत करना है कि पीड़ित पर हमले के वक्त ही खून के धब्बे लुंगी पर लगे होंगे।'' (पृ. 188)&lt;br /&gt;कंस बेहरा बनाम उड़ीसा सरकार - 1987, 3, एससीसी 480 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा: ''खून के धब्बों वाली धोती और कमीज बरामद होने के संबंध में जो सीरम वैज्ञानिक की रिपोर्ट के अनुसार आदमी का खून, पर इस रिपोर्ट में खून के ग्रुप के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, इसलिए इसे निश्चित रूप से पीड़ित के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। जांच अधिकारी की गवाही में या रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि खून के धब्बों का आकार क्या है। खून की कुछ बूंदें अगर कपड़ों पर हाें तो वे उसी व्यक्ति की भी हो सकती हैं। साफ तौर पर जब वह गांव का हो और ऐसे कपड़ों में गांव में ही रहता हो। रक्त ग्रुप के बारे में गवाही ही एकमात्र उपाय है जो खून के धब्बों को पीड़ित के साथ जोड़ सकती है। यह साक्ष्य मौजूद नहीं है इस दृष्टि से हमारे मत में ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिसके आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जा सके।'' (पृष्ठ 484)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोबारा पूछताछ&lt;br /&gt;चानन सिंह बनाम हरियाणा राज्य 1971 एससीसी (सीआर) 714 के मामले से लेकर कई फैसलों में यही बात उभर कर आई कि फौजदारी मामलों में गवाहों से दोबारा पूछताछ सिर्फ इसलिए होनी चाहिए कि जिरह के दौरान अगर कोई अस्पष्टता रह गयी हो उसे दूर किया जा सके। उच्चतम न्यायालय ने रम्मी बनाम मध्य प्रदेश सरकार1999(8)एससीसी 649 के मामले में पूर्व उदाहरणों को ध्यान में रखे बगैर यह फैसला दिया :&lt;br /&gt;''यह एक गलत धारणा है कि दोबारा पूछताछ सिर्फ अस्पष्टता दूर करने के लिए ही होनी चाहिए जो कि जिरह के दौरान पैदा हुई हो। निस्संदेह दोबारा पूछताछ करके अस्पष्टता दूर की जा सकती है। पर, दोबारा पूछताछ करने वाले का सिर्फ यही काम नहीं है। वह पक्ष जिसने गवाह को बुलाया है अगर जिरह के दौरान यह महसूस करता है कि किसी दूसरी बात को भी दोबारा पूछताछ में शामिल किया जा सकता है तो उसे स्पष्टीकरण के लिए कोई भी सवाल पूछने की आजादी होगी। सरकारी वकील इसके लिए उसके  सवालों को तय करेगा। जिरह के दौरान अथवा अन्य किसी भी कारण से अस्पष्टता रहने पर स्पष्टीकरण की जरूरत पड़ सकती है। अगर सरकारी वकील यह समझता है कि कुछ जवाबों पर गवाहों  से और पूछताछ की जरूरत है तो उसे इस बात की आजादी और अधिकार है कि वह जरूरी सवाल पूछे बशर्ते वे अन्य प्रावधानों और अदालत के नियंत्रण के तहत हाें पर, अदालत उसे जिरह के दौरान पैदा हुई अस्पष्टता तक ही सीमित रहने का निर्देश नहीं दे सकती।''&lt;br /&gt;अगर सरकारी वकील यह भी महसूस करता है कि गवाह से कोई नई बात निकाली जा सकती है तो वह ऐसा भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में जरूरत सिर्फ इस बात की होगी कि वह अदालत से इसके लिए अनुमति ले। अगर अदालत यह समझती है कि ऐसी नई बात किसी तथ्य की पुष्टि के लिए जरूरी है तो ऐसे सवाल पूछने की अनुमति उसे उदारतापूर्वक दे देनी चाहिए।&lt;br /&gt;सरकारी वकील अगर जिरह के दौरान सतर्क रहे तो उसे यह समझने में दिक्कत नहीं होती कि किस उत्तर पर और स्पष्टीकरण की जरूरत है।  जो सतर्क सरकारी वकील गवाहों के जवाब सुनते ही समझ जाते हैं कि दोबारा पूछताछ में उनसे कौन से सवाल करने हैं। ऐसा भी नहीं है कि दोबारा पूछताछ में एक या दो सवाल ही पूछने होते हैं।  अगर जरूरत हो तो कितने भी सवाल पूछे जा सकते हैं। (पृष्ठ 655)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मरते आदमी का बयान&lt;br /&gt;पापारम्बका रोसम्मा बनाम आंध्र प्रदेश सरकर 1999(7) एससीसी 695 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने बार-बार यह व्यवस्था दी थी कि अगर डाक्टर उपस्थित हों तो मजिस्ट्रेट मरते आदमी का बयान दर्ज कर सकता है, पर यह जरूरी है कि वह डाक्टर प्रमाणित करे कि घायल व्यक्ति दिमागी तौर पर बयान देने की स्थिति में है। पापा रम्बका मामले में उच्चतम न्यायालय का कहना था :&lt;br /&gt;''हमारी राय में इस चिकित्सकीय प्रमाणपत्र के बगैर कि घायल व्यक्ति दिमागी तौर पर बयान देने की स्थिति में है यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि बयान मजिस्ट्रेट की दृष्टि से संतोषजनक है और उसकी नजर में घायल दिमागी तौर पर बयान देने की स्थिति में था।'' (पृ. 402)&lt;br /&gt;इससे पहले मणिराम बनाम मध्य प्रदेश सरकार 1994 (एसयूपीपी)2 एससीसी 539 मामले में उच्चतम न्यायालय ने इसी तरह की व्यवस्था दी : ''...ऐसे मामले में जबकि बयान देने वाला अस्पताल में था, यह बयान दर्ज करने वाले का कर्तव्य है कि वह डॉक्टर की उपस्थिति में बयान दर्ज करे। समुचित रूप से डॉक्टर द्वारा यह प्रमाणित किए जाने पर कि बयान देने वाला होश में और बयान देने की स्थिति में है। ये कुछ महत्वपूर्ण जरूरियात हैं जिनका पालन होना चाहिए।'' (पृ. 540)&lt;br /&gt;पापारम्बका और मणिराम के मामले में तीन-तीन न्यायाधीशों की दोनों पीठों के फैसले से उच्चतम न्यायालय का कोली चुनीलाल सावजी बनाम गुजरात सरकार - 1999(9) एससीसी 562 का फैसला इस प्रकार अलग रहा:&lt;br /&gt;''मणिराम बनाम मध्य प्रदेश सरकार के मामले में निस्संदेह अदालत ने कहा कि जब बयान देने वाला अस्पताल में हो, तो मरते आदमी का बयान दर्ज करने वाले का यहर् कत्तव्य होता है कि वह डॉक्टर की उपस्थिति में ऐसा करे और डॉक्टर के यह प्रमाणित करने के बाद ही बयान दर्ज करे कि वह होश में है, सोचने-समझने की स्थिति में है और बयान देने के लिए पूरी तरह ठीक है। कथित मामले में अदालत ने उपरोक्त स्थिति में मरते आदमी के बयान पर विश्वास करना उचित नहीं समझा और उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप किया लेकिन कथित अनिवार्यताएं महज कानूनी नियम हैं और अंतिम बात यह जानना है कि क्या मरते आदमी का बयान सच और अपनी ओर से दिया गया माना जा सकता है।'' (पृ. 566)&lt;br /&gt;अंतत: उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ गठित की गई, और इसने लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र सरकार - 2002(6) एससीसी 710-मामले में यह व्यवस्था दी कि यह दृष्टिकोण कि मरते आदमी का बयान लेने डॉक्टर का प्रमाण पत्र जरूरी है, ''अत्यधिक व्यापक है तथा कानून के लिए ठीक नहीं है।'' (पृ. 715)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सील करना&lt;br /&gt;अमरजीत सिंह बनाम पंजाब सरकार (तीन न्यायाधीशों की पीठ का फैसला) 1995 (एसयूपीपी)3 एससीसी 217 के मामले तथा कई अन्य में उच्चतम न्यायालय ने बार-बार यह व्यवस्था दी कि सील करने का काम जांच अधिकारी घटनास्थल पर ही करेगा और प्राप्त या बरामद किसी वस्तु को सील नहीं किया जाना गंभीर गड़बड़ी माना जाएगा। अमरजीत सिंह के मामले में उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया :&lt;br /&gt;''घटना स्थल पर ही रिवॉल्वर को सील नहीं किया जाना भारी गड़बड़ी है, लिहाजा हथियार से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।'' (पृ. 218)&lt;br /&gt;इन सारे उदाहरणों की उच्चतम न्यायालय ने 2002 में सीआरएलजे 944 में अनदेखी की। एक बार फिर बिना उस फैसले का उल्लेख किए, दृष्टिकोण को तकनीकी बताकर निचली अदालत की यह कहकर निंदा की कि निराधार वह राई को पहाड़ बना रही है। उच्चतम न्यायालय ने कहा : ''यह कह कर कि सिर्फ बरामद किए गए हथियार ही प्रेस को दिखाए गए, निचली अदालत ने एक गलती की और अनावश्यक निराधार ही राई का पहाड़ बनाने की कोशिश की।''&lt;br /&gt;इसके बाद गणेश लाल बनाम राजस्थान सरकार-2002(1) एससीसी 731 के मामले में कानून पर एक ऐसा ही दृष्टिकोण दर्ज हुआ, ऐसी स्थिति में सिर्फ इसलिए कि जब्ती स्थल पर इन वस्तुओं को सील नहीं किया गया बल्कि पुलिस स्टेशन में सील किया गया, बरामदगी और जब्ती संदेहपूर्ण नहीं हो जाती। (पृ. 736)&lt;br /&gt;इसी तरह राजेन्द्र कुमार बनाम राजस्थान सरकार के मामले में 2004 एससीसी (सीआरआई) 713-अभियुक्त के वकील ने जब कहा कि कथित रूप से जो चूड़ियां बरामद की गईं हैं, उन्हें सील नहीं किया गया है, अदालत ने कहा: ''हम नहीं समझते कि इस बात को बहुत महत्व दिया जा सकता है कि इन चूड़ियों को बरामद करते समय सील नहीं किया गया।'' (पृ. 716)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलाओं की गिरफ्तारी&lt;br /&gt;इस परंपरा से हटते हुए कि महिलाओं को रात में गिरफ्तार नहीं करना चाहिए तथा महिला कांस्टेबल के नहीं रहने पर महिला को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार बनाम क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर कौंसिल आफ इंडिया-2003(8) एससीसी 546 के मामले में व्यवस्था दी :&lt;br /&gt;''यहां हम लोग देखते हैं कि उच्च न्यायालय के निर्देश पुलिस को महिला कांस्टेबल की अनुपस्थिति में किसी महिला को गिरफ्तार किए जाने से रोकते हैं। इस निर्देश के तहत किसी महिला को सूरज ढलने के बाद से सूरज उगने के पहले तक किसी भी हालत में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। हालांकि हमलोग उच्च न्यायालय के फैसले के सब पैरा (1द्बद्ब) में दिए गए निर्देशों के पीछे छुपे उद्देश्यों से सहमत हैं, पर यह समझते हैं कि बेशक इनका कड़ाई से पालन होना चाहिए, पर मौजूदा परिस्थिति में जांच एजेंसी को इससे व्यावहारिक दिक्कतें हो सकती हैं और अभियुक्त को कानून प्रक्रिया से बचने का मौका मिल सकता है। हालांकि गिरफ्तार की जाने वाली महिलाओं का पुलिस अत्याचारों से संरक्षण जरूरी है, पर यह हमेशा संभव और व्यावहारिक नहीं हो सकता कि महिला कांस्टेबल की तब उपस्थिति हो ही, जब गिरफ्तारी जरूरी हो। इसलिए हम समझते हैं कि जो निर्देश जारी किए गए है उनमें कुछ सुधार की जरूरत है। इस तरह कि इसके उद्देश्य भी प्रमावित नहीं हों। हम समझते हैं कि गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के लिए अगर ऐसा निर्देश जारी किया जाए तो भी यह उद्देश्य पूरा हो सकता है कि जब किसी महिला को गिरफ्तार करना हो तो किसी महिला कांस्टेबल को साथ रखने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए पर ऐसी स्थिति में जबकि गिरफ्तार करने वाला अधिकारी पूरी तरह संतुष्ट हो कि किसी महिला कांस्टेबल की उपस्थिति संभव नहीं हैं औरया महिला कांस्टेबल की उपस्थिति सुनिश्चित करने की व्यवस्था में विलंब होने से जांच की प्रक्रिया प्रभावित होगी, तो गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले या गिरफ्तारी के बाद कारण दर्ज करते हुए महिला को कानूनी जरूरतों की वजह से किसी भी समय दिन या रात को, मामले की परिस्थिति के अनुसार गिरफ्तार करने की अनुमति दे दी जानी चाहिए।'' (पृ. 549)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गवाहों की अतिशयोक्ति&lt;br /&gt;फौजदारी मामलों में ऐसा देखा गया है कि सजा सुनाने की दर बढ़ाने के लिए जरूरी गवाही के साथ झूठ, अतिशयोक्ति, लच्छेदार भाषा आदि का खूब प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर अन्य मामलों में ऐसे गवाहों की गवाही, जो झूठ बोलते हैं या अतिशयोक्ति करते हैं, कभी सजा होने का आधार नहीं बन सकती।  बल्कि अप्रसन्नता का कारण बन जाती है। अमेरिका और यूरोप की अदालतों में इस तरह की गवाहियां हर तरह से नामंजूर कर दी जाती हैं। पर, भारत में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त के खिलाफ झूठी गवाही को मानने के संबंध में अत्यंत निम्स्तरीय मानक तय किया है। न्यायालय ने एसए गफ्फार खां बनाम वीआर धोबले-2003(7) एससीसी 749 - के मामले में यह व्यवस्था दी:&lt;br /&gt;''भारत में इस तरह की व्यवस्था नहीं है और गवाहों को झूठा नहीं कहा जा सकता... यह सिर्फ सावधानी बरतने का मामला है। खासतौर पर भारत के लिए यह सिद्धांत खतरनाक है क्योंकि अगर पूरी की पूरी गवाही को ही नामंजूर कर दिया जाए कि किसी मुद्दे पर गवाह असत्य बोल रहा था तो डर है कि अपराधों में न्याय का रास्ता कहीं न कहीं बंद हो जाएगा। गवाह किसी कहानी को लच्छेदार भाषा में तो सुनाएंगे ही, हालांकि मूलत: वह सच होगी परंतु उपरोक्त निर्देश कोई अच्छा नियम नहीं है क्योंकि शायद ही कोई गवाह ऐसा होता है जिसकी गवाही में थोड़ा बहुत झूठ या फिर अतिशयोक्ति न हो, लच्छेदार भाषा नहीं हो या सजावट नहीं हो।'' (पृ. 764)&lt;br /&gt;गंगाधर बेहरा और अन्य बनाम उड़ीसा सरकार-2003 एससीसी (सीआरआई)32 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुन: यह व्यवस्था दी: ''यहां तक कि अगर गवाही का एक बड़ा हिस्सा अपर्याप्त पाया जाता है, तो भी बचा हुआ हिस्सा अभियुक्त को दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है, अन्य सहअभियुक्तों को बरी किए जाने के बावजूद उसकी सजा बनी रह सकती है।'' (पृ. 42)&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ की ये व्यवस्थाएं सीधे तौर पर समन्वित पीठों और यहां तक कि बड़ी पीठों के उलट हैं। मामला दर मामला उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया है कि अगर कोई गवाह झूठ बोल रहा है तो उसकी गवाही के एक हिस्से पर विश्वास और दूसरे पर अविश्वास करना अत्यंत जोखिम का काम होगा। अनाज से उसकी भूसी अलग करने का सिद्धांत फौजदारी कानून पर लागू नहीं किया जा सकता। जो झूठ बोलते हैं अतिशयोक्ति करते हैं और ऐसे गवाहों पर तो बिल्कुल नहीं जिनकी गवाही पर्याप्त रूप में गलत पाई गई हो।&lt;br /&gt;बिहार सरकार और आरपी ठाकुर के मामले में 1974(3) एससीसी 664 - उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी : ''अगर नकुल देव ने एक व्यक्ति को फंसा दिया, तो दूसरे को फंसाने में उसकी गवाही को स्वीकार करने से पहले इसके लिए मजबूत कारण ढूंढ़ना होगा।'' (पृ. 665)&lt;br /&gt;इसी तरह सूरजमल बनाम सरकार - 1979(4) एससीसी 725 में उच्चतम न्यायालय का कहना है : ''यह तय है कि अगर गवाह परस्पर विरोधी बयान देता है, चाहे एक स्तर पर या दो स्तर पर तो ऐसे गवाहों की गवाही अविश्वसनीय हो जाती है और मानने लायक नहीं रह जाती और अगर विशेष परिस्थिति नहीं हो तो ऐसी गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती... दूसरे शब्दों में राम नारायण और अपीलकर्ता के खिलाफ गवाह की गवाही को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।'' (पृ. 726)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोटा&lt;br /&gt;करतार सिंह के मामले में टाडा की संवैधानिकता पर विचार करने के लिए उच्चतम न्यायालय से मांग की गई। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम भारत 2004(9) एससीसी 580, मामले में उच्चतम न्यायालय ने आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) 2002 की संवैधानिकता पर विचार किया था। फैसला 16 दिसंबर 2003 को होने तक टाडा के दुरुपयोग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुका था। इसमें मासूम लोग गिरफ्तार किए जा रहे थे। जब यह बात उच्चतम न्यायालय के ध्यान में लाई गई तो सुनवाई शुरू होने के साथ उसका कहना था: ''टाडा के दुरुपयोग और बड़े पैमाने पर इसके तहत आरोपित को बरी किए जाने के संदर्भ में याचिकाकर्ताओं ने एक और मुद्दा उठाया है। यह हम बताना चाहते हैं कि यह न्यायालय पोटा की 'जरूरत' पर विचार नहीं कर सकती। यह नीतिगत मामला है। एक बार कानून पारित हो जाता है तो सरकार को उसका उपयोग संविधान के तहत आतंकवाद रोकने के लिए करना ही पड़ेगा, संविधान के दायरे में रहकर फिर भी, हम लोग यह बताना चाहते हैं कि इस अदालत ने बार-बार यह कहा है कि सिर्फ इस आधार पर कि दुरुपयोग हो सकता है, किसी कानून को असंवैधानिक नहीं बताया जा सकता या किसी को इस तरह अधिकार संपन्न किए जाने का विरोध नहीं किया जा सकता।'' (पृ. 598)&lt;br /&gt;करतार सिंह के मामले की ही तरह उच्चतम न्यायालय का मुद्दा ''दुरुपयोग की महज एक संभावना'' का नहीं था बल्कि कानून के लगातार और बड़े पैमाने पर दुरुपयोग का था। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, जब उच्चतम न्यायालय मामले की सुनवाई कर रहा था, तब पोटा के दुरुपयोग की अनेक शिकायतें आ रही थीं और अखबारों में अधिकारियों द्वारा पोटा के दुरुपयोग के अनेक लेख छप रहे थे। ऐसी स्थिति में जबकि याचिकाकर्ता यह दिखाने की स्थिति में थे कि कानून और उसके दुरुपयोग का मामला एक-दूसरे से इतना जुड़ा हुआ है कि किसी भी अदालत के एक के बगैर दूसरे पर विचार करना संभव ही नहीं है, क्या यह उच्चतम न्यायालय के लिए उचित था कि वह याचिकाकर्ता की अपील को खारिज कर दे, और बड़े पैमाने पर कानून के दुरुपयोग की संक्षिप्त सुनवाई के जरिए उपेक्षा कर दे? अंतत: भारत सरकार ने ही यह स्वीकार किया कि पोटा का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ और कानून को लेकर जनता में भारी असंतोष है। टाडा की तरह पोटा को भी फौजदारी कानून का काला अध्याय माना जाता है। फिर भी उच्चतम न्यायालय ने दोनों मामलों में इन दमनकारी कानूनों को अपनी पूरी मंजूरी दे दी।&lt;br /&gt;जब यह दलील दी गई कि वकील अपने मुवक्किल और पत्रकार अपने स्रोत के मामले में अपनी आचारसंहिता और नैतिकता से गोपनीयता बनाए रखने के लिए बंधे होते हैं तो उच्चतम न्यायालय ने इसे एक बारगी नामंजूर कर दिया। उसका कहना था: ''कानून का यह स्पष्ट दृष्टिकोण है कि किसी पत्रकार या वकील को अपराध के बारे में पेशागत नैतिकता के आधार पर सूचना छुपाने का कोई पवित्र अधिकार है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ऐसा कोई कानून है भी नहीं जो किसी अखबार या पत्रकार को अदालत को कोई जरूरी सूचना न देने का अधिकार देता हो। हालांकि उन्हें प्रेस परिषद कानून, 1978 के जरिए ऐसा अधिकार दिया गया है। निश्चित रूप से जांच अधिकारी को उनसे सूचना हासिल करने के लिए हिरासत में लेने में सतर्क और सावधान रहना चाहिए। सूचना हासिल करने की प्रक्रिया में अगर नागरिक के अधिकार का कोई भी उल्लंघन होता है तो उन्हें अन्य कानूनी विकल्पों का उपयोग करने से कोई नहीं रोकता।'' (पृ. 603)&lt;br /&gt;पोटा की धारा 32 पर विचार करते हुए, जिसमें पुलिस अधिकारी के समक्ष दिए गए बयान को मंजूर किया गया है तथा धारा 32(4) और (5) पर विचार करते हुए जिसमें बयान को मजिस्ट्रेट के पास भेजने की आवश्यकता बताई गई है, उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था है: ''हमारे सुविचारित मत में यह प्रावधान जिसमें ऐसे व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की जरूरत बताई गई है एक अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था है। यह उस व्यक्ति को अपने इकबालिया बयान पर फिर से सोचने का एक मौका देती है। इसके अलावा मजिस्ट्रेट की यह जिम्मेदारी कि वह बयान दर्ज करे तथा यातना और चिकित्सकीय जांच के बारे में पूछताछ कर प्रावधान को और सुरक्षित बनाती है।''&lt;br /&gt;पहले टाडा के बारे में विचार करते हुए हमने यह दिखाया था कि किस तरह छोटी पीठें करतार सिंह मामले में दिए गए संविधान पीठ के इन फैसलों की अवमानना करती हैं कि इसके द्वारा तय निर्देशक सिद्धांतों का अच्छी तरह अनुकरण किया जाना चाहिए। अब पोटा के उपरोक्त मामले में हमने उच्चतम न्यायालय के फैसले को सिर्फ यह दिखाने के लिए उद्धृत किया है कि उच्चतम न्यायालय की छोटी पीठें पीयूसीएल के मामले में इन अनिवार्य व्यवस्थाओं से किस तरह पीछे हट गईं, और किस तरह मजिस्ट्रेट की भूमिका एक डाकघर की रह गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिकित्सकीय साक्ष्य : प्रत्यक्षदर्शी की गवाही&lt;br /&gt;एनबी मिश्र बनाम एससी राय - एआईआर 1960 एससी 706- के तथा अन्य कई मामलों में उच्चतम न्यायालय ने कई अभियुक्तों को इसलिए बरी कर दिया कि चिकित्सकीय साक्ष्य स्पष्ट होने के बावजूद प्रत्यक्षदर्शी की गवाही उससे मेल नहीं खाती थी। निस्संदेह ऐसे मामले, जहां दोनों में मेल हो, निपटाए जा सकते हैं। पर ऐसे मामलों में, जहां विवाद की स्थिति स्पष्ट हो और जिसे सुलझाया जा सकता हो, उच्चतम न्यायालय ने अक्सर यह व्यवस्था दी है कि संदेह का लाभ अभियुक्त को मिलेगा। अब आश्चर्यजनक तरीके से, गंगाधर बेहरा और अन्य बनाम उड़ीसा सरकार-2003 एससीसी (सीआर)32 के मामले में, बाध्यकारी उदाहरण का उल्लेख किए बगैर उलट फैसला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी : ''इस स्थिति में, इस दलील पर विचार करना उचित होगा कि प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य अलग-अलग हैं। ऐसे में चिकित्सकीय गवाह के काल्पनिक जवाबों को अनावश्यक महत्व देकर प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को अलग रखना उचित नहीं होगा जिसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी है। यह भी नहीं माना जा सकता कि यह परिवर्तनीय है और चिकित्सकीय साक्ष्य अडिग है।'' (पृ. 44)&lt;br /&gt;दो न्यायाधीशों की इस पीठ का यह फैसला उपरोक्त मामले में दिए गए तीन न्यायाधीशों के फैसले से स्पष्टत: विपरीत है जिसमें मजिस्ट्रेट ने जूरी को यह निर्देश दिया था : ''अब, महाशय, जब चिकित्सकीय गवाह को एक विशेषज्ञ के रूप में बुलाया जाता है तो वह घटना का गवाह नहीं होता। चिकित्सकीय साक्ष्य घटना का साक्ष्य नहीं होता, विशेषज्ञ का मत होता है। अभियोजन पक्ष की ओर से पेश चिकित्सकीय साक्ष्य सिर्फ सहायक होता है। इससे यही सिद्ध होता है कि चोट बताए गए तरीके से पहुंची होगी, इससे अधिक नहीं। फिर किसी अन्य चिकित्सकीय साक्ष्य को बचाव पक्ष खुद भी यह सिद्ध करने के लिए पेश कर सकता है कि चोट कथित तौर पर नहीं लगी है और इस तरह प्रत्यक्षदर्शी को गलत बताया जा सकता है। यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि अगर आप प्रत्यक्षदर्शी पर विश्वास करते हैं, तो फिर चिकित्सकीय साक्ष्य से इसकी पुष्टि का सवाल नहीं उठता। अगर चिकित्सकीय साक्ष्य इस हद तक नहीं जाता कि चोट सिर्फ उसी तरह लगी है जैसा अभियोजन पक्ष का कहना है, और यही बात ध्यान देने की है क्योंकि अगर आप प्रत्यक्षदर्शी की गवाही स्वीकार करते हैं तो चिकित्सकीय साक्ष्य पर विचार करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।'' (पृ. 1034)&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस तरह असहमति व्यक्त की : ''मैं नहीं समझता कि दिशा सही और सम्पूर्ण है। यह गलत है क्योंकि एक चिकित्सकीय गवाह जो धंत्य परीक्षण करता है, वह घटना का गवाह होता है, हालांकि वह मामले के कुछ पहलुओं पर अपने मत भी व्यक्त करता है। इसके अलावा, चिकित्सकीय गवाह का महत्व सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को प्रभावित करना नहीं है, यह स्वतंत्र रूप से पेश की गई गवाही है क्योंकि यह कुछ ऐसे तथ्यों को भी स्थापित कर सकता है जो मौखिक गवाही से बिल्कुल अलग हों। अगर किसी व्यक्ति को बिल्कुल करीब से गोली मारी जाती है तो चिकित्सकीय गवाह उसके घाव के जो निशान खोजेगा उससे पता चलेगा कि गोली कम दूरी से मारी गई थी, जो उसके अन्य मतों से अलग होगा।  इसी तरह, हड्डियों के टूटने, घाव की गहराई और आकार आदि से उपयोगिक हथियार के आकार-प्रकार का पता चलेगा। यह कहना गलत होगा कि यह साक्ष्य मतों की अभिव्यक्ति मात्र है, कई बार यह पीड़ित पर पायी गयी चोटों की प्रत्यक्ष गवाही भी पेश करता है।'' (पृ. 1034)&lt;br /&gt;इसी तरह मोहर सिंह बनाम पंजाब सरकार - 1981 एसयूपीपी 18 - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी: ''प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य के बीच भारी फर्क को देखते हुए यह पूरी तरह अनुचित और विनाशकारी होगा कि ऐसे साक्ष्य के आधार पर अपीलकर्ताओं की सजा बहाल रखी जाए।'' (पृ. 20)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट अग्रसारित करना&lt;br /&gt;संहिता की धारा 157 के तहत यह जरूरी है कि कोई अपराध होने की सूचना मिलने पर संबद्ध पुलिस थाने का प्रभारी मजिस्टे्रट को उसकी रिपोर्ट 'अग्रसारित' करे।  उच्चतम न्यायालय में कई फैसले (एआईआर 1976 एससी 2423, एआईआर 1980 एससी 638) हैं जिनमें कहा गया है कि मजिस्ट्रेट के पास विलंब से रिपोर्ट भेजने से यह संदेह करने का आधार बनता है कि एफआईआर राय-मशविरा करके लिखी गई&lt;br /&gt;है और दर्शायी गई तिथि और समय के बाद लिखी गई है।&lt;br /&gt;जम्मू-कश्मीर सरकार बनाम सरदार मोहन सिंह-2006, 9एससीसी 272 के मामले में जहां अपराध 23.7.85 को शाम छह बजे हुआ दर्शाया गया है, एफआईआर शाम सात बजकर बीस मिनट पर लिखी बताई गई है और इसकी नकल अगले दिन अपराह्न बारह बजकर पैंतालीस मिनट पर मजिस्ट्रेट हस्तगत करता है। उच्चतम न्यायालय का कहना है: ''हमारी नजर में, एफआईआर की नकल मजिस्ट्रेट के पास जल्दी ही अगले दिन अदालत में भेज दी गई और कोई विलंब नहीं हुआ, मजिस्ट्रेट के पास इसे भेजने में अनावश्यक समय नहीं लगा।'' (पृ. 275)&lt;br /&gt;इसी तरह अनिल राय बनाम बिहार सरकार - एआईआर 2001 एससी 3713 - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने ''असाधारण विलंब'' की एक नयी अवधारणा पेश की। किसी पूर्व उदाहरण का बगैर उल्लेख किए इस मुद्दे पर कानून इस तरह बदल दिया गया: ''मजिस्ट्रेट के पास एफआईआर की नकल भेजने में असाधारण विलंब इस बात पर संदेह पैदा करने का उचित आधार हो सकता है कि दी हुई तिथि से एफआईआर बाद में किसी दिन दर्ज की गयी ताकि अभियोजन को घटना की बिगड़ी रिपोर्ट को सुधार और सजा कर पेश करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। विलंब अपराध दंड प्रक्रिया की धारा 157 के तहत एफआईआर की प्रामाणिकता पर संदेह के लिए किया गया यह असाधारण विलंब है और इसकी व्याख्या नहीं हो सकती। फिर भी, अभियुक्त के प्रति पूर्वाग्रह नहीं होने के कारण पुलिस द्वारा रिपोर्ट देर से पेश&lt;br /&gt;किए जाने से मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ता है।'' (पृ. 3174)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एफआईआर में गवाहों के नाम छोड़ना&lt;br /&gt;उच्चतम न्यायालय ने बार-बार यह कहा है कि अगर पर्याप्त कारण बताए बगैर एफआईआर में गवाहों का नाम छोड़ दिया जाता है तो यह साक्ष्य के प्रति संदेह का एक आधार माना जाएगा।  मरूदन लाल अगस्ती बनाम केरल सरकार 1980(4) एससीसी 425 - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्तों को इस कारण छोड़ दिया कि अदालत में पेश साक्ष्य में यह कहने के बावजूद कि उन लोगों ने हमला देखा है, उनका नामोल्लेख एफआईआर में नहीं था।  इसके विपरीत राजकिशोर झा बनाम बिहार सरकार - 2003(11) एससीसी 519 - के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अवस्था दी: ''उच्च न्यायालय ने इस बात का उल्लेख किया है कि एफआईआर में गवाहों के नाम नहीं हैं। अपने आप में यह उनकी गवाही पर संदेह करने का आधार नहीं हो सकता।'' (पृ. 250)&lt;br /&gt;इसी तरह अनिल राय बनाम बिहार सरकार - एफआईआर 2001 एससी 3173 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एफआईआर में गवाहों के नाम का उल्लेख नहीं होना इस तथ्य पर आधारित हो सकता है कि एफआईआर लिखाने वाली पत्नी अपने पति की हत्या से परेशान होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुझावों को बचाव पक्ष के हक में लेना&lt;br /&gt;अपराध कानून प्रक्रिया और संहिता को दरकिनार करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने तरुण बोरा बनाम असम सरकार-2002 एससीसी (सीआरआई) 1568 के मामले में यह व्यवस्था दी: ''जिरह में गवाह ने इस तरह कहा: अभियुक्त तरुण बोरा ने न मेरी आंख पर पट्टी बांधी और न ही उसने मुझ पर हमला किया।''&lt;br /&gt;जिरह का यह हिस्सा संकेत देता है कि अभियुक्त तरुण बोरा सारे घटनाक्रम में मौजूद था। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि तरुण बोरा की उपस्थिति मान ली जाए। इनकार सिर्फ इस बात से किया जा रहा है कि अभियुक्त गवाह की आंखों पर पट्टी बांधने या उस पर हमला करने में शामिल नहीं था। (पृ. 1572)&lt;br /&gt;''हम लोगों ने पहले ही देखा है कि गवाह नम्बर एक के साथ जिरह में, यह संकेत दिया गया कि अपीलकर्ता तरुण बोरा न तो आंखों पर पट्टी बांधने में और न ही उस पर हमला करने में शामिल हुआ।  इस अपहरण कांड में तरुण बोरा की उपस्थिति और उसमें शामिल होने को ही सिद्ध करता है।'' (पृ. 1573) इसी तरह का मामला 2002 एससीसी (सीआर) 217 में भी वर्णित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नामंजूर साक्ष्य संबंधी आपत्तियां&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बीएस पांचाल बनाम गुजरात सरकार - एआईआर 2001 एससी 1158 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस टिप्पणी से शुरुआत की:&lt;br /&gt;''हम लोग अब इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि फौजदारी अदालतों में सुनवाई तेज करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।'' इसके आगे अदालत ने कहा: ''यह पुराना तरीका है कि साक्ष्य इकट्ठा करते समय, जब साक्ष्य के रूप में किसी वस्तु को मंजूर करने के बारे में कोई आपत्ति उठाई जाती है तो अदालत इस पर फैसला किए बगैर आगे नहीं बढ़ती है।'' (पृ. 1158) ''साक्ष्य के रूप में किसी वस्तु सामग्री या मौखिक गवाह को मंजूर करने के बारे में जब कोई आपत्ति हो तो अदालत इसे दर्ज कर सकती है और आपत्तिजनक दस्तावेज को निशानदेही के रूप में प्रदर्शित कर सकती है (या मौखिक गवाही) के आपत्तिजनक अंश को दर्ज कर सकती है। इस पर अंतिम निर्णय लेने के स्तर पर फैसला किया जा सकता है। अगर अदालत को अंतिम दौर में यह लगता है कि आपत्ति सही थी तो वह उसे छोड़ते हुए फैसला कर सकती है। ऐसी प्रक्रिया अपनाने में कोई हर्ज नहीं है।'' (पृ.1159)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस दृष्टिकोण को अपनाने में कई बड़ी समस्याएं हैं। पहली, फौजदारी मामलों में यह उम्मीद की जाती है कि निचली अदालत में न्यायाधीश ही आपत्तियों पर विचार करेंगे। उच्चतम न्यायालय के समक्ष ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिससे पता चल सके कि आपत्तियों पर मंजूरी के बारे में फैसला करने का काम बहुत पुराना है। यह टिप्पणी फौजदारी मामलों की सुनवाई में हो रहे विलंब से उपजी कुंठा का परिणाम है। दूसरे, सभी आपत्तियों और प्रक्रिया को दर्ज करने से अभियुक्त के प्रति भारी पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है और न्यायाधीशों के दिमाग को भी प्रभवित कर सकता है। भले आपत्तियां अधिक नहीं कम समय के लिए दर्ज रहें। तीसरी समस्या यह है कि इससे न्यायाधीशों को तकनीकी बनने का मौका मिल जाएगा न कि न्याय करने का। यह कहना एक अलग बात है कि साक्ष्य को मंजूर करने का जटिल मुद्दा आपत्ति दर्ज करने के बाद अस्थायी तौर पर स्थगित किया जा सकता है और यह बिल्कुल अलग कि इस तरह की हर आपत्ति के लिए कोई नियम निर्धारित किया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#333333;"&gt;'निस्संदेह' का मानक गिरा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;फौजदारी मामलों में सबूत पेश करने के निर्धारित मानकों से हटते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ''निस्संदेह'' या संदेह से इतर की अवधारणा को बिना किसी मुकदमे का उदाहरण पेश किए ''नैतिक सुनिश्चितता'' की अवधारणा तक नीचे ले आया। आलमगीर बनाम राज्य 2003(1) एससीसी 21 के मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ ने यह देख कर भी कि एक उच्च न्यायालय ने स्तर को परिभाषित करना शुरू कर दिया है, चुप ही रहना अच्छा समझा।&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;संयोगवश उच्च न्यायालय ने ''पर्याप्त संदेह'' अभिव्यक्ति के सही और वास्तविक अर्थ पर बल दिया जिसका उपयोग इस संदर्भ में किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय का कहना है: ''आज की सोच के अनुसार पर्याप्त संदेह से परे प्रमाण का अर्थ न्यायाधीश के लिए वही है जो नैतिक सुनिश्चितता का है। हालांकि हम लोग इस सिलसिले में कोई मत जाहिर नहीं कर रहे हैं।'' (पृ. 26)&lt;br /&gt;यह हरिचरण कुर्मी बनाम बिहार सरकार - एआईआर 1964 एससी 1184 के मामले में संविधान पीठ के फैसले के एकदम विपरीत है। संविधान पीठ का स्पष्ट फैसला है: ''फौजदारी मामलों में नैतिक जिम्मेदारी के सिद्धांत को लागू करने की कोई संभावना नहीं है।'' (पृ. 1184)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#996633;"&gt;बयान में अभियुक्त का नाम नहीं होना&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर इस तरह के पूर्व उदाहरणों के विपरीत कि अगर पुलिस जांच के द्वारा अभियुक्त का नाम बयानों में नहीं आता तो ऐसी लापरवाही अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह पैदा करती है आलमगीर बनाम राज्य-2003(1) एससीसी 21 - मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी :&lt;br /&gt;''यह सही है कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत गवाह के बयान में साक्ष्य का यह अंश मौजूद नहीं है, क्या यह साक्ष्य की प्रकृति और चरित्र को इस आधार पर खत्म कर देता है कि पुलिस अधिकारी से कोई लापरवाही हुई है? क्या यह अन्यथा मान्य और स्वीकृत साक्ष्य को खारिज करने के बराबर होगा - हमारी नजर में जवाब नकारात्मक में होगा।'' (पृ. 27)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#330099;"&gt;&lt;strong&gt;इकबालिया बयान का उपयोग&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हम कश्मीरा सिंह बनाम मध्य प्रदेश सरकार - एआईआर 1952 एससी 159 से शुरू करते हैं। इसमें उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था : ''किसी आरोपित व्यक्ति का इकबालिया बयान एस-3 में दी गई परिभाषा के अनुसार सामान्य तौर पर साक्ष्य नहीं होता। इसे अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता और इसका सिर्फ अन्य साक्ष्यों के समर्थन में उपयोग किया जा सकता है। सही तरीका है, पहला अभियुक्त के खिलाफ इस साक्ष्य को पूरी तरह विचार के दायरे से बाहर कर दिया जाए और यह देखा जाए कि यह मुकदमा सुरक्षित तरीके से इस पर आधारित हो सकता है या नहीं। अगर बयान से दूर कर स्वतंत्र रूप से ऐसा संभव हो तो स्वभावत: बयान को मुकदमे के समर्थन में शामिल करना जरूरी नहीं है। पर ऐसे भी मुकदमे हो सकते हैं जिनमें न्यायाधीश अन्य साक्ष्यों पर कार्रवाई करने को तैयार नहीं है तो भी, अगर वह विश्वसनीय हो तो अभियोग चलाने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में न्यायाधीश समर्थन में बयान को शामिल कर सकता है और इसका उपयोग अन्य साक्ष्यों की पुष्टि के लिए कर सकता है और इस तरह उस बयान पर विश्वास करने के लिए एक आधार निर्मित कर सकता है जिसके बगैर वह उसे मंजूर करने के लिए तैयार नहीं होता।'' (पृ. 159)&lt;br /&gt;जहां तक संबंध सरकारी गवाह और सह अपराधी की पुष्टि का है, एक सह अभियुक्त जो इकबालिया बयान देता है, स्वभावत: एक सहयोगी होता है तथा उसकी गवाही का उपयोग दूसरे के समर्थन में करने के खतरे का उल्लेख किया जा चुका है। अगर गवाही शपथपूर्वक नहीं दी गई तो खतरा कम नहीं होता और इसकी जांच जिरह के दौरान नहीं की जा सकती। कानून ऐसी ही सावधानी तब बरतने को कहता है जब कोई गवाह जो सह अपराधी नहीं है और न्यायाधीश उसकी गवाही को उतना महत्व नहीं देता।&lt;br /&gt;इस तरह सह अपराधी की गवाही का उपयोग कानून अन्य के समर्थन में किया जा सकता है हालांकि असाधारण परिस्थितियों और अज्ञात कारणों से इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।  निरपराधी को अपराधी के साथ शामिल करने की विचित्र प्रवृत्ति भारत में नजर आती है और इस खतरे से बचना अदालत के लिए मुश्किल काम हो जाता है। मासूम को दंड देने से बचने का एक मात्र सुरक्षित तरीका स्वतंत्र गवाही पर जोर देना है जो कुछ हद तक ऐसे अभियुक्त को उलझन में डाल देता है। (पृ. 159)&lt;br /&gt;नाथू बनाम उत्तर प्रदेश सरकार - एआईआर 1956 एसी 56 - के मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले में कहा गया है : ''...ऐसे बयान साक्ष्य कानून की धारा एस-3 के मुताबिक साक्ष्य नहीं हैं। और इस आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अगर ऐसा साक्ष्य है जिसके आधार पर दोषी ठहराया जा सकता हो, तो उसका उल्लेख उसके समर्थन में और बचाव में किया जा सकता है।'' (पृ. 159)&lt;br /&gt;रामचंद्र बनाम उत्तर प्रदेश सरकार - एआईआर 1957 एससी 381 - के मामले में इसी तरह अदालत ने कहा : ''एस-30 के तहत सह अभियुक्त का इकबालिया बयान सिर्फ विचार के लिए लिया जा सकता है पर यह अपने में पर्याप्त साक्ष्य नहीं होता है।'' (पृ.560)&lt;br /&gt;इसके अलावा हरिचरण कुर्मी बनाम बिहार सरकार - एआईआर 1964 एस सी 1184 - के मामले में उच्चतम अदालत का फैसला है : ''किसी आरोपित व्यक्ति के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई करते हुए अदालत किसी सह अभियुक्त के बयान से शुरू नहीं कर सकती, इसकी शुरुआत अभियोजन पक्ष से प्रमाणित गवाही से होनी चाहिए और जब गवाही के चरित्र और प्रभाव पर राय कायम हो जाती है तब उस बयान को सुनने की अनुमति दी जा सकती है ताकि अन्य गवाहियों के आधार पर अदालत निष्कर्ष पर पहुंचने वाली हो तो उससे सहायता मिल सके।'' (पैरा-12)&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;''इस तरह सह अभियुक्त के बयान को ठोस सबूत नहीं माना जा सकता और तभी उसका उपयोग किया जा सकता है जब अदालत दूसरी गवाहियों को स्वीकार करने की स्थिति में हो और महसूस करती हो कि अन्य गवाहियों के आधार पर वह जिस निष्कर्ष पर पहुंच रही है उसके समर्थन में उस बयान का उपयोग किया जा सकता है।'' (पृ.844)&lt;br /&gt;इसके विपरीत उच्चतम न्यायालय की ही दो न्यायाधीशों की पीठ ने हाशिम बनाम तमिलनाडु सरकार - 2005(1) एससीसी 237 - के मामले में व्यवस्था दी : ''अगर यह उचित और विश्वसनीय हो तो अदालत सह अपराधी को अपुष्ट गवाही के आधार पर दोषी ठहरा सकती है।'' (पृ. 247)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#993300;"&gt;ठोस सबूत और झूठी दलील&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस बात के अनेक उदाहरण हैं कि झूठी दलील को ठोस सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में जब घटनाक्रम पूरा हो जाता है, तभी झूठी दलील को एक अतिरिक्त परिस्थिति के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। शंकर लालजी दीक्षित बनाम महाराष्ट्र सरकार - 1981(2) एससीसी 35 - के मामले में यह व्यवस्था दी गई : ''फर्जी बचाव प्रामाणिक तथ्यों की जगह नहीं ले सकता जिसे अभियोजन पक्ष को सफलता के लिए सिद्ध करना होता है। एक झूठी दलील को अधिकतम अतिरिक्त परिस्थिति के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है, बशर्ते अन्य परिस्थितियां अभियुक्त के अपराध की ओर पूरी तरह इंगित कर रही हों।'' (पृ. 43)&lt;br /&gt;इसके विपरीत उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार बनाम सुरेश-2000(1) एससीसी 471-मामले में व्यवस्था दी : ''अभियुक्त का एक गलत जवाब, जब उसका ध्यान उपरोक्त परिस्थिति की ओर दिलाया गया, का मतलब होता है कि परिस्थिति उसे फंसाने के लिए पर्याप्त है। ऐसी स्थिति में गलतबयानी को श्रृंखला की एक खोई हुई कड़ी माना जा सकता है।''(पृ. 480) &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद मणि कुमार थापा बनाम सिक्किम सरकार-2002(7) एससीसी 157 - के मामले में उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ ने व्यवस्था दी : ''यदि कानून के कथित सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो धारा 313 सीआरपीसी के तहत अपीलकर्ता का बयान जो जाहिर तौर पर गलत है और अभियोजन पक्ष ने यह दिखाने के लिए पेश किया है कि अपीलकर्ता ने 12.2.1988 की घ
